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MP UCC: मोहन कैबिनेट ने यूसीसी मसौदे को दी मंजूरी, निकाह हलाला होगा दंडनीय अपराध; लिन-इन के लिए सख्त नियम
Sun, 19 Jul 2026 01:51 PM IST
Anand Pawar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
Published by: Anand Pawar
Updated Sun, 19 Jul 2026 01:51 PM IST
सार
मुख्यमंत्री मोहन यादव की अध्यक्षता में आयोजित कैबिनेट बैठक में समान नागरिक संहिता के मसौदे को मंजूरी दे दी। इसमें विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों के लिए समान नियम होंगे। यूसीसी के मसौदे में अनुसूचित जनजाति समुदाय को बाहर रखा है। समिति ने उत्तराखंड, गुजरात और असम के यूसीसी मॉडल का अध्ययन कर मध्यप्रदेश का मसौदा तैयार किया गया।
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जगदीशपुर में मोहन कैबिनेट की बैठक
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मुख्यमंत्री मोहन यादव की अध्यक्षता में जगदीशपुर में कैबिनेट बैठक हुई। भोपाल से मुख्यमंत्री समेत पूरी कैबिनेट और अधिकारी ई-बस से जगदीशपुर पहुंचे। सीएम मोहन यादव ने कैबिनेट के निर्णयों की जानकारी देते हुए बताया कि सरकार ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए रिटायर्ड न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई समिति के मसौदे को मंजूरी दे दी। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह कानून किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार और समान न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से इस कानून का समर्थन करने की अपील भी की। मुख्यमंत्री ने बताया कि 27 अप्रैल 2026 को गठित सात सदस्यीय समिति ने विभिन्न राज्यों के यूसीसी मॉडल, प्रचलित कानूनों और सामाजिक पहलुओं का अध्ययन किया। सुझाव लेने के लिए वेब पोर्टल बनाया गया, जिसे 22 मई 2026 को सार्वजनिक किया गया। इसके अलावा प्रदेशभर में जिला और राज्य स्तर पर 50 से अधिक जन-परामर्श बैठकें आयोजित की गईं। सरकार के अनुसार पोर्टल पर 9,58,675 सुझाव प्राप्त हुए, जबकि बैठकों के माध्यम से भी 1,134 से अधिक सुझाव मिले। करीब 3.5 करोड़ एसएमएस भेजकर लोगों से राय ली गई।
सरकार का दावा है कि प्राप्त सुझावों में 93.54 प्रतिशत लोगों ने मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता लागू करने का समर्थन किया। वहीं 92.20 प्रतिशत लोगों ने सभी समुदायों में महिलाओं और पुरुषों के लिए समान कानून की वकालत की। 91.32 प्रतिशत लोगों ने भेदभावपूर्ण तलाक संबंधी प्रावधान समाप्त करने का समर्थन किया, जबकि 92.66 प्रतिशत लोगों ने महिलाओं और पुरुषों को संपत्ति में समान अधिकार दिए जाने की बात कही।
ये भी पढ़ें- MP News: सीएम मोहन यादव ने छोड़ा VIP काफिला, मंत्री और अफसर इलेक्ट्रिक बस से पहुंचेंगे कैबिनेट बैठक में
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बहुविवाह पर रोक, हर विवाह का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य
