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दतिया से भाजपा को गहरा दंश: बड़े नेताओं का टिकट काटना आसान नहीं, अब एंटी-इनकंबेंसी से ज्यादा भीतरघात का डर
Thu, 13 Aug 2026 06:44 PM IST
Anand Pawar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
Published by: Anand Pawar
Updated Thu, 13 Aug 2026 06:44 PM IST
सार
दतिया विधानसभा उपचुनाव में मिली हार ने भाजपा को उम्मीदवारों के चयन की रणनीति पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। अब पार्टी के सामने बड़े नेताओं के टिकट, एंटी-इनकंबेंसी और संगठन में संतुलन बनाए रखने की चुनौती है।
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भाजपा का झंडा
- फोटो : ANI
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विस्तार
दतिया विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने भाजपा को सिर्फ एक सीट का नुकसान नहीं पहुंचाया, बल्कि गहरा दंश दिया है। इससे लग रहा है कि सत्तारूढ़ दल के लिए दो वर्ष बाद होने वाले विस चुनाव में बड़े नेताओं का टिकट काटना आसान नहीं होगा। यदि पार्टी ने ऐसा किया तो सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इनकंबेंसी) से बड़ा खतरा भीतरघात को होगा। दतिया के नतीजों से विधानसभा चुनाव 2028 को लेकर कई नए सवाल भी खड़े हो गए हैं। पार्टी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह उम्मीदवारों के चयन में बदलाव और संगठन के बीच संतुलन कैसे बनाएं।
दतिया में पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर भाजपा ने नए चेहरे आशुतोष तिवारी पर दांव लगाया था, लेकिन चुनाव परिणाम पार्टी के पक्ष में नहीं रहा। चुनाव के दौरान संगठन के भीतर असंतोष की चर्चाएं भी सामने आईं। कई पदाधिकारियों की नाराजगी और कार्यकर्ताओं के भीतरघात की चर्चाओं ने भाजपा नेतृत्व को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
मध्य प्रदेश के कई वरिष्ठ भाजपा नेताओं की दिल्ली में लगातार हुई मुलाकातों ने राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया है। दतिया उपचुनाव के बाद पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा और विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात को लेकर अलग-अलग अटकलें लगाई जा रही हैं। वहीं, वरिष्ठ नेता व मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात को भी राजनीतिक नजरिए से देखा गया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी हाल के दिनों में दिल्ली पहुंचे और पार्टी नेतृत्व से मुलाकात की। इन मुलाकातों को मध्य प्रदेश की मौजूदा सियासी परिस्थितियों से जोड़कर देखा जा रहा है।
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टिकट वितरण पर आएंगी आंच
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि दतिया का अनुभव 2028 के विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण की रणनीति को प्रभावित कर सकता है। पार्टी के सामने अब दो विकल्प हैं। पहला, लंबे समय से चुनाव लड़ रहे नेताओं को ही दोबारा मौका दिया जाए और दूसरा यह कि नए चेहरों को आगे लाया जाए। दोनों ही स्थितियों में भाजपा को अलग-अलग चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। यदि पार्टी पुराने नेताओं को फिर से मैदान में उतारती है तो उसे एंटी-इनकंबेंसी का सामना करना पड़ सकता है। कई क्षेत्रों में मतदाता बदलाव को पसंद कर सकते हैं। दूसरी ओर, यदि पार्टी बड़े नेताओं के टिकट काटती है तो स्थानीय संगठन और उनके समर्थकों की नाराजगी एंटी-इनकंबेंसी की तुलना में ज्यादा चुनावी नुकसान का कारण बन सकती है। इसी वजह से भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। पार्टी के भीतर इस बात पर मंथन होना तय माना जा रहा है कि लंबे समय से सक्रिय नेताओं की भूमिका क्या होगी? और आने वाले चुनाव में उनकी जिम्मेदारी किस तरह तय की जाएगी?
