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Bhopal News: एमपी में मेडिकल कॉलेज बढ़े, डॉक्टर नहीं, सरकारी अस्पतालों में 6,310 पद खाली, विशेषज्ञों की कमी
Thu, 02 Jul 2026 10:05 PM IST
Sandeep Kumar Tiwari
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
Published by: Sandeep Kumar Tiwari
Updated Thu, 02 Jul 2026 10:05 PM IST
सार
मध्य प्रदेश में मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ने के बावजूद सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी बनी हुई है। मेडिकल ऑफिसर और विशेषज्ञ डॉक्टरों के कुल 6,310 पद खाली हैं, जिससे जिला अस्पतालों से लेकर ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों तक मरीजों को इलाज के लिए भटकना पड़ रहा है। विशेषज्ञ डॉक्टरों के 66% और मेडिकल ऑफिसर के 42% पद रिक्त हैं।
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जीएमसी भोपाल
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए सरकार लगातार नए मेडिकल कॉलेज खोल रही है, लेकिन सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी दूर नहीं हो पा रही है। प्रदेश के अस्पतालों में मेडिकल ऑफिसर और विशेषज्ञ डॉक्टरों के कुल 6,310 पद खाली हैं। इसका सीधा असर मरीजों के इलाज पर पड़ रहा है। जिला अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं होने से मरीजों को छोटे शहरों से बड़े मेडिकल कॉलेजों का रुख करना पड़ रहा है।
विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद रिक्त
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में मेडिकल ऑफिसर के 6,513 स्वीकृत पद हैं। इनमें केवल 3,777 डॉक्टर पदस्थ हैं, जबकि 2,736 पद खाली हैं। यानी करीब 42 प्रतिशत पद रिक्त हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों की स्थिति इससे भी अधिक गंभीर है। 5,443 स्वीकृत पदों के मुकाबले सिर्फ 1,869 विशेषज्ञ डॉक्टर कार्यरत हैं, जबकि 3,574 पद खाली हैं। यानी हर तीन में दो विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद रिक्त हैं।
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मेडिकल कॉलेज बढ़े, लेकिन अस्पतालों में नहीं पहुंचे डॉक्टर
प्रदेश में वर्तमान में 20 सरकारी मेडिकल कॉलेज (एम्स भोपाल सहित) संचालित हैं। पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने कई नए मेडिकल कॉलेज शुरू किए हैं और हर जिले में मेडिकल कॉलेज स्थापित करने की योजना पर काम कर रही है। इसके बावजूद अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी कम नहीं हुई है। नए डॉक्टर तैयार हो रहे हैं, लेकिन सरकारी अस्पतालों में उनकी उपलब्धता अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
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ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे ज्यादा परेशानी
डॉक्टरों की कमी का सबसे अधिक असर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में देखने को मिल रहा है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और सिविल अस्पतालों में स्त्री एवं प्रसूति रोग, शिशु रोग, मेडिसिन, सर्जरी और एनेस्थीसिया जैसे विशेषज्ञ नहीं होने से मरीजों को जिला अस्पताल या मेडिकल कॉलेज रेफर करना पड़ता है। इससे इलाज में देरी होने के साथ मरीजों का आर्थिक बोझ भी बढ़ता है।
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विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद रिक्त
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में मेडिकल ऑफिसर के 6,513 स्वीकृत पद हैं। इनमें केवल 3,777 डॉक्टर पदस्थ हैं, जबकि 2,736 पद खाली हैं। यानी करीब 42 प्रतिशत पद रिक्त हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों की स्थिति इससे भी अधिक गंभीर है। 5,443 स्वीकृत पदों के मुकाबले सिर्फ 1,869 विशेषज्ञ डॉक्टर कार्यरत हैं, जबकि 3,574 पद खाली हैं। यानी हर तीन में दो विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद रिक्त हैं।
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मेडिकल कॉलेज बढ़े, लेकिन अस्पतालों में नहीं पहुंचे डॉक्टर
प्रदेश में वर्तमान में 20 सरकारी मेडिकल कॉलेज (एम्स भोपाल सहित) संचालित हैं। पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने कई नए मेडिकल कॉलेज शुरू किए हैं और हर जिले में मेडिकल कॉलेज स्थापित करने की योजना पर काम कर रही है। इसके बावजूद अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी कम नहीं हुई है। नए डॉक्टर तैयार हो रहे हैं, लेकिन सरकारी अस्पतालों में उनकी उपलब्धता अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
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ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे ज्यादा परेशानी
डॉक्टरों की कमी का सबसे अधिक असर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में देखने को मिल रहा है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और सिविल अस्पतालों में स्त्री एवं प्रसूति रोग, शिशु रोग, मेडिसिन, सर्जरी और एनेस्थीसिया जैसे विशेषज्ञ नहीं होने से मरीजों को जिला अस्पताल या मेडिकल कॉलेज रेफर करना पड़ता है। इससे इलाज में देरी होने के साथ मरीजों का आर्थिक बोझ भी बढ़ता है।
