Independence Day: 150 बलिदान स्थलों की माटी का दुर्लभ संग्रह, जानिए उज्जैन के डॉ. नारायण व्यास की अनूठी मुहिम
किसी के लिए मिट्टी सिर्फ मिट्टी है लेकिन डॉ. नारायण व्यास के लिए इसमें वीरों की यादें और बलिदान की कहानी बसती है। देशभर के 150 से अधिक शहीद स्थलों की माटी को सहेजकर उन्होंने अनूठी राष्ट्रभक्ति की मिसाल कायम की है।
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स्वतंत्रता दिवस केवल तिरंगा फहराने और राष्ट्रगान गाने की रस्म नहीं है, बल्कि यह उन अनाम दीपकों को याद करने का दिन है, जो देश की माटी की खातिर अपनी आहुति देकर बुझ गए। उन्हें अमर बनाने के लिए धर्मनगरी उज्जैन के पद्मश्री से सम्मानित पुरातत्वविद् डॉ. नारायण व्यास ने अनूठा राष्ट्रभक्ति अभियान शुरू किया। यह अभियान आज पूरे देश के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुका है। डॉ. व्यास पिछले चार साल से देश के महान क्रांतिकारियों और अमर शहीदों के जन्मस्थल, कर्मस्थल और बलिदान स्थलों की पवित्र माटी को सहेज रहे हैं। आज उनके पास रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, चंद्रशेखर आजाद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, डॉ. बी.आर. आंबेडकर और जलियांवाला बाग समेत 150 से अधिक पवित्र स्थानों की मिट्टी का दुर्लभ संग्रह है।
कोरोना के सन्नाटे से शुरू हुआ अभियान
इस अनूठे अभियान की शुरुआत किसी सामान्य परिस्थिति में नहीं हुई। कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान जब डॉ. व्यास इंदौर के अस्पताल में भर्ती थे, तब कवि प्रदीप के कालजयी गीत की पंक्तियों— आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिन्दुस्तान की... इस मिट्टी से तिलक करो, यह मिट्टी है बलिदान की...ने उनके भीतर एक नई अलख जगाई। ठीक होते ही उन्होंने इंदौर में बलिदान देने वाले राणा बख्तावर सिंह के स्मारक से पहली माटी उठाई। इसके बाद शिवपुरी से तात्या टोपे, ग्वालियर से रानी लक्ष्मीबाई, महू से बाबा साहेब आंबेडकर और कटक से नेताजी बोस की जन्मभूमि की माटी जुड़ती चली गई।
नई पीढ़ी के दिलों में सजी धरोहर
डॉ. नारायण व्यास इस पवित्र माटी को घर की अलमारी तक सीमित नहीं रखते। वे अपनी धर्मपत्नी के साथ मिलकर अब तक मध्य प्रदेश के 50 से अधिक स्कूलों में नि:शुल्क प्रदर्शनियां लगा चुके हैं। इतिहास को किताबों के पन्नों से निकालकर बच्चों के सामने जीवंत करना। जब स्कूली बच्चे शहीदों की माटी को देखते हैं और उसे माथे से लगाते हैं, तो इतिहास महज एक विषय नहीं रहता, वह एक भावनात्मक संकल्प बन जाता है। इस अभियान की महक अब पूरे देश में फैल चुकी है। डॉ. व्यास के इस जज्बे को देखकर उनके दोस्त और शुभचिंतक भी इस मुहिम का हिस्सा बन गए हैं। उनके कटक जाने वाले दोस्त नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जन्मस्थान की मिट्टी लाए हैं। बनारस से आए मित्र ने पं. मदन मोहन मालवीय के स्मारक की माटी भेंट की। इस तरह यह संग्रह अब सिर्फ डॉ. व्यास की धरोहर नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत की सामूहिक राष्ट्रभक्ति का प्रतीक बन चुका है।
राष्ट्रभक्ति अभियान का हिस्सा
इस अभियान में अब डॉ. नारायण व्यास अकेले नहीं हैं। उनके कई मित्र भी इस मुहिम से जुड़ चुके हैं। जब कोई मित्र किसी क्रांतिकारी या शहीद के स्मारक या ऐतिहासिक स्थल पर जाता है तो वहां की थोड़ी-सी माटी लेकर डॉ. व्यास को सौंप देता है। इस तरह यह संग्रह धीरे-धीरे एक व्यक्ति का निजी संग्रह न रहकर सामूहिक स्मृति और राष्ट्रभक्ति की धरोहर बनता जा रहा है।
कौन हैं डॉ. नारायण व्यास
5 जनवरी 1949 को उज्जैन में जन्मे डॉ. नारायण व्यास को पुरातत्व और इतिहास के क्षेत्र में लंबे योगदान के लिए जाना जाता है। उन्होंने एमए और पीएचडी जैसी उच्च शैक्षणिक उपाधियां हासिल की हैं। उनके पिता डॉ. अनंत लाल व्यास स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। पिता से मिले संस्कारों ने नारायण व्यास के जीवन की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पिता उन्हें खानदानी बर्तन, कपड़े और पुरानी धरोहरें संभालकर रखने की सीख देते थे। यही आदत आगे चलकर इतिहास और पुरातत्व की धरोहरों को संरक्षित करने के जुनून में बदल गई।
मिट्टी बोल रही वीरों की कहानी
आज डॉ. नारायण व्यास के पास रखे अलग-अलग बॉक्सों में सिर्फ माटी नहीं है। किसी में तात्या टोपे के संघर्ष की स्मृति है, किसी में रानी लक्ष्मीबाई के साहस की कहानी, किसी में चंद्रशेखर आजाद की क्रांतिकारी चेतना तो किसी में उन अनगिनत वीरों के बलिदान की गवाही, जिनके कारण भारत स्वतंत्र हुआ। डॉ. नारायण व्यास सपना है कि बच्चे इतिहास को केवल पढ़ें नहीं, उसे महसूस करें। शायद यही इस स्वतंत्रता दिवस पर उनकी सबसे बड़ी सीख भी है। आजादी हमें विरासत में मिली है, लेकिन उसे सम्मान देना हमारी जिम्मेदारी है। वीरों की माटी को माथे से लगाना केवल श्रद्धा नहीं, आने वाली पीढ़ी को अपने इतिहास से जोड़ने का संकल्प है।
कवि प्रदीप का गीत बना प्रेरणा
आओ बच्चो तुम्हें दिखाएं झांकी हिन्दुस्तान की... इस मिट्टी से तिलक करो, यह मिट्टी है बलिदान की... राष्ट्रकवि प्रदीप का लिखा यह गीत नारायण व्यास के लिए एक प्रेरणास्रोत बन गया और इससे प्रेरित होकर उन्होंने आजादी के दीवानों के जन्म स्थल और शहीद स्थलों की मिट्टी संग्रह करना शुरू कर दिया। आज से पांच साल पहले मिट्टी संग्रह का यह अनोखा कार्य उन्होंने शुरू किया था और अब तक वे ऐसे 150 स्थलों की मिट्टी का संग्रह कर चुके हैं।
