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Bhopal News: नर्मदा में दूध विसर्जन पर सख्त हुआ एनजीटी, प्रदूषण जांच के लिए मांगी वैज्ञानिक रिपोर्ट
Tue, 19 May 2026 08:32 PM IST
Sandeep Kumar Tiwari
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
Published by: Sandeep Kumar Tiwari
Updated Tue, 19 May 2026 08:32 PM IST
सार
नर्मदा नदी में 11 हजार लीटर दूध और 210 साड़ियों के विसर्जन के मामले में एनजीटी ने सख्त रुख अपनाया है। भोपाल की सेंट्रल जोन बेंच ने सीपीसीबी और एमपीपीसीबी से वैज्ञानिक रिपोर्ट मांगी है। याचिका में कहा गया है कि इससे जल प्रदूषण और जलीय जीवों पर असर पड़ सकता है। मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई को होगी।
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धार्मिक आयोजन के दौरान नर्मदा में प्रवाहित किया गया दूध
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
नर्मदा नदी में धार्मिक आयोजन के दौरान हजारों लीटर दूध प्रवाहित करने और साड़ियों के विसर्जन का मामला अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) पहुंच गया है। पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए भोपाल स्थित सेंट्रल जोन बेंच ने सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) और मध्यप्रदेश पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (एमपीपीसीबी) से वैज्ञानिक रिपोर्ट तलब की है। मामला सीहोर जिले के भेरूंदा और सतदेव क्षेत्र में अप्रैल में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम से जुड़ा है, जहां नर्मदा नदी में करीब 11 हजार लीटर दूध अर्पित किया गया था। इसके साथ 210 साड़ियों का विसर्जन भी किया गया। मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई को होगी। तब तक पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्डों को अपनी विस्तृत रिपोर्ट एनजीटी के समक्ष पेश करनी होगी।
आस्था के नाम पर नदी प्रदूषण?
याचिका में कहा गया कि इस तरह की गतिविधियां नदी की पारिस्थितिकी और जल गुणवत्ता पर गंभीर असर डाल सकती हैं। आवेदक ने दावा किया कि दूध और अन्य सामग्री के नदी में प्रवाह से जल प्रदूषण बढ़ने, जलीय जीवों को नुकसान पहुंचने और पेयजल व सिंचाई स्रोत प्रभावित होने का खतरा है। मामले की सुनवाई जस्टिस श्यो कुमार सिंह और एक्सपर्ट मेंबर सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ ने की।
एनजीटी बोला- वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी
सुनवाई के दौरान एनजीटी ने कहा कि फिलहाल दूध विसर्जन से होने वाले प्रदूषण का कोई वैज्ञानिक डेटा रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं है। हालांकि पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि जल प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम 1974 के तहत किसी भी प्रदूषक पदार्थ को जलधारा में प्रवाहित करना प्रतिबंधित है। पीठ ने कहा कि दूध जैसे कार्बनिक पदार्थ पानी में बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) बढ़ा सकते हैं, जिससे नदी के जलीय जीवन पर असर पड़ सकता है।
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यह भी पढ़ें-ट्विशा के शरीर पर चोट के निशान', परिजनों का आरोप; पति समर्थ के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी
धार्मिक आयोजनों के लिए बन सकते हैं नए गाइडलाइन
एनजीटी ने सीपीसीबी और एमपीपीसीबी से पूछा है कि क्या नदियों में धार्मिक अवसरों पर दूध प्रवाहित करने जैसी गतिविधियां किसी मौजूदा गाइडलाइन के तहत नियंत्रित हैं या नहीं। यदि नहीं, तो क्या इसके लिए अलग दिशा-निर्देश बनाए जाने चाहिए। अधिकरण ने दोनों एजेंसियों को एक्सपर्ट्स की मदद से वैज्ञानिक अध्ययन कर रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं।
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आस्था के नाम पर नदी प्रदूषण?
याचिका में कहा गया कि इस तरह की गतिविधियां नदी की पारिस्थितिकी और जल गुणवत्ता पर गंभीर असर डाल सकती हैं। आवेदक ने दावा किया कि दूध और अन्य सामग्री के नदी में प्रवाह से जल प्रदूषण बढ़ने, जलीय जीवों को नुकसान पहुंचने और पेयजल व सिंचाई स्रोत प्रभावित होने का खतरा है। मामले की सुनवाई जस्टिस श्यो कुमार सिंह और एक्सपर्ट मेंबर सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ ने की।
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एनजीटी बोला- वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी
सुनवाई के दौरान एनजीटी ने कहा कि फिलहाल दूध विसर्जन से होने वाले प्रदूषण का कोई वैज्ञानिक डेटा रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं है। हालांकि पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि जल प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम 1974 के तहत किसी भी प्रदूषक पदार्थ को जलधारा में प्रवाहित करना प्रतिबंधित है। पीठ ने कहा कि दूध जैसे कार्बनिक पदार्थ पानी में बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) बढ़ा सकते हैं, जिससे नदी के जलीय जीवन पर असर पड़ सकता है।
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धार्मिक आयोजनों के लिए बन सकते हैं नए गाइडलाइन
एनजीटी ने सीपीसीबी और एमपीपीसीबी से पूछा है कि क्या नदियों में धार्मिक अवसरों पर दूध प्रवाहित करने जैसी गतिविधियां किसी मौजूदा गाइडलाइन के तहत नियंत्रित हैं या नहीं। यदि नहीं, तो क्या इसके लिए अलग दिशा-निर्देश बनाए जाने चाहिए। अधिकरण ने दोनों एजेंसियों को एक्सपर्ट्स की मदद से वैज्ञानिक अध्ययन कर रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं।
