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एम्स भोपाल का रिसर्च: फैटी लिवर की शुरुआती पहचान अब बिना जटिल जांचों के, नए बायोमार्कर से चलेगा बीमारी पता
न्यूज डेस्क,अमर उजाला भोपाल
Published by: संदीप तिवारी
Updated Tue, 20 Jan 2026 06:16 PM IST
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सार
एम्स भोपाल ने फैटी लिवर रोग की शुरुआती पहचान के लिए नए गैर-आक्रामक बायोमार्कर खोजे हैं। शोध में एडिपोनेक्टिन, आइरिसिन और साइटोकाइन-18 को बीमारी की गंभीरता से जुड़ा पाया गया है, जिससे बिना बायोप्सी सटीक जांच और जोखिम आकलन संभव होगा। यह खोज फैटी लिवर की समय पर पहचान और बेहतर इलाज की दिशा में अहम मानी जा रही है।
एम्स भोपाल
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
फैटी लिवर जैसी तेजी से बढ़ती बीमारी की शुरुआती और सटीक पहचान को लेकर एम्स भोपाल के वैज्ञानिकों ने बड़ी सफलता हासिल की है। एम्स भोपाल के जैव रसायन विभाग ने नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) की पहचान के लिए नए गैर-आक्रामक बायोमार्कर खोजे हैं, जो महंगी और जटिल जांचों का विकल्प बन सकते हैं।
तीन बायोमार्कर बने गेमचेंजर
शोध में एडिपोनेक्टिन, आइरिसिन और साइटोकाइन-18 को फैटी लिवर की गंभीरता से सीधे जुड़ा पाया गया है। अध्ययन के मुताबिक बीमारी बढ़ने के साथ एडिपोनेक्टिन और आइरिसिन घटते हैं, जबकि साइटोकाइन-18 का स्तर बढ़ता है,जो लिवर कोशिकाओं को हो रहे नुकसान का स्पष्ट संकेत देता है।यह महत्वपूर्ण शोध एम्स भोपाल के जैव रसायन विभाग की डॉ. दीपा रोशनी द्वारा प्रस्तुत किया गया है, जिसे विशेषज्ञों की टीम के मार्गदर्शन में अंजाम दिया गया।
बायोप्सी से मिलेगी राहत
अब तक फैटी लिवर की पहचान के लिए लिवर एंजाइम, अल्ट्रासाउंड, फाइब्रोस्कैन और बायोप्सी जैसी जटिल जांचों पर निर्भर रहना पड़ता था। यह शोध बताता है कि इन बायोमार्कर के जरिए गैर-आक्रामक तरीके से बीमारी की शुरुआती पहचान और जोखिम आकलन संभव है।
यह भी पढ़ें-मध्य प्रदेश में तेज ठंड से फिलहाल राहत, जनवरी के आखिरी दिनों में फिर लौटेगी कंपकंपी
डेटा ने खोले गंभीर संकेत
अध्ययन में बॉडी मास इंडेक्स (BMI), लिवर एंजाइम और लिपिड प्रोफाइल में बदलाव के साथ इन बायोमार्कर का मजबूत संबंध सामने आया। साइटोकाइन-18 की पहचान क्षमता सबसे अधिक पाई गई, जबकि तीनों बायोमार्कर को एक साथ देखने पर बीमारी की गंभीरता का बेहतर आकलन संभव हुआ।
यह भी पढ़ें-दिग्विजय सिंह का BJP-RSS पर तीखा प्रहार, बोले-डर की राजनीति कर रहे, देश नहीं अब मोहल्ले बांट रहे
मरीजों की सटीक, सुरक्षित और किफायती जांच
यह शोध डॉ. दीपा रोशनी द्वारा वरिष्ठ चिकित्सकों के मार्गदर्शन में किया गया। इस अवसर पर एम्स भोपाल के कार्यकारी निदेशक प्रो. (डॉ.) माधवनन्द कर ने कहा कि यह अध्ययन फैटी लिवर जैसी तेजी से बढ़ती बीमारी की समय पर पहचान में अहम भूमिका निभाएगा और मरीजों को सटीक, सुरक्षित और किफायती जांच उपलब्ध कराएगा। फैटी लिवर अब चुपचाप नहीं बढ़ेगा।एम्स भोपाल की यह खोज अर्ली डिटेक्शन, जोखिम निर्धारण और बेहतर इलाज की दिशा में बड़ी कामयाबी है।
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तीन बायोमार्कर बने गेमचेंजर
शोध में एडिपोनेक्टिन, आइरिसिन और साइटोकाइन-18 को फैटी लिवर की गंभीरता से सीधे जुड़ा पाया गया है। अध्ययन के मुताबिक बीमारी बढ़ने के साथ एडिपोनेक्टिन और आइरिसिन घटते हैं, जबकि साइटोकाइन-18 का स्तर बढ़ता है,जो लिवर कोशिकाओं को हो रहे नुकसान का स्पष्ट संकेत देता है।यह महत्वपूर्ण शोध एम्स भोपाल के जैव रसायन विभाग की डॉ. दीपा रोशनी द्वारा प्रस्तुत किया गया है, जिसे विशेषज्ञों की टीम के मार्गदर्शन में अंजाम दिया गया।
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बायोप्सी से मिलेगी राहत
अब तक फैटी लिवर की पहचान के लिए लिवर एंजाइम, अल्ट्रासाउंड, फाइब्रोस्कैन और बायोप्सी जैसी जटिल जांचों पर निर्भर रहना पड़ता था। यह शोध बताता है कि इन बायोमार्कर के जरिए गैर-आक्रामक तरीके से बीमारी की शुरुआती पहचान और जोखिम आकलन संभव है।
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डेटा ने खोले गंभीर संकेत
अध्ययन में बॉडी मास इंडेक्स (BMI), लिवर एंजाइम और लिपिड प्रोफाइल में बदलाव के साथ इन बायोमार्कर का मजबूत संबंध सामने आया। साइटोकाइन-18 की पहचान क्षमता सबसे अधिक पाई गई, जबकि तीनों बायोमार्कर को एक साथ देखने पर बीमारी की गंभीरता का बेहतर आकलन संभव हुआ।
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मरीजों की सटीक, सुरक्षित और किफायती जांच
यह शोध डॉ. दीपा रोशनी द्वारा वरिष्ठ चिकित्सकों के मार्गदर्शन में किया गया। इस अवसर पर एम्स भोपाल के कार्यकारी निदेशक प्रो. (डॉ.) माधवनन्द कर ने कहा कि यह अध्ययन फैटी लिवर जैसी तेजी से बढ़ती बीमारी की समय पर पहचान में अहम भूमिका निभाएगा और मरीजों को सटीक, सुरक्षित और किफायती जांच उपलब्ध कराएगा। फैटी लिवर अब चुपचाप नहीं बढ़ेगा।एम्स भोपाल की यह खोज अर्ली डिटेक्शन, जोखिम निर्धारण और बेहतर इलाज की दिशा में बड़ी कामयाबी है।

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