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सुना है क्या: 'जब मांझी नाव डुबोए', साथ ही 'प्रभु ने सुनी अर्जी और ये बेचारे काम के बोझ के मारे' के किस्से

Sun, 23 Aug 2026 10:53 AM IST
Bhupendra Singh अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ Published by: Bhupendra Singh Updated Sun, 23 Aug 2026 10:53 AM IST
सार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...

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When boatman himself sinks boat along with Lord heeded plea and these poor souls crushed under burden of work
सुना है क्या/suna hai kya - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'जब मांझी नाव डुबोए...' की कहानी। इसके अलावा 'बिना प्रसाद प्रभु ने सुनी अर्जी' और 'ये बेचारे काम के बोझ के मारे' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...

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जब मांझी नाव डुबोए...

खेतों को पानी देने वाले महकमे के मुलाजिम इन दिनों फिल्म अमर प्रेम का ''माझी जो नाव डुबोए, उसे कौन बचाए'' गुनगुना रहे हैं। दरअसल, महकमे में सरकार का वह नियम ताक पर रख दिया गया, जिसमें तीन साल का कार्यकाल पूरा करने वाले अधिकारियों के तबादले का प्रावधान है। स्थिति यह है कि महकमे के मुखिया ही छह साल से जमे हैं तो अधिकारियों को कौन पूछे? करीब एक दर्जन से अधिक अधिकारी भी छह-सात साल से एक ही सर्किल में मजा मार रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि किसी की सिफारिश को नियमों के तहत परखने वाले महकमे के मालिक माननीय ने भी आंख पर पट्टी बांध रखी है।

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बिना प्रसाद प्रभु ने सुनी अर्जी

सरकारी विभाग में तबादले की अर्जी लगाने के बाद अफसरों की मर्जी पर सुनवाई होती है। बिना समुचित प्रसाद सिफारिश हुई तो मामला बिगड़ना तय है। भगवान की चौखट पर ऐसा नहीं है। अफसरों की मनमानी से परेशान एक कर्मी ने ऐसा ही रास्ता चुना और प्रभु के चरणों में अर्जी रख दी। पुजारी जी उसकी अर्जी में घर की हालत पढ़कर द्रवित हो गए। एक परिचित अफसर को भेज दी। बोल दिया कि अब तो ये प्रभु की प्रतिष्ठा का मामला हो गया है। आप शायद यकीन न करें लेकिन महीनों से लटका ट्रांसफर चंद घंटों में हो गया। प्रभु भी केवल जय जयकार में प्रसन्न हो गए।

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ये बेचारे काम के बोझ के मारे

सरकार के सबसे कद्दावर नौकरशाहों में शुमार एक आईएएस के कंधों पर काम का बोझ इस कदर है कि बात करने की फुर्सत नहीं है। तीन-चार भारी भरकम विभागों का जिम्मा साहब के पास है। खुद विभाग के कर्मचारियों का कहना है कि साहब कई मामलों में खुद ही भ्रमित हैं। अपने ही निर्देश भूल जाते हैं। विभाग वालों का कहना है, वे इस बात से भी परेशान हैं कि अधिकांश फरमान उनके करीबी अधीनस्थ जारी करते हैं जो पिछले कई विभागों से उनके साथ हैं। फोन केवल चुनिंदा और खास लोगों का ही उठता है। ऐसे में काम हो तो कैसे?

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