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दतिया का रण: क्या भाजपा वापस पाएगी अपना गढ़ या कांग्रेस दोहराएगी जीत? ओबीसी वोटर बनेंगे किंगमेकर

Fri, 03 Jul 2026 09:11 PM IST
Anand Pawar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल Published by: Anand Pawar Updated Fri, 03 Jul 2026 09:11 PM IST
सार

MP By Election: दतिया विधानसभा उपचुनाव का बिगुल बजते ही प्रदेश की सियासत गरमा गई है। भाजपा के लिए खोया गढ़ वापस पाने और कांग्रेस के लिए अपनी जीत बचाए रखने की चुनौती के बीच इस बार ओबीसी वोटर चुनाव के सबसे बड़े निर्णायक माने जा रहे हैं।

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Battle for Datia: Will the BJP reclaim its stronghold, or will the Congress repeat its victory? OBC voters to
दतिया विधानसभा उपचुनाव - फोटो : अमर उजाला
दतिया विधानसभा उपचुनाव मध्य प्रदेश की सबसे चर्चित राजनीतिक लड़ाइयों में शामिल हो चुका है। चुनााव आयोग के तारीखों के एलान के साथ ही सियासी गर्मी बढ़ गई है। यहां पर 30 जुलाई को मतदान हो और 3 अगस्त को नतीजे आएंगे। दतिया उपचुनाव भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रश्न है। भाजपा इस सीट पर दोबारा कब्जा कर अपना खोया गढ़ वापस पाना चाहती है, जबकि कांग्रेस के सामने 2023 की जीत को बरकरार रखने की चुनौती है। 




दतिया लंबे समय तक भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. नरोत्तम मिश्रा का मजबूत राजनीतिक गढ़ माना जाता रहा। उन्होंने 2008, 2013 और 2018 में लगातार जीत दर्ज की, लेकिन 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने उन्हें 7,742 वोटों से हराकर बड़ा राजनीतिक उलटफेर कर दिया। बाद में एक पुराने बैंक धोखाधड़ी मामले में दोषसिद्धि के चलते राजेंद्र भारती की विधानसभा सदस्यता समाप्त हो गई, जिसके बाद यह सीट रिक्त हुई और अब यहां उपचुनाव हो रहे हैं। 

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15 चुनाव में 9 बार कांग्रेस ने जीत दर्ज की 
वर्ष 1957 से अब तक हुए 15 विधानसभा चुनावों में इस सीट पर कांग्रेस ने सबसे ज्यादा सफलता हासिल की है। दतिया की जनता ने 9 बार कांग्रेस के प्रत्याशी को विधानसभा भेजा है। वहीं जनता पार्टी एक बार, भाजपा को चार बार और समाजवादी पार्टी को एक बार जीत मिली है। इस बार होने वाले उपचुनाव में भी मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही माना जा रहा है। 

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दतिया विधानसभा उपचुनाव : इस सीट पर जातिगत समीकरण को भी समझ लीजिए। - फोटो : अमर उजाला
ओबीसी वोटर सबसे बड़ा फैक्टर
दतिया विधानसभा का चुनावी गणित जातीय समीकरणों पर निर्भर माना जाता है। जानकारी के अनुसार सीट पर करीब 35 से 40 प्रतिशत मतदाता अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से हैं, जिससे यह वर्ग सबसे प्रभावशाली माना जाता है। अनुसूचित जाति के मतदाता करीब 25 प्रतिशत हैं, जिनमें जाटव समाज की निर्णायक भूमिका रहती है। सामान्य वर्ग के मतदाता लगभग 15 से 20 प्रतिशत, जबकि मुस्लिम मतदाता 4 से 5 प्रतिशत के आसपास माने जाते हैं। जानकारों का मानना है कि सामान्य वर्ग का झुकाव परंपरागत रूप से भाजपा की ओर रहा है, जबकि अनुसूचित जाति के मतदाताओं में कांग्रेस की पकड़ अपेक्षाकृत मजबूत मानी जाती है। दूसरी ओर, ओबीसी वोट किसी एक दल के साथ स्थायी रूप से नहीं जुड़ते और यही वर्ग चुनाव का सबसे बड़ा 'किंगमेकर' साबित हो सकता है।

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पिछले पांच चुनावों का ट्रेंड
दतिया में पिछले दो दशकों से भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिलता रहा है। अधिकांश चुनावों में जीत का अंतर भी बहुत बड़ा नहीं रहा, जिससे हर चुनाव में स्थानीय समीकरण निर्णायक बने। 2023 में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने भाजपा के कद्दावर और पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को 7,742 वोटों से हराया। 2018, 2013 और 2008 में डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने लगातार जीत दर्ज की। इससे पहले 2003 में कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने जीत दर्ज की थी। 2023 का परिणाम इस बात का संकेत था कि कांग्रेस ने भाजपा के मजबूत गढ़ में प्रभावी सेंध लगाई, जबकि 2018 में मुकाबला बेहद कांटे का रहा था।

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दतिया विधानसभा उपचुनाव : बीते पांच चुनावों में कैसा रहा दतिया का मिजाज। - फोटो : अमर उजाला
2023 में क्यों हारे नरोत्तम मिश्रा?
राजनीतिक जानकारों के अनुसार नरोत्तम मिश्रा की हार के पीछे कई कारण रहे। लगातार तीन बार विधायक रहने के कारण स्थानीय स्तर पर सत्ता विरोधी माहौल, कांग्रेस प्रत्याशी राजेंद्र भारती की क्षेत्र में सक्रियता, अनुसूचित जाति और कुछ ओबीसी वर्गों का कांग्रेस की ओर झुकाव तथा स्थानीय मुद्दों का प्रभाव प्रमुख वजहें मानी जाती हैं। इसके अलावा संगठन के भीतर असंतोष और बूथ स्तर पर अपेक्षित सक्रियता नहीं होने की चर्चा भी चुनाव के दौरान होती रही। 