समान नागरिक संहिता में सभी समुदायों में केवल एक ही शादी (मोनोगैमी) को अनिवार्य बनाता है। कोई भी व्यक्ति एक समय में केवल एक ही जीवित जीवनसाथी के साथ शादीशुदा रह सकता है। विवाह के लिए पुरुषों की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं की 18 वर्ष तय की गई है। अमान्य सहमति और प्रतिबंधित रिश्तों (जब तक परंपरा की अनुमति न हो) के बीच विवाह पर रोक लगाई गई है। मौखिक तलाक या अनौपचारिक पंचायत के फैसलों को पूरी तरह गैर-कानूनी घोषित किया गया है। अब विवाह का समापन केवल कानून में बताए गए स्पष्ट और वैधानिक आधारों पर ही हो सकता है।
ये भी पढ़ें- जगदीशपुर बना आठवीं डेस्टिनेशन कैबिनेट का गवाह, गौरवशाली विभूतियों को सम्मान देने की परंपरा आगे बढ़ी
निकाह हलाला जैसी शर्तों को बढ़ावा देना अपराध
मौजूदा व्यवस्था के विपरीत, अब महिलाओं को भी यह अधिकार दिया गया है कि यदि उनके पति ने शादी के समय किसी दूसरी महिला को गर्भवती किया है, तो पत्नी शादी को रद्द घोषित करने की मांग कर सकती है।साथ ही संहिता में लोगों के लिए शादी और तलाक दोनों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया गया है। शहरी क्षेत्रों में 'MP ई-नगर पालिका पोर्टल' और ग्रामीण क्षेत्रों में SDM, नगरपालिका या पंचायत के जरिए यह प्रक्रिया पूरी होगी। रजिस्ट्रेशन न होने से शादी अमान्य नहीं होगी, लेकिन रजिस्ट्रार द्वारा बिना ठोस लिखित कारण के आवेदन खारिज करने पर जुर्माने का प्रावधान है। तलाक के बाद उसी जीवनसाथी से दोबारा शादी करने के लिए 'निकाह हलाला' जैसी अपमानजनक या नीचा दिखाने वाली शर्तों को मानना, बढ़ावा देना या मजबूर करना एक दंडनीय आपराधिक अपराध माना जाएगा।
अवैध शब्द को पूरी तरह हटाया
बच्चों के अधिकार और कस्टडी को लेकर संहिता में 'अवैध संतान' की अवधारणा समाप्त कर दी गई है। विवाह, लिव-इन, गोद लेने, सरोगेसी या असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (एआरटी) से जन्मे सभी बच्चों को समान कानूनी दर्जा मिलेगा। अभिरक्षा के मामलों में अदालत बच्चे के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता देगी।
उत्तराधिकार में समान अधिकार
बेटे और बेटियों को संपत्ति के उत्तराधिकार में समान अधिकार दिए गए हैं। उनकी वैवाहिक स्थिति कुछ भी हो। मृतक की संपत्ति में विधवाओं और विधुरों के साथ भी समान व्यवहार होगा। जीवित माता और पिता दोनों को क्लास-1 का उत्तराधिकारी माना गया है, और वे मृतक बच्चे की संपत्ति में जीवनसाथी और बच्चों के साथ बराबर का हिस्सा पाएंगे। कोई भी वयस्क अपनी स्वयं अर्जित या पैतृक संपत्ति की 100 प्रतिशत वसीयत अपनी इच्छा से कर सकेगा। हत्या जैसे गंभीर अपराध में दोषी व्यक्ति उत्तराधिकार का अधिकार खो देगा और यदि कोई कानूनी वारिस नहीं होगा तो संपत्ति राज्य के पास चली जाएगी।
एक माह के अंदर करना होगा रजिस्ट्रेशन
लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए साथ रहने की शुरुआत के एक महीने के भीतर रजिस्ट्रार के पास "लिव-इन रिलेशनशिप का बयान" जमा करना कानूनी रूप से अनिवार्य होगा। पार्टनर्स की न्यूनतम आयु 18 वर्ष होनी चाहिए। वे प्रतिबंधित श्रेणी में न हों, पहले से विवाहित न हों और उनकी सहमति स्वतंत्र होनी चाहिए। यदि कोई पार्टनर 21 साल से कम उम्र का है, तो लिव-इन के शुरू होने और खत्म होने की जानकारी उनके माता-पिता/अभिभावकों को भेजी जाएगी। रजिस्ट्रार यह रिकॉर्ड स्थानीय पुलिस स्टेशन को भी भेजेगा। लिव-इन से पैदा हुए बच्चों को वैध माना जाएगा और उन्हें पूर्ण उत्तराधिकार मिलेगा। यदि पुरुष पार्टनर महिला को छोड़ देता है, तो वह सक्षम अदालत के माध्यम से कानूनी पत्नी की तरह ही भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) का दावा कर सकती है।
