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UP: खतरे में है परिवहन विभाग का संवेदनशील डाटा, दलालों को वाहनों और डीएल से संबंधित जानकारी दे रहे डीबीए

नीरज 'अम्बुज', अमर उजाला, लखनऊ Published by: Ishwar Ashish Bhartiya Updated Thu, 30 Apr 2026 09:32 AM IST
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सार

ड्राइविंग लाइसेंस, गाड़ियों की फिटनेस, परमिट और उनकी संख्या सहित पूरा डेटा डीबीए की आसान पहुंच में है। वर्षों से एक ही जिले में तैनात डीबीए की दलालों से सांठगांठ हो गई है। वे दलालों को डीएल, परमिट और फिटनेस जैसी महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं।

UP: Sensitive data of the Transport Department is at risk.
आरटीओ। - फोटो : amar ujala
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विस्तार

परिवहन विभाग का संवेदनशील डेटा निजी डाटाबेस एडमिनिस्ट्रेटर (डीबीए) के हाथों में है। प्रदेश के कई जिलों में अफसरों के खास डीबीए वर्षों से एक ही स्थान पर जमे हुए हैं। सूत्रों के अनुसार, ये डीबीए दलालों को वाहनों और ड्राइविंग लाइसेंसों से संबंधित विवरण उपलब्ध करा रहे हैं। इससे विभाग का पूरा डेटा गंभीर खतरे में है और दलालों से इनकी मिलीभगत उजागर हुई है।

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करीब बीस वर्ष पहले परिवहन विभाग को ऑनलाइन डेटा रखरखाव के लिए ऐसे कर्मचारियों की आवश्यकता महसूस हुई थी। आरटीओ-एआरटीओ को डेटा निकासी के लिए अधिकृत किया गया था, लेकिन डीबीए ही उनकी यूजर आईडी से डेटा निकालते हैं। ड्राइविंग लाइसेंस, गाड़ियों की फिटनेस, परमिट और उनकी संख्या सहित पूरा डेटा डीबीए की आसान पहुंच में है। वर्षों से एक ही जिले में तैनात डीबीए की दलालों से सांठगांठ हो गई है। वे दलालों को डीएल, परमिट और फिटनेस जैसी महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं।
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सूत्रों के मुताबिक, इस मिलीभगत की जानकारी वरिष्ठ अफसरों को भी है। प्रदेशभर में कुल 80 डीबीए कार्यरत हैं, जिनमें से दो लखनऊ में तैनात हैं। बरेली, बदायूं, पीलीभीत, शाहजहांपुर, अमरोहा, वाराणसी, मुरादाबाद, बाराबंकी, लखीमपुर खीरी और कानपुर में कई डीबीए वर्षों से एक ही जगह पर हैं।

भेदभावपूर्ण कार्रवाई पर सवाल
ट्रांसपोर्टनगर आरटीओ प्रशासन संजय तिवारी ने डीएल बनाने वाले निजीकर्मियों की शिकायत की थी। उन्होंने दलालों से मिलीभगत का हवाला देते हुए पूर्व परिवहन आयुक्त किंजल सिंह से शिकायत की। इसके बाद बिना किसी जांच के निजी डीएलकर्मियों का प्रदेशभर में स्थानांतरण और हटाने का सिलसिला शुरू हुआ। सूत्रों के अनुसार, पूर्व अपर परिवहन आयुक्त, आईटी पर निजीकर्मियों से वसूली के आरोप भी लगे थे। किंजल सिंह ने इन मामलों में कोई जांच नहीं करवाई। सवाल उठता है कि जब निजी डीएलकर्मियों का स्थानांतरण हो सकता है, तो डीबीए को क्यों बचाया जा रहा है।

डीबीए के स्थानांतरण में विफलता
ऐसा नहीं है कि डीबीए के स्थानांतरण की कोशिशें नहीं हुईं। तीन साल पहले परिवहन विभाग के आला अफसरों ने स्थानांतरण की कवायद शुरू की थी। हालांकि, अफसरों के खास और जुगाड़ी डीबीए इस प्रक्रिया से बच निकलने में सफल रहे। उन पर किसी भी तरह की आंच नहीं आई और वे अपनी जगह पर बने रहे। सूत्र बताते हैं कि ये डीबीए दलालों के साथ मिलकर अफसरों के लिए भी काम करते हैं। इसी कारण अफसरों ने उन्हें बचाने के लिए पूरा जोर लगा दिया।

डाटा सुरक्षा और मिलीभगत का खतरा

डीबीए की आसान पहुंच के कारण विभाग का संवेदनशील डाटा लगातार खतरे में है। दलालों को गोपनीय जानकारी मिलने से भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को बढ़ावा मिल रहा है। यह स्थिति परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है। अफसरों की मिलीभगत या उदासीनता के कारण यह समस्या वर्षों से बनी हुई है। डाटा सुरक्षा सुनिश्चित करने और भ्रष्टाचार रोकने के लिए तत्काल कार्रवाई आवश्यक है। डीबीए की तैनाती और स्थानांतरण नीतियों की समीक्षा करना महत्वपूर्ण है।

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