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Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   Independence Day Special: Bhopal’s Untold Freedom Story, Two-Year Struggle for the Tricolour and Merger

Independence Day Special: भोपाल की आजादी की अनकही कहानी, 15 अगस्त के बाद भी 2 साल चला तिरंगे और विलय का संघर्ष

Sat, 15 Aug 2026 06:55 AM IST
प्रिया वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल Published by: प्रिया वर्मा Updated Sat, 15 Aug 2026 06:55 AM IST
सार

देश को 15 अगस्त 1947 को आजादी मिल गई थी लेकिन भोपाल रियासत में भारतीय संघ में शामिल होने का संघर्ष इसके बाद भी जारी रहा। नवाब की स्वतंत्र रियासत बनाए रखने की कोशिशों के बीच लोगों के संघर्ष की कहानी आज भी विलीनीकरण शहीद स्मृति द्वार में दर्ज है।

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Independence Day Special: Bhopal’s Untold Freedom Story, Two-Year Struggle for the Tricolour and Merger
भोपाल का विलीनीकरण शहीद स्मृति द्वार - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राजधानी भोपाल स्थित विलीनीकरण शहीद स्मृति द्वार सिर्फ एक स्मारक नहीं, बल्कि भोपाल रियासत के उस संघर्ष का प्रतीक है, जिसने यहां के लोगों को भारतीय संघ में शामिल होने के लिए आंदोलन करने को प्रेरित किया। यह स्मृति द्वार उन लोगों के बलिदान की याद दिलाता है, जिन्होंने भोपाल को आजाद भारत का हिस्सा बनाने के लिए संघर्ष किया। 15 अगस्त 1947 को जब देश अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुआ, तब रियासत के नवाब हमीदुल्लाह खान की जिद के चलते भोपाल में तिरंगा नहीं फहराया गया। उस समय भोपाल, रायसेन और सीहोर सहित कई क्षेत्र भोपाल रियासत के अधीन थे। रियासत के भविष्य को लेकर अलग परिस्थितियां थीं, जिसके कारण यहां विलीनीकरण का मुद्दा लंबे समय तक चर्चा में रहा।

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रियासत के प्रधानमंत्री मालवीय ने चलाया अभियान
नवाब हमीदुल्लाह खान भोपाल को एक स्वतंत्र रियासत बनाए रखना चाहते थे लेकिन उनकी रियासत के प्रधानमंत्री चतुरनारायण मालवीय उनके निर्णय के खिलाफ थे। मालवीय ने पूर्व राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा के साथ मिलकर भोपाल की आजादी के लिए आंदोलन चलाया। भोपाल रियासत को भारतीय संघ में शामिल करने के लिए शहर और आसपास के क्षेत्रों में आंदोलन शुरू हुआ। इससे नाराज नवाब ने मालवीय के मंत्रिमंडल को बर्खास्त कर कर सभी अधिकार अपने पक्ष में ले लिए और शंकरदयाल शर्मा को जेल भेज दिया। इससे आंदोलन और भड़क गया। लोगों ने तिरंगा यात्राएं निकालीं और कई स्थानों पर सभाएं आयोजित की गईं। इस दौरान आंदोलन ने व्यापक जनसमर्थन हासिल किया।
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दो साल बाद भोपाल में फहराया गया तिरंगा
इस बीच केंद्रीय गृहमंत्री वल्लभ भाई पटेल ने भोपाल के नवाब को हमीदुल्लाह खान को सख्त संदेश भिजवाया कि भोपाल को स्वतंत्र नहीं रह सकता, उसे भारत में मिलाना होगा। पटेल की सख्ती के बाद 30 नवंबर 1949 को भोपाल के भारत में विलय के हस्ताक्षर कर दिए और तब केंद्र सरकार ने भोपाल का चीफ कमिश्नर एनबी बनर्जी को नियुक्त किया। उनके कार्यभार संभालते ही 1 जून 1949 को भोपाल में पहली बार तिरंगा फहराया गया और भोपाल आजाद हुआ।

लोगों के बलिदान की याद दिलाता है स्मृति द्वार
इतिहास के पन्ने बताते हैं कि विलीनीकरण आंदोलन के दौरान कई लोगों ने बलिदान दिया। इन्हीं बलिदानों की स्मृति को जीवित रखने के लिए इस स्मृति द्वार का निर्माण किया गया। स्मृति द्वार पर अंकित 1 जून 1949 की तारीख उस दिन की याद दिलाती है, जब भोपाल रियासत आधिकारिक रूप से भारतीय संघ का हिस्सा बनी। आज भी यह स्मृति द्वार नई पीढ़ी को बताता है कि भोपाल में आजादी का सफर 15 अगस्त 1947 को समाप्त नहीं हुआ था। यहां के लोगों को तिरंगे के सम्मान और भारतीय संघ में शामिल होने के लिए करीब दो साल और संघर्ष का सामना करना पड़ा था।

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