तीन से छह माह की जेल का प्रावधान
बिना रजिस्ट्रेशन एक महीने से ज़्यादा साथ रहने पर 3 महीने तक की जेल या 10,000 जुर्माना हो सकता है। गलत जानकारी देने पर 3 महीने की जेल और 25,000 जुर्माना तथा रजिस्ट्रार के नोटिस के बाद भी बयान न देने पर 6 महीने तक की जेल और 25,000 का जुर्माना हो सकता है।
मध्य प्रदेश का यह प्रस्तावित यूनिफॉर्म सिविल कोड आधुनिक सामाजिक आवश्यकताओं, जेंडर इक्वलिटी और संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ करने वाला एक प्रगतिशील विधिक ढांचा है। यह समाज के सभी वर्गों (अनुसूचित जनजातियों को छोड़कर) में लैंगिक समानता लाने और कमजोर वर्गों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।
अनुसूचित जनजाति पर यूसीसी लागू नहीं होगा
संवैधानिक सुरक्षा-कवच का सम्मान करते हुए यह कानून संविधान के अनुच्छेद 342 और अनुच्छेद 366 (खंड 25) के तहत आने वाली अनुसूचित जनजातियों (जैसे भील, गोंड, कोरकू, बैगा, सहरिया और भारिया) पर लागू नहीं होगा। इसके अलावा, जिन समुदायों के पारंपरिक अधिकारों की रक्षा संविधान के भाग XXI के तहत की गई है, उन्हें भी इस कोड से विशेष रूप से बाहर रखा गया है। संहिता का परिभाषा वाला हिस्सा इसके अधिकार क्षेत्र को तय करता है। उत्तराधिकार से जुड़े जिन शब्दों की परिभाषा इसमें नहीं है, उनके लिए 'भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925' के अर्थ मान्य होंगे। डॉ. मोहन यादव ने कहा कि समान नागरिक संहिता का उद्देश्य समाज में विभाजन नहीं, बल्कि विश्वास, समानता, महिला सम्मान और सामाजिक समरसता को मजबूत करना है। उन्होंने कहा कि यह संविधान की मूल भावना के अनुरूप सभी नागरिकों के लिए समान न्याय और समान अवसर सुनिश्चित करने वाला कानून है। सरकार को उम्मीद है कि सभी दल और समाज के सभी वर्ग इस पहल का समर्थन करेंगे।
अनुसूचित जनजाती समुदाय को यूसीसी से रखा बाहर
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जनजातियों, संरक्षित रूढ़िगत समुदायों तथा घुमंतू एवं अर्धघुमंतू जनजातियों को यूसीसी के दायरे से बाहर रखा गया है। धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पद्धतियों और रीति-रिवाजों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं होगा। सभी धर्मों को अपने धार्मिक आचरण की स्वतंत्रता पूर्ववत मिलेगी।
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ईज ऑफ डूइंग बिजनेस विधेयक-2026
कैबिनेट ने ईज ऑफ डूइंग बिजनेस विधेयक-2026 को भी मंजूरी दी। इसमें कारोबार और निवेश से जुड़ी स्वीकृतियों को एक छत के नीचे लाने की व्यवस्था की गई है। विभिन्न विभागों की मंजूरियों का समन्वित और समयबद्ध निपटारा होगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि नीति सुधारों के क्रियान्वयन में मध्य प्रदेश देश के अग्रणी राज्यों में शामिल है।
अग्निशमन एवं आपातकालीन सेवा विधेयक-2026
