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Independence Day: भोपाल की विरासत में छिपी आजादी की कहानी, इन इमारतों ने देखा गुलामी से स्वतंत्रता तक का सफर
Sat, 15 Aug 2026 08:35 AM IST
Sandeep Kumar Tiwari
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
Published by: Sandeep Kumar Tiwari
Updated Sat, 15 Aug 2026 08:35 AM IST
सार
भोपाल की ऐतिहासिक इमारतें नवाबी शासन से लेकर आजादी और भारतीय संघ में विलय तक के दौर की गवाह हैं। गौहर महल, शौकत महल, सदर मंजिल और ताजमहल ने सत्ता और समाज में आए बदलाव देखे, जबकि जुमेराती डाकघर 15 अगस्त 1947 के आसपास तिरंगा फहराए जाने की घटना से जुड़ा है।
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गौहर महल
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
15 अगस्त आते ही देशभर में आजादी की कहानी दोहराई जाती है, लेकिन भोपाल की आजादी की कहानी कुछ अलग है। जब 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ, तब भोपाल रियासत भारतीय संघ का हिस्सा नहीं बनी थी। नवाब हमीदुल्लाह खान की सत्ता यहां कायम थी और भोपाल के भारत में विलय के लिए अलग आंदोलन चलना था। इस पूरे दौर के बीच भोपाल की कई ऐतिहासिक इमारतें आज भी खड़ी हैं, जिन्होंने नवाबी शासन, अंग्रेजी दौर, स्वतंत्रता आंदोलन और फिर भारतीय संघ में भोपाल के विलय तक का समय देखा। गौहर महल से लेकर शौकत महल, सदर मंजिल, ताजमहल और जुमेराती के पुराने डाकघर तक, ये इमारतें शहर के इतिहास की जीवित निशानियां हैं।
गौहर महल
गौहर महल: जब भोपाल में महिला शासन की शुरुआत हुई
1820 में बना गौहर महल भोपाल की पहली महिला शासिका कुदसिया बेगम से जुड़ा है। इसे उनका निवास और प्रशासनिक केंद्र माना जाता है। महल में दीवान-ए-आम और दीवान-ए-खास जैसे हिस्से थे। इसकी वास्तुकला में भारतीय और मुगल शैली का मिश्रण दिखाई देता है। यानी जिस इमारत में करीब 127 साल पहले भोपाल की सत्ता और प्रशासन से जुड़े फैसले होते थे, वह आज भी शहर के पुराने इतिहास की गवाही दे रही है। गौहर महल के आसपास का इलाका उस समय के भोपाल के शाही जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था।
शौकत महल
शौकत महलः भोपाल में फ्रांसीसी अंदाज की अनोखी छाप
पुराने भोपाल के चौक इलाके के प्रवेश पर मौजूद शौकत महल 1830 के दशक में बना। इसे सिकंदर जहां बेगम के लिए विवाह उपहार के रूप में बनवाया गया था। इसकी सबसे खास पहचान इसकी स्थापत्य शैली है, जिसमें भारतीय शैली के साथ यूरोपीय और फ्रांसीसी प्रभाव दिखाई देता है।
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भोपाल की अधिकांश पुरानी इमारतों में जहां इस्लामी और मुगल प्रभाव दिखाई देता है, वहीं शौकत महल की बनावट में चर्च जैसी आकृतियां और यूरोपीय प्रभाव इसे अलग पहचान देते हैं। यह इमारत उस दौर की याद दिलाती है जब भोपाल की बेगमों के शासन में अलग-अलग स्थापत्य परंपराओं का मेल दिखाई देने लगा था।
सदर मंजिल
सदर मंजिल: जहां से नवाबी दरबार चलता था
1898 में बनी सदर मंजिल भोपाल के राजकीय इतिहास की बेहद महत्वपूर्ण इमारत है। नवाब शाहजहां बेगम ने इसका निर्माण कराया था। बाद में उनकी बेटी सुल्तान जहां बेगम के शासनकाल में इसे शाही दरबार और सार्वजनिक सभा के लिए इस्तेमाल किया गया। यह वही दौर था जब भोपाल रियासत तेजी से बदल रही थी। सदर मंजिल में शाही दरबार लगता था और महत्वपूर्ण सार्वजनिक मामलों पर चर्चा होती थी। आजादी के बाद भी इस इमारत का उपयोग सरकारी कामकाज के लिए होता रहा। 1953 में यहां से भोपाल नगर निकाय के कामकाज की शुरुआत हुई थी।
इस लिहाज से सदर मंजिल ने नवाबी शासन से लोकतांत्रिक व्यवस्था तक का बदलाव अपनी आंखों से देखा।
ताजमहल
ताजमहल: बेगम का महल, आजादी के बाद बना शरणस्थली
भोपाल का ताजमहल आगरा वाले ताजमहल से बिल्कुल अलग है। शाहजहां बेगम ने इसका निर्माण 1871 में शुरू कराया और यह 1884 में पूरा हुआ। यह उनका शाही निवास था और उस समय बेहद भव्य महलों में गिना जाता था।