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राजेंद्र भारती की सदस्यता खत्म होने से खाली हुई सीट
दतिया सीट कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की विधानसभा सदस्यता समाप्त होने के बाद खाली हुई थी। वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा को हराया था। राजेंद्र भारती की सदस्यता एक पुराने बैंक धोखाधड़ी मामले में दोषसिद्धि के बाद समाप्त हुई। यह मामला वर्ष 1998 का है। आरोप था कि उनकी मां के नाम से संचालित संस्था की बैंक एफडी को नियमों के विपरीत बढ़ाकर उससे राशि निकाली गई। अदालत ने इसे बैंक धोखाधड़ी का मामला मानते हुए सजा सुनाई। हालांकि, बचाव पक्ष का कहना है कि मामला बेहद पुराना है और इसके पीछे राजनीतिक कारण भी हैं। इस मामले में उनकी याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

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दतिया विधानसभा उपचुनाव : किस दल को कितनी बार मिली यहां से विधायकी। - फोटो : अमर उजाला
किसके पास है जीत का गणित?
दतिया में ब्राह्मण, यादव, कुशवाह, दांगी, लोधी, रावत, राजपूत, वैश्य और अनुसूचित जाति के मतदाता चुनावी नतीजे तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भाजपा की परंपरागत ताकत ब्राह्मण और सामान्य वर्ग में मानी जाती है। वहीं कांग्रेस ने पिछले चुनाव में अनुसूचित जाति और ओबीसी वर्ग के वोटरों को साध कर बेहतर प्रदर्शन किया था। इस बार यादव, कुशवाह और दांगी मतदाताओं का रुख चुनाव परिणाम पर बड़ा असर डाल सकता है। 

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भाजपा के सामने क्या चुनौती?
यदि भाजपा डॉ. नरोत्तम मिश्रा को मैदान में उतारती है तो यह चुनाव उनके लिए व्यक्तिगत और राजनीतिक प्रतिष्ठा का भी प्रश्न होगा। पार्टी को ब्राह्मण मतदाताओं का पूरा समर्थन बनाए रखने के साथ-साथ जाटव और अन्य ओबीसी वर्गों में भी अपनी स्वीकार्यता बढ़ानी होगी। साथ ही बूथ स्तर पर संगठन की सक्रियता भाजपा के लिए सबसे बड़ी ताकत होगी।

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मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा पर उपचुनाव की तारीखें तय हो गई हैं। - फोटो : अमर उजाला
कांग्रेस की आंतरिक गुटबाजी बढ़ा सकती है मुसीबत 
कांग्रेस के सामने 2023 का सामाजिक समीकरण दोहराने की चुनौती है। पार्टी को अनुसूचित जाति और ओबीसी वर्ग में अपनी पकड़ बनाए रखने के साथ-साथ आंतरिक गुटबाजी से भी बचना होगा। उम्मीदवार चयन और कार्यकर्ताओं की एकजुटता कांग्रेस की सफलता का प्रमुख आधार होगी। यहां से पूर्व विधायक राजेंद्र भारती के बेटे अनुज भारती, पूर्व विधायक घनश्याम सिंह और अवधेश नायक के नाम चर्चा में है।  

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उपचुनाव में कांटे का मुकाबला होगा
वरिष्ठ पत्रकार देवश्री माली का मानना है कि दतिया उपचुनाव बेहद कांटे का मुकाबला होगा। उनके अनुसार भाजपा की जीत के लिए ब्राह्मण मतदाताओं का पूरा समर्थन, जाटव समाज के वोटों में  सेंध और ओबीसी वर्ग के पर्याप्त समर्थन की जरूरत होगी। साथ ही सिंधी समाज और भाजपा संगठन की सक्रियता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। माली का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में विकास कार्यों की रफ्तार को लेकर स्थानीय स्तर पर सवाल उठे हैं। यदि भाजपा यह भरोसा दिलाने में सफल रहती है कि अगले दो वर्षों में विकास कार्यों को गति मिलेगी तो उसे इसका राजनीतिक लाभ मिल सकता है। वहीं उनके अनुसार कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत उसका सामाजिक समीकरण है। उनका मानना है कि राजेंद्र भारती की यादव समाज में अच्छी पकड़ रही है और यदि कांग्रेस यादव, दांगी तथा अनुसूचित जाति के मतदाताओं को एकजुट रखने में सफल रहती है तो भाजपा के लिए मुकाबला आसान नहीं होगा। 

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यह होंगे चुनाव के प्रमुख मुद्दे?
स्थानीय विकास और अधूरे प्रोजेक्ट, सड़क, पेयजल और शहरी सुविधाएं, किसानों और युवाओं से जुड़े मुद्दों के साथ ही उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि चुनाव में अहम होगी।  दतिया उपचुनाव का परिणाम केवल एक सीट का फैसला नहीं करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि 2023 के बाद इस क्षेत्र में मतदाताओं का राजनीतिक रुझान किस दिशा में बढ़ रहा है। यही कारण है कि इस चुनाव पर पूरे प्रदेश की राजनीतिक नजरें टिकी हुई हैं।
 
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