बैठक में मध्य प्रदेश अग्निशमन एवं आपातकालीन सेवा विधेयक-2026 को भी स्वीकृति दी है। इसमें विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय और आधुनिक आपातकालीन व्यवस्था पर जोर दिया गया है। आग से बचाव और त्वरित राहत व्यवस्था को मजबूत किया जाएगा। इसके तहत 15 मीटर या उससे अधिक ऊंची बहुमंजिला इमारतों, 500 से अधिक विद्यार्थियों वाले स्कूलों, 15 या उससे अधिक कमरों वाले होटलों, 50 से अधिक बिस्तरों वाले अस्पतालों, मॉल और अन्य बड़े व्यावसायिक परिसरों के लिए फायर एनओसी अनिवार्य करने का प्रस्ताव है।
निजी विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक-2026
निजी विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक-2026 को भी बैठक में मंजूरी दी गई है। इसमें निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना और संचालन से जुड़े प्रावधानों में संशोधन किया गया है। साथ ही उच्च शिक्षा क्षेत्र में निवेश और संस्थानों के विस्तार का रास्ता आसान होगा। इसके तहत सरकार ने अब भूमि और एंडोमेंट फंड की अनिवार्यता समाप्त करने का प्रस्ताव रखा है।
चिकित्सा शिक्षा में बड़ा बदलाव
सरकार ने मध्यप्रदेश धन्वंतरि स्वास्थ्य विश्वविद्यालय विधेयक 2026 और मध्यप्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय (संशोधन) विधेयक, 2026 को अनुमोदन दिया है। इसमें एक मेडिकल यूनिवर्सिटी की जगह अब दो स्वास्थ्य विश्वविद्यालय होंगे। जबलपुर स्थित विश्वविद्यालय को विकसित कर चिकित्सा शिक्षा का विस्तार किया जाएगा। मेडिकल, नर्सिंग और पैरामेडिकल परीक्षाओं के संचालन में आने वाली दिक्कतें कम होंगी।
राजमार्ग कानून में संशोधन
सरकार ने राजमार्ग कानून में संशोधन को स्वीकृति दी है। इसके तहत अंग्रेजों के समय के पुराने और अप्रासंगिक प्रावधानों को हटाया जाएगा। आधुनिक जरूरतों के अनुरूप नया राजमार्ग कानून लागू होगा।
श्रम कानूनों में सुधार
बैठक में मध्यप्रदेश कोड ऑन एम्पावरिंग वर्कस्पेसेज, 2026 (मध्यप्रदेश श्रम शक्ति संहिता 2026) का अनुमोदन को स्वीकृति दी हैं। इसके तहत उद्योगों में कार्यरत श्रमिकों के हितों को ध्यान में रखते हुए संशोधन किया गया है। इसके तहत राज्य के छह पुराने श्रम कानून समाप्त कर एकीकृत कानून लागू किया जाएगा। थिएटर, रेस्टोरेंट और अन्य प्रतिष्ठानों को 24×7 संचालन, तीन शिफ्ट में काम की व्यवस्था तथा नए प्रतिष्ठानों के पंजीयन में इंस्पेक्टर सत्यापन की अनिवार्यता समाप्त करने का प्रस्ताव है।
मध्यप्रदेश समान नागरिक संहिता, 2026" के विधेयक का अनुमोदन
कैबिनेट ने समानता और न्याय की भावना को समर्पित "मध्यप्रदेश समान नागरिक संहिता, 2026" के विधेयक का अनुमोदन किया। साथ ही आवश्यक संवैधानिक एवं प्रक्रियात्मक औपचारिकताएं पूर्ण कर मध्यप्रदेश विधानसभा में प्रस्तुत करने के लिए विधि और विधायी कार्य विभाग को अधिकृत किया गया।
मध्यप्रदेश निरसन विधेयक, 2026" का अनुमोदन
कैबिनेट ने "मध्यप्रदेश निरसन विधेयक, 2026" का अनुमोदन किया। साथ ही विधेयक को विधानसभा में पुनःस्थापित कर पारित कराने एवं समस्त आवश्यक कार्यवाही करने के लिए विधि और विधायी कार्य विभाग को अधिकृत किया गया।
प्रदेश में 73 स्वास्थ्य संस्थाओं के उन्नयन के लिए 776 करोड़ 13 लाख रूपये की स्वीकृति
