UP: 10 मिनट में पकड़े जाएंगे कैंसर के कारक 45 खतरनाक रसायन, विकसित की पीफास जांच की अत्याधुनिक तकनीक
भारतीय विष विज्ञान अनुसंधान संस्थान ने विकसित पीफास जांच की अत्याधुनिक तकनीक विकसित की है। यह 10 मिनट से भी कम समय में 45 अलग-अलग पीफास रसायनों की बेहद सूक्ष्म स्तर पर पहचान कर सकती है।
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घर में लगा पानी का फिल्टर, प्लास्टिक की बोतलें, नॉन स्टिक बर्तन, पिज्जा बॉक्स और रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाली कई चीजों में पॉलीफ्लोरोएल्किल पदार्थ यानी खतरनाक स्थायी रसायन मौजूद हो सकते हैं। इन्हें पीफास (PFAS) भी कहते हैं। ये कैंसर समेत कई गंभीर बीमारी पैदा कर सकते हैं। इनसे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ती है।
लखनऊ स्थित भारतीय विष विज्ञान अनुसंधान संस्थान (आईआईटीआर) के डॉ. डीके पटेल और उनकी टीम ने एक अत्याधुनिक जांच तकनीक विकसित की है। यह 10 मिनट से भी कम समय में 45 अलग-अलग पीफास रसायनों की बेहद सूक्ष्म स्तर पर पहचान कर सकती है।
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संस्थान ने पीने के पानी से इन रसायनों को हटाने के लिए पीओपी एफएएस-गार्ड नाम की नई तकनीक भी विकसित की है। आईआईटीआर ने वैश्विक कंपनी वाटर्स कॉर्पोरेशन के सहयोग से यह जांच तकनीक विकसित की है। इसकी मदद से भोजन, पीने के पानी और रोजमर्रा के उपभोक्ता उत्पादों में मौजूद पीफास रसायनों की बेहद सूक्ष्म मात्रा का भी सटीक पता लगाया जा सकता है। वैज्ञानिक इसे देश की सबसे संवेदनशील पीफास जांच तकनीक में से एक मान रहे हैं।
इसलिए पीफास हैं चिंता का कारण
पॉलीफ्लोरोएल्किल पदार्थ यानी पीफास रसायनों का बड़ा समूह है। इनका इस्तेमाल नॉन स्टिक बर्तनों, फूड पैकेजिंग, प्लास्टिक की बोतलों, सौंदर्य प्रसाधनों, कपड़ों, पेंट और आग बुझाने वाले फोम जैसे कई उत्पादों में होता है। ये रसायन आसानी से नष्ट नहीं होते इसलिए इन्हें स्थायी रसायन (फॉरएवर केमिकल्स) कहा जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार ये लंबे समय तक पर्यावरण और शरीर में बने रह सकते हैं। कैंसर, कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकते हैं।
इस तरह से पहुंचते हैं शरीर में
वैज्ञानिकों के अनुसार पीफास फूड पैकेजिंग, पिज्जा बॉक्स, प्लास्टिक की बोतलों और दूषित पानी के जरिये शरीर में पहुंच सकते हैं। ऐसे में आईआईटीआर की नई जांच और शुद्धिकरण तकनीक लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि साबित हो सकती है।
पीने के पानी को और सुरक्षित बनाने की तैयारी
आईआईटीआर की ओर से विकसित पीओपी एफएएस-गार्ड तकनीक पीने के पानी से कई तरह के पीफास रसायनों को हटाने में सक्षम है। संस्थान इस तकनीक को व्यावसायिक उपयोग के लिए बंगलूरू की एक कंपनी को हस्तांतरित करने की तैयारी कर रहा है।
उपभोक्ता उत्पादों में पीफास का चल रहा है आकलन
आईआईटीआर के निदेशक डॉ. भास्कर नारायण ने बताया कि संस्थान में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) के सहयोग से एक महत्वपूर्ण परियोजना चल रही है। इसके तहत भारत में उपभोक्ता उत्पादों में पीफास की मौजूदगी, इनके उत्पादन, आयात, निर्यात और उपयोग का वैज्ञानिक आकलन किया जा रहा है। इससे भविष्य में इन रसायनों के लिए राष्ट्रीय मानक और नियम बनाने में मदद मिलेगी।
जानिए क्या है आईआईटीआर: भारतीय विष विज्ञान अनुसंधान संस्थान (आईआईटीआर) वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की एक प्रमुख प्रयोगशाला है। 1965 में लखनऊ में स्थापित यह संस्थान औद्योगिक और पर्यावरणीय रसायनों के मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों, खाद्य सुरक्षा और जल, मृदा प्रदूषण पर शोध के लिए जाना जाता है।