ये भी पढ़ें- भाजपा की टीम नवीन की सुगबुगाहट तेज: एमपी के चार चेहरों पर नजर, पीएम मोदी से वीडी शर्मा की मुलाकात ने बढ़ाई हलचल
बदलाव व संगठन में संतुलन की चुनौती
दतिया उपचुनाव के बाद जिस तरह प्रदेश के कई बड़े नेता दिल्ली पहुंचे, उससे यह चर्चा और तेज हो गई है कि भाजपा 2028 की रणनीति पर अभी से काम शुरू कर चुकी है। दतिया ने भाजपा को यह संदेश जरूर दिया है कि उम्मीदवार बदलना सिर्फ एक राजनीतिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह संगठनात्मक प्रबंधन की भी बड़ी परीक्षा है। ऐसे में 2028 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के लिए सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि वह बदलाव और संगठन के बीच संतुलन कैसे बनाए? आने वाले समय में भाजपा के लिए चुनौती केवल टिकट तय करने की नहीं होगी, बल्कि नेताओं, कार्यकर्ताओं और संगठन को एक साथ लेकर चलने की भी होगी। यही रणनीति 2028 के चुनाव में पार्टी की दिशा तय कर सकती है।
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दतिया में पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर भाजपा ने नए चेहरे आशुतोष तिवारी पर दांव लगाया था, लेकिन चुनाव परिणाम पार्टी के पक्ष में नहीं रहा। चुनाव के दौरान संगठन के भीतर असंतोष की चर्चाएं भी सामने आईं। कई पदाधिकारियों की नाराजगी और कार्यकर्ताओं के भीतरघात की चर्चाओं ने भाजपा नेतृत्व को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
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मध्य प्रदेश के कई वरिष्ठ भाजपा नेताओं की दिल्ली में लगातार हुई मुलाकातों ने राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया है। दतिया उपचुनाव के बाद पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा और विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात को लेकर अलग-अलग अटकलें लगाई जा रही हैं। वहीं, वरिष्ठ नेता व मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात को भी राजनीतिक नजरिए से देखा गया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी हाल के दिनों में दिल्ली पहुंचे और पार्टी नेतृत्व से मुलाकात की। इन मुलाकातों को मध्य प्रदेश की मौजूदा सियासी परिस्थितियों से जोड़कर देखा जा रहा है।
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टिकट वितरण पर आएंगी आंच
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि दतिया का अनुभव 2028 के विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण की रणनीति को प्रभावित कर सकता है। पार्टी के सामने अब दो विकल्प हैं। पहला, लंबे समय से चुनाव लड़ रहे नेताओं को ही दोबारा मौका दिया जाए और दूसरा यह कि नए चेहरों को आगे लाया जाए। दोनों ही स्थितियों में भाजपा को अलग-अलग चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। यदि पार्टी पुराने नेताओं को फिर से मैदान में उतारती है तो उसे एंटी-इनकंबेंसी का सामना करना पड़ सकता है। कई क्षेत्रों में मतदाता बदलाव को पसंद कर सकते हैं। दूसरी ओर, यदि पार्टी बड़े नेताओं के टिकट काटती है तो स्थानीय संगठन और उनके समर्थकों की नाराजगी एंटी-इनकंबेंसी की तुलना में ज्यादा चुनावी नुकसान का कारण बन सकती है। इसी वजह से भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। पार्टी के भीतर इस बात पर मंथन होना तय माना जा रहा है कि लंबे समय से सक्रिय नेताओं की भूमिका क्या होगी? और आने वाले चुनाव में उनकी जिम्मेदारी किस तरह तय की जाएगी?
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बदलाव व संगठन में संतुलन की चुनौती
दतिया उपचुनाव के बाद जिस तरह प्रदेश के कई बड़े नेता दिल्ली पहुंचे, उससे यह चर्चा और तेज हो गई है कि भाजपा 2028 की रणनीति पर अभी से काम शुरू कर चुकी है। दतिया ने भाजपा को यह संदेश जरूर दिया है कि उम्मीदवार बदलना सिर्फ एक राजनीतिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह संगठनात्मक प्रबंधन की भी बड़ी परीक्षा है। ऐसे में 2028 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के लिए सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि वह बदलाव और संगठन के बीच संतुलन कैसे बनाए? आने वाले समय में भाजपा के लिए चुनौती केवल टिकट तय करने की नहीं होगी, बल्कि नेताओं, कार्यकर्ताओं और संगठन को एक साथ लेकर चलने की भी होगी। यही रणनीति 2028 के चुनाव में पार्टी की दिशा तय कर सकती है।