कैबिनेट ने प्रदेश के नागरिकों को गुणवतापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं की सहज एवं सुलभ पहुंच सुनिश्चित करने के लिए प्रदेश के 73 उप स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और सिविल अस्पताल में उन्नयन के लिए 776 करोड़ 13 लाख रूपये की स्वीकृति दी है। कैबिनेट ने 29 उप स्वास्थ्य केंद्रों का उन्नयन 6-बिस्तरीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 19 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का उन्नयन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में, 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को 50 बिस्तरीय सिविल अस्पताल में और 7 संस्थाओं को 100 बिस्तरीय अस्पताल में उन्नयन को मंजूरी दी। इन संस्थाओं में 1600 नियमित एवं 71 संविदा के नवीन पदों के सृजन तथा कुल 560 व्यक्तियों को आउटसोर्सिंग एजेन्सी के माध्यम से कार्य पर रखे जाने की स्वीकृति प्रदान की गई है।इस पर प्रति वर्ष 122.83 करोड़ रुपए के व्यय की भी मंत्रिपरिषद द्वारा स्वीकृति प्रदान की है।स्वास्थ्य संस्थाओं की स्थापना और उन्नयन से क्षेत्र की जनता तथा आस-पास के क्षेत्रों की जनता को बेहतर चिकित्सा सुविधायें उपलब्ध हो सकेंगी
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सरकार का दावा है कि प्राप्त सुझावों में 93.54 प्रतिशत लोगों ने मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता लागू करने का समर्थन किया। वहीं 92.20 प्रतिशत लोगों ने सभी समुदायों में महिलाओं और पुरुषों के लिए समान कानून की वकालत की। 91.32 प्रतिशत लोगों ने भेदभावपूर्ण तलाक संबंधी प्रावधान समाप्त करने का समर्थन किया, जबकि 92.66 प्रतिशत लोगों ने महिलाओं और पुरुषों को संपत्ति में समान अधिकार दिए जाने की बात कही।
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बहुविवाह पर रोक, हर विवाह का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य
समान नागरिक संहिता में सभी समुदायों में केवल एक ही शादी (मोनोगैमी) को अनिवार्य बनाता है। कोई भी व्यक्ति एक समय में केवल एक ही जीवित जीवनसाथी के साथ शादीशुदा रह सकता है। विवाह के लिए पुरुषों की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं की 18 वर्ष तय की गई है। अमान्य सहमति और प्रतिबंधित रिश्तों (जब तक परंपरा की अनुमति न हो) के बीच विवाह पर रोक लगाई गई है। मौखिक तलाक या अनौपचारिक पंचायत के फैसलों को पूरी तरह गैर-कानूनी घोषित किया गया है। अब विवाह का समापन केवल कानून में बताए गए स्पष्ट और वैधानिक आधारों पर ही हो सकता है।
ये भी पढ़ें- जगदीशपुर बना आठवीं डेस्टिनेशन कैबिनेट का गवाह, गौरवशाली विभूतियों को सम्मान देने की परंपरा आगे बढ़ी
निकाह हलाला जैसी शर्तों को बढ़ावा देना अपराध
मौजूदा व्यवस्था के विपरीत, अब महिलाओं को भी यह अधिकार दिया गया है कि यदि उनके पति ने शादी के समय किसी दूसरी महिला को गर्भवती किया है, तो पत्नी शादी को रद्द घोषित करने की मांग कर सकती है।साथ ही संहिता में लोगों के लिए शादी और तलाक दोनों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया गया है। शहरी क्षेत्रों में 'MP ई-नगर पालिका पोर्टल' और ग्रामीण क्षेत्रों में SDM, नगरपालिका या पंचायत के जरिए यह प्रक्रिया पूरी होगी। रजिस्ट्रेशन न होने से शादी अमान्य नहीं होगी, लेकिन रजिस्ट्रार द्वारा बिना ठोस लिखित कारण के आवेदन खारिज करने पर जुर्माने का प्रावधान है। तलाक के बाद उसी जीवनसाथी से दोबारा शादी करने के लिए 'निकाह हलाला' जैसी अपमानजनक या नीचा दिखाने वाली शर्तों को मानना, बढ़ावा देना या मजबूर करना एक दंडनीय आपराधिक अपराध माना जाएगा।