इस महल ने भी आजादी और देश के बंटवारे का दौर देखा। 1947 के बाद नवाब हमीदुल्लाह खान ने यहां सिंधी शरणार्थियों को रहने की अनुमति दी। वे करीब चार साल तक यहां रहे, जिसके बाद उन्हें बैरागढ़ स्थानांतरित किया गया। इस तरह ताजमहल सिर्फ नवाबी वैभव का प्रतीक नहीं रहा, बल्कि आजादी और विभाजन के बाद लोगों के विस्थापन की कहानी का भी गवाह बना।
जुमेराती डाकघर
जुमेराती डाकघर: भोपाल में आजादी की सबसे सीधी निशानी
इन सभी इमारतों में जुमेराती का पुराना डाकघर सबसे अलग है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक यह 19वीं सदी के अंतिम दौर में बना था और शहर के शुरुआती सार्वजनिक डाकघरों में शामिल था। आज भी जुमेराती में डाकघर संचालित हो रहा है। सबसे महत्वपूर्ण बात इसका स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा इतिहास है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार 15 अगस्त 1947 के आसपास स्थानीय स्वतंत्रता समर्थकों ने जुमेराती डाकघर पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया था। नवाबी सैनिकों ने इसे उतार दिया, क्योंकि उस समय भोपाल रियासत में शाही झंडे के अलावा किसी दूसरे झंडे को फहराने की अनुमति नहीं थी। यही वजह है कि जुमेराती डाकघर को भोपाल के स्वतंत्रता संघर्ष की सबसे महत्वपूर्ण जगहों में गिना जाता है। बाद के वर्षों में भी यह स्थान भोपाल के विलीनीकरण आंदोलन की यादों से जुड़ा रहा।
15 अगस्त को देश आजाद, भोपाल को एक जून 1949 तक करना पड़ा इंतजार
भोपाल की कहानी का सबसे बड़ा अंतर यही था कि 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र होने के बावजूद भोपाल तत्काल भारत का हिस्सा नहीं बना। जिला प्रशासन के इतिहास विवरण के मुताबिक भोपाल रियासत ने भारतीय संघ में शामिल होने में अन्य कई रियासतों की तुलना में अधिक समय लिया और अंततः 1949 में भारत का हिस्सा बनी। इसलिए भोपाल की ये पुरानी इमारतें केवल स्थापत्य विरासत नहीं हैं। गौहर महल ने बेगमों का शासन देखा, शौकत महल ने बदलती स्थापत्य संस्कृति देखी, सदर मंजिल ने नवाबी दरबार से लोकतांत्रिक प्रशासन तक का दौर देखा, ताजमहल ने विभाजन के बाद विस्थापित परिवारों को आश्रय दिया और जुमेराती डाकघर ने स्वतंत्रता आंदोलन की सीधी हलचल देखी। आज जब भोपाल 15 अगस्त का जश्न मनाता है, इन इमारतों को देखने का नजरिया सिर्फ पुरानी इमारतों तक सीमित नहीं होना चाहिए। इन दीवारों में वह दौर दर्ज है, जब देश आजाद हो चुका था, लेकिन भोपाल को आजाद भारत का हिस्सा बनने के लिए अभी संघर्ष का एक और अध्याय पूरा करना बाकी था।
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गौहर महल
गौहर महल: जब भोपाल में महिला शासन की शुरुआत हुई
1820 में बना गौहर महल भोपाल की पहली महिला शासिका कुदसिया बेगम से जुड़ा है। इसे उनका निवास और प्रशासनिक केंद्र माना जाता है। महल में दीवान-ए-आम और दीवान-ए-खास जैसे हिस्से थे। इसकी वास्तुकला में भारतीय और मुगल शैली का मिश्रण दिखाई देता है। यानी जिस इमारत में करीब 127 साल पहले भोपाल की सत्ता और प्रशासन से जुड़े फैसले होते थे, वह आज भी शहर के पुराने इतिहास की गवाही दे रही है। गौहर महल के आसपास का इलाका उस समय के भोपाल के शाही जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था।
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शौकत महल
शौकत महलः भोपाल में फ्रांसीसी अंदाज की अनोखी छाप
पुराने भोपाल के चौक इलाके के प्रवेश पर मौजूद शौकत महल 1830 के दशक में बना। इसे सिकंदर जहां बेगम के लिए विवाह उपहार के रूप में बनवाया गया था। इसकी सबसे खास पहचान इसकी स्थापत्य शैली है, जिसमें भारतीय शैली के साथ यूरोपीय और फ्रांसीसी प्रभाव दिखाई देता है।
