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महाभारत समागम का पांचवें दिन : भारत भवन के मंचों पर जय, अभिमन्यु वध व अंधायुग का मंचन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
Published by: आनंद पवार
Updated Tue, 20 Jan 2026 08:12 PM IST
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सार
वीर भारत न्यास के महाभारत समागम के पांचवें दिन मंच पर संगीत-नाट्य प्रस्तुति ‘जय’ ने महाभारत की कथा को 21वीं सदी की संवेदनाओं के साथ जीवंत किया। साथ ही अभिमन्यु वध और अंधायुग नाटकों ने युद्ध, वीरता और नैतिक द्वंद्व को दर्शकों तक मार्मिक रूप में पहुंचाया।
भोपाल में महाभारत समागम में प्रस्तुति देते कलाकार
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
वीर भारत न्यास द्वारा आयोजित सभ्यताओं के संघर्ष एवं औदार्य की महागाथा पर केंद्रित महाभारत समागम के पांचवें दिन बहिरंग के मंच पर महाभारत की शाश्वत कथा को 21वीं सदी की संवेदना के साथ प्रस्तुत करती संगीत-नाट्य प्रस्तुति जय दर्शकों के लिए एक अनोखा और प्रभावशाली अनुभव लेकर आयी। विश्वस्तरीय लाइटिंग, भव्य सेट, सुसज्जित परिधान, अत्याधुनिक साउंड और सशक्त लाइव गायन के साथ प्रस्तुति दृश्य और श्रव्य दोनों स्तरों पर प्रभाव छोड़ती है। द प्राइम टाइम थिएटर कंपनी, मुंबई द्वारा प्रस्तुत यह रॉक म्यूजिकल अंग्रेजी भाषा में मंचित किया गया, जिसका निर्देशन देश की प्रख्यात रंगनिर्देशक लिलेट दुबे ने किया है। इसके पहले पूर्वरंग मंच पर साधु चरण महतो द्वारा निर्देशित पुरूलिया छाऊ शैली में अभिमन्यु वध तथा अंतरंग सभागार में जॉय द्वारा निर्देशित नाट्य प्रस्तुति अंधायुग का मंचन किया गया। वीर भारत न्यास के न्यासी सचिव श्रीराम तिवारी द्वारा सभी कलाकारों को मोमेंटो भेंट कर स्वागत और अभिनंदन किया गया।
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रॉक म्यूजिकल के रूप में महाभारत की समकालीन प्रस्तुति
‘जय’ महाभारत की प्रमुख घटनाओं को युधिष्ठिर की दृष्टि से एक नाटकीय मोंटाज शैली में प्रस्तुत करता है। नाटक में सत्य, शक्ति और भाग्य जैसे प्रश्नों को दुर्योधन और कर्ण के विपरीत दृष्टिकोणों के माध्यम से उभारा गया है, वहीं श्रीकृष्ण का गीता उपदेश कथा का नैतिक और दार्शनिक केंद्र बनता है। यह प्रस्तुति दर्शकों को सोचने पर विवश करती है कि आज के समय में धर्म और निर्णयों का क्या अर्थ है। संदीप कांजीलाल द्वारा लिखित इस नाटक का मौलिक और ऊर्जावान संगीत आशुतोष पाठक ने रचा है। रॉक म्यूजिक, मंत्रोच्चार, कृष्ण की बांसुरी, कलरिपयट्टू और कथक का समन्वय इसे विशिष्ट बनाता है।
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अभिमन्यु वध : वीरता और करुणा का प्रभावी चित्रण
पुरुलिया छाऊ नृत्य शैली में प्रस्तुत अभिमन्यु वध नृत्य-नाटिका ने दर्शकों को गहरे भावनात्मक स्तर पर प्रभावित किया। निर्देशक साधुचरण महतो के कुशल निर्देशन में यह प्रस्तुति महाभारत के युद्ध प्रसंगों में निहित वीरता, रणनीति और अन्याय को सशक्त रूप में सामने लाती है। ऊर्जावान शारीरिक भंगिमाएँ, पारंपरिक मुखौटे, लयबद्ध संगीत और नाटकीय युद्ध दृश्य अभिमन्यु के अद्भुत शौर्य को जीवंत करते हैं। चक्रव्यूह भेदन से लेकर उसके करुण अंत तक, यह नाटिका धर्म और अधर्म के संघर्ष का मार्मिक संदेश देती है और छाऊ परंपरा की सांस्कृतिक गरिमा को उजागर करती है।
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अंधा युग : युद्धोत्तर पीड़ा और नैतिक संकट का सशक्त मंचन
धर्मवीर भारती द्वारा रचित अंधायुग नाट्य प्रस्तुति को ट्रेजर आर्ट एसोसिएशन, मणिपुर द्वारा प्रभावशाली रूप में मंचित किया गया। निर्देशक जॉय के निर्देशन में यह नाटक महाभारत युद्ध के बाद की नैतिक, मानसिक और मानवीय त्रासदी को उजागर करता है। साइको-फिजिकल शैली में प्रस्तुत इस नाटक में कम संवाद और शारीरिक अभिव्यक्ति के माध्यम से पात्रों का आंतरिक द्वंद्व सामने आता है। गांधारी, धृतराष्ट्र और अश्वत्थामा जैसे पात्र आधुनिक मनुष्य के प्रतीक बनकर उभरते हैं। प्रस्तुति सत्ता, अहंकार और प्रतिशोध से उपजे अंधकार पर गहरा प्रश्न उठाती है।
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‘जय’ महाभारत की प्रमुख घटनाओं को युधिष्ठिर की दृष्टि से एक नाटकीय मोंटाज शैली में प्रस्तुत करता है। नाटक में सत्य, शक्ति और भाग्य जैसे प्रश्नों को दुर्योधन और कर्ण के विपरीत दृष्टिकोणों के माध्यम से उभारा गया है, वहीं श्रीकृष्ण का गीता उपदेश कथा का नैतिक और दार्शनिक केंद्र बनता है। यह प्रस्तुति दर्शकों को सोचने पर विवश करती है कि आज के समय में धर्म और निर्णयों का क्या अर्थ है। संदीप कांजीलाल द्वारा लिखित इस नाटक का मौलिक और ऊर्जावान संगीत आशुतोष पाठक ने रचा है। रॉक म्यूजिक, मंत्रोच्चार, कृष्ण की बांसुरी, कलरिपयट्टू और कथक का समन्वय इसे विशिष्ट बनाता है।
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पुरुलिया छाऊ नृत्य शैली में प्रस्तुत अभिमन्यु वध नृत्य-नाटिका ने दर्शकों को गहरे भावनात्मक स्तर पर प्रभावित किया। निर्देशक साधुचरण महतो के कुशल निर्देशन में यह प्रस्तुति महाभारत के युद्ध प्रसंगों में निहित वीरता, रणनीति और अन्याय को सशक्त रूप में सामने लाती है। ऊर्जावान शारीरिक भंगिमाएँ, पारंपरिक मुखौटे, लयबद्ध संगीत और नाटकीय युद्ध दृश्य अभिमन्यु के अद्भुत शौर्य को जीवंत करते हैं। चक्रव्यूह भेदन से लेकर उसके करुण अंत तक, यह नाटिका धर्म और अधर्म के संघर्ष का मार्मिक संदेश देती है और छाऊ परंपरा की सांस्कृतिक गरिमा को उजागर करती है।
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