अवैध शब्द को पूरी तरह हटाया
बच्चों के अधिकार और कस्टडी को लेकर संहिता में 'अवैध संतान' की अवधारणा समाप्त कर दी गई है। विवाह, लिव-इन, गोद लेने, सरोगेसी या असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (एआरटी) से जन्मे सभी बच्चों को समान कानूनी दर्जा मिलेगा। अभिरक्षा के मामलों में अदालत बच्चे के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता देगी।
उत्तराधिकार में समान अधिकार
बेटे और बेटियों को संपत्ति के उत्तराधिकार में समान अधिकार दिए गए हैं। उनकी वैवाहिक स्थिति कुछ भी हो। मृतक की संपत्ति में विधवाओं और विधुरों के साथ भी समान व्यवहार होगा। जीवित माता और पिता दोनों को क्लास-1 का उत्तराधिकारी माना गया है, और वे मृतक बच्चे की संपत्ति में जीवनसाथी और बच्चों के साथ बराबर का हिस्सा पाएंगे। कोई भी वयस्क अपनी स्वयं अर्जित या पैतृक संपत्ति की 100 प्रतिशत वसीयत अपनी इच्छा से कर सकेगा। हत्या जैसे गंभीर अपराध में दोषी व्यक्ति उत्तराधिकार का अधिकार खो देगा और यदि कोई कानूनी वारिस नहीं होगा तो संपत्ति राज्य के पास चली जाएगी।
एक माह के अंदर करना होगा रजिस्ट्रेशन
लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए साथ रहने की शुरुआत के एक महीने के भीतर रजिस्ट्रार के पास "लिव-इन रिलेशनशिप का बयान" जमा करना कानूनी रूप से अनिवार्य होगा। पार्टनर्स की न्यूनतम आयु 18 वर्ष होनी चाहिए। वे प्रतिबंधित श्रेणी में न हों, पहले से विवाहित न हों और उनकी सहमति स्वतंत्र होनी चाहिए। यदि कोई पार्टनर 21 साल से कम उम्र का है, तो लिव-इन के शुरू होने और खत्म होने की जानकारी उनके माता-पिता/अभिभावकों को भेजी जाएगी। रजिस्ट्रार यह रिकॉर्ड स्थानीय पुलिस स्टेशन को भी भेजेगा। लिव-इन से पैदा हुए बच्चों को वैध माना जाएगा और उन्हें पूर्ण उत्तराधिकार मिलेगा। यदि पुरुष पार्टनर महिला को छोड़ देता है, तो वह सक्षम अदालत के माध्यम से कानूनी पत्नी की तरह ही भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) का दावा कर सकती है।
तीन से छह माह की जेल का प्रावधान
बिना रजिस्ट्रेशन एक महीने से ज़्यादा साथ रहने पर 3 महीने तक की जेल या 10,000 जुर्माना हो सकता है। गलत जानकारी देने पर 3 महीने की जेल और 25,000 जुर्माना तथा रजिस्ट्रार के नोटिस के बाद भी बयान न देने पर 6 महीने तक की जेल और 25,000 का जुर्माना हो सकता है।
मध्य प्रदेश का यह प्रस्तावित यूनिफॉर्म सिविल कोड आधुनिक सामाजिक आवश्यकताओं, जेंडर इक्वलिटी और संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ करने वाला एक प्रगतिशील विधिक ढांचा है। यह समाज के सभी वर्गों (अनुसूचित जनजातियों को छोड़कर) में लैंगिक समानता लाने और कमजोर वर्गों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।
अनुसूचित जनजाति पर यूसीसी लागू नहीं होगा