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भोपाल की अधिकांश पुरानी इमारतों में जहां इस्लामी और मुगल प्रभाव दिखाई देता है, वहीं शौकत महल की बनावट में चर्च जैसी आकृतियां और यूरोपीय प्रभाव इसे अलग पहचान देते हैं। यह इमारत उस दौर की याद दिलाती है जब भोपाल की बेगमों के शासन में अलग-अलग स्थापत्य परंपराओं का मेल दिखाई देने लगा था।
सदर मंजिल
सदर मंजिल: जहां से नवाबी दरबार चलता था
1898 में बनी सदर मंजिल भोपाल के राजकीय इतिहास की बेहद महत्वपूर्ण इमारत है। नवाब शाहजहां बेगम ने इसका निर्माण कराया था। बाद में उनकी बेटी सुल्तान जहां बेगम के शासनकाल में इसे शाही दरबार और सार्वजनिक सभा के लिए इस्तेमाल किया गया। यह वही दौर था जब भोपाल रियासत तेजी से बदल रही थी। सदर मंजिल में शाही दरबार लगता था और महत्वपूर्ण सार्वजनिक मामलों पर चर्चा होती थी। आजादी के बाद भी इस इमारत का उपयोग सरकारी कामकाज के लिए होता रहा। 1953 में यहां से भोपाल नगर निकाय के कामकाज की शुरुआत हुई थी।
इस लिहाज से सदर मंजिल ने नवाबी शासन से लोकतांत्रिक व्यवस्था तक का बदलाव अपनी आंखों से देखा।
ताजमहल
ताजमहल: बेगम का महल, आजादी के बाद बना शरणस्थली
भोपाल का ताजमहल आगरा वाले ताजमहल से बिल्कुल अलग है। शाहजहां बेगम ने इसका निर्माण 1871 में शुरू कराया और यह 1884 में पूरा हुआ। यह उनका शाही निवास था और उस समय बेहद भव्य महलों में गिना जाता था।
इस महल ने भी आजादी और देश के बंटवारे का दौर देखा। 1947 के बाद नवाब हमीदुल्लाह खान ने यहां सिंधी शरणार्थियों को रहने की अनुमति दी। वे करीब चार साल तक यहां रहे, जिसके बाद उन्हें बैरागढ़ स्थानांतरित किया गया। इस तरह ताजमहल सिर्फ नवाबी वैभव का प्रतीक नहीं रहा, बल्कि आजादी और विभाजन के बाद लोगों के विस्थापन की कहानी का भी गवाह बना।
जुमेराती डाकघर
जुमेराती डाकघर: भोपाल में आजादी की सबसे सीधी निशानी
इन सभी इमारतों में जुमेराती का पुराना डाकघर सबसे अलग है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक यह 19वीं सदी के अंतिम दौर में बना था और शहर के शुरुआती सार्वजनिक डाकघरों में शामिल था। आज भी जुमेराती में डाकघर संचालित हो रहा है। सबसे महत्वपूर्ण बात इसका स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा इतिहास है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार 15 अगस्त 1947 के आसपास स्थानीय स्वतंत्रता समर्थकों ने जुमेराती डाकघर पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया था। नवाबी सैनिकों ने इसे उतार दिया, क्योंकि उस समय भोपाल रियासत में शाही झंडे के अलावा किसी दूसरे झंडे को फहराने की अनुमति नहीं थी। यही वजह है कि जुमेराती डाकघर को भोपाल के स्वतंत्रता संघर्ष की सबसे महत्वपूर्ण जगहों में गिना जाता है। बाद के वर्षों में भी यह स्थान भोपाल के विलीनीकरण आंदोलन की यादों से जुड़ा रहा।
15 अगस्त को देश आजाद, भोपाल को एक जून 1949 तक करना पड़ा इंतजार
भोपाल की कहानी का सबसे बड़ा अंतर यही था कि 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र होने के बावजूद भोपाल तत्काल भारत का हिस्सा नहीं बना। जिला प्रशासन के इतिहास विवरण के मुताबिक भोपाल रियासत ने भारतीय संघ में शामिल होने में अन्य कई रियासतों की तुलना में अधिक समय लिया और अंततः 1949 में भारत का हिस्सा बनी। इसलिए भोपाल की ये पुरानी इमारतें केवल स्थापत्य विरासत नहीं हैं। गौहर महल ने बेगमों का शासन देखा, शौकत महल ने बदलती स्थापत्य संस्कृति देखी, सदर मंजिल ने नवाबी दरबार से लोकतांत्रिक प्रशासन तक का दौर देखा, ताजमहल ने विभाजन के बाद विस्थापित परिवारों को आश्रय दिया और जुमेराती डाकघर ने स्वतंत्रता आंदोलन की सीधी हलचल देखी। आज जब भोपाल 15 अगस्त का जश्न मनाता है, इन इमारतों को देखने का नजरिया सिर्फ पुरानी इमारतों तक सीमित नहीं होना चाहिए। इन दीवारों में वह दौर दर्ज है, जब देश आजाद हो चुका था, लेकिन भोपाल को आजाद भारत का हिस्सा बनने के लिए अभी संघर्ष का एक और अध्याय पूरा करना बाकी था।