संवैधानिक सुरक्षा-कवच का सम्मान करते हुए यह कानून संविधान के अनुच्छेद 342 और अनुच्छेद 366 (खंड 25) के तहत आने वाली अनुसूचित जनजातियों (जैसे भील, गोंड, कोरकू, बैगा, सहरिया और भारिया) पर लागू नहीं होगा। इसके अलावा, जिन समुदायों के पारंपरिक अधिकारों की रक्षा संविधान के भाग XXI के तहत की गई है, उन्हें भी इस कोड से विशेष रूप से बाहर रखा गया है। संहिता का परिभाषा वाला हिस्सा इसके अधिकार क्षेत्र को तय करता है। उत्तराधिकार से जुड़े जिन शब्दों की परिभाषा इसमें नहीं है, उनके लिए 'भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925' के अर्थ मान्य होंगे। डॉ. मोहन यादव ने कहा कि समान नागरिक संहिता का उद्देश्य समाज में विभाजन नहीं, बल्कि विश्वास, समानता, महिला सम्मान और सामाजिक समरसता को मजबूत करना है। उन्होंने कहा कि यह संविधान की मूल भावना के अनुरूप सभी नागरिकों के लिए समान न्याय और समान अवसर सुनिश्चित करने वाला कानून है। सरकार को उम्मीद है कि सभी दल और समाज के सभी वर्ग इस पहल का समर्थन करेंगे।
अनुसूचित जनजाती समुदाय को यूसीसी से रखा बाहर
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जनजातियों, संरक्षित रूढ़िगत समुदायों तथा घुमंतू एवं अर्धघुमंतू जनजातियों को यूसीसी के दायरे से बाहर रखा गया है। धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पद्धतियों और रीति-रिवाजों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं होगा। सभी धर्मों को अपने धार्मिक आचरण की स्वतंत्रता पूर्ववत मिलेगी।
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ईज ऑफ डूइंग बिजनेस विधेयक-2026
कैबिनेट ने ईज ऑफ डूइंग बिजनेस विधेयक-2026 को भी मंजूरी दी। इसमें कारोबार और निवेश से जुड़ी स्वीकृतियों को एक छत के नीचे लाने की व्यवस्था की गई है। विभिन्न विभागों की मंजूरियों का समन्वित और समयबद्ध निपटारा होगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि नीति सुधारों के क्रियान्वयन में मध्य प्रदेश देश के अग्रणी राज्यों में शामिल है।
अग्निशमन एवं आपातकालीन सेवा विधेयक-2026
बैठक में मध्य प्रदेश अग्निशमन एवं आपातकालीन सेवा विधेयक-2026 को भी स्वीकृति दी है। इसमें विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय और आधुनिक आपातकालीन व्यवस्था पर जोर दिया गया है। आग से बचाव और त्वरित राहत व्यवस्था को मजबूत किया जाएगा। इसके तहत 15 मीटर या उससे अधिक ऊंची बहुमंजिला इमारतों, 500 से अधिक विद्यार्थियों वाले स्कूलों, 15 या उससे अधिक कमरों वाले होटलों, 50 से अधिक बिस्तरों वाले अस्पतालों, मॉल और अन्य बड़े व्यावसायिक परिसरों के लिए फायर एनओसी अनिवार्य करने का प्रस्ताव है।
निजी विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक-2026
निजी विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक-2026 को भी बैठक में मंजूरी दी गई है। इसमें निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना और संचालन से जुड़े प्रावधानों में संशोधन किया गया है। साथ ही उच्च शिक्षा क्षेत्र में निवेश और संस्थानों के विस्तार का रास्ता आसान होगा। इसके तहत सरकार ने अब भूमि और एंडोमेंट फंड की अनिवार्यता समाप्त करने का प्रस्ताव रखा है।
चिकित्सा शिक्षा में बड़ा बदलाव
सरकार ने मध्यप्रदेश धन्वंतरि स्वास्थ्य विश्वविद्यालय विधेयक 2026 और मध्यप्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय (संशोधन) विधेयक, 2026 को अनुमोदन दिया है। इसमें एक मेडिकल यूनिवर्सिटी की जगह अब दो स्वास्थ्य विश्वविद्यालय होंगे। जबलपुर स्थित विश्वविद्यालय को विकसित कर चिकित्सा शिक्षा का विस्तार किया जाएगा। मेडिकल, नर्सिंग और पैरामेडिकल परीक्षाओं के संचालन में आने वाली दिक्कतें कम होंगी।
राजमार्ग कानून में संशोधन
सरकार ने राजमार्ग कानून में संशोधन को स्वीकृति दी है। इसके तहत अंग्रेजों के समय के पुराने और अप्रासंगिक प्रावधानों को हटाया जाएगा। आधुनिक जरूरतों के अनुरूप नया राजमार्ग कानून लागू होगा।
श्रम कानूनों में सुधार
बैठक में मध्यप्रदेश कोड ऑन एम्पावरिंग वर्कस्पेसेज, 2026 (मध्यप्रदेश श्रम शक्ति संहिता 2026) का अनुमोदन को स्वीकृति दी हैं। इसके तहत उद्योगों में कार्यरत श्रमिकों के हितों को ध्यान में रखते हुए संशोधन किया गया है। इसके तहत राज्य के छह पुराने श्रम कानून समाप्त कर एकीकृत कानून लागू किया जाएगा। थिएटर, रेस्टोरेंट और अन्य प्रतिष्ठानों को 24×7 संचालन, तीन शिफ्ट में काम की व्यवस्था तथा नए प्रतिष्ठानों के पंजीयन में इंस्पेक्टर सत्यापन की अनिवार्यता समाप्त करने का प्रस्ताव है।
मध्यप्रदेश समान नागरिक संहिता, 2026" के विधेयक का अनुमोदन
कैबिनेट ने समानता और न्याय की भावना को समर्पित "मध्यप्रदेश समान नागरिक संहिता, 2026" के विधेयक का अनुमोदन किया। साथ ही आवश्यक संवैधानिक एवं प्रक्रियात्मक औपचारिकताएं पूर्ण कर मध्यप्रदेश विधानसभा में प्रस्तुत करने के लिए विधि और विधायी कार्य विभाग को अधिकृत किया गया।
मध्यप्रदेश निरसन विधेयक, 2026" का अनुमोदन
कैबिनेट ने "मध्यप्रदेश निरसन विधेयक, 2026" का अनुमोदन किया। साथ ही विधेयक को विधानसभा में पुनःस्थापित कर पारित कराने एवं समस्त आवश्यक कार्यवाही करने के लिए विधि और विधायी कार्य विभाग को अधिकृत किया गया।
प्रदेश में 73 स्वास्थ्य संस्थाओं के उन्नयन के लिए 776 करोड़ 13 लाख रूपये की स्वीकृति
कैबिनेट ने प्रदेश के नागरिकों को गुणवतापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं की सहज एवं सुलभ पहुंच सुनिश्चित करने के लिए प्रदेश के 73 उप स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और सिविल अस्पताल में उन्नयन के लिए 776 करोड़ 13 लाख रूपये की स्वीकृति दी है। कैबिनेट ने 29 उप स्वास्थ्य केंद्रों का उन्नयन 6-बिस्तरीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 19 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का उन्नयन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में, 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को 50 बिस्तरीय सिविल अस्पताल में और 7 संस्थाओं को 100 बिस्तरीय अस्पताल में उन्नयन को मंजूरी दी। इन संस्थाओं में 1600 नियमित एवं 71 संविदा के नवीन पदों के सृजन तथा कुल 560 व्यक्तियों को आउटसोर्सिंग एजेन्सी के माध्यम से कार्य पर रखे जाने की स्वीकृति प्रदान की गई है।इस पर प्रति वर्ष 122.83 करोड़ रुपए के व्यय की भी मंत्रिपरिषद द्वारा स्वीकृति प्रदान की है।स्वास्थ्य संस्थाओं की स्थापना और उन्नयन से क्षेत्र की जनता तथा आस-पास के क्षेत्रों की जनता को बेहतर चिकित्सा सुविधायें उपलब्ध हो सकेंगी
