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Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   Independence Day: Reliefgarh Fort’s Soil Still Echoes the Bravery of 1857 Heroes and the Revolt in Bundelkhand

Independence Day: राहतगढ़ की माटी में जिंदा है 1857 के वीरों का शौर्य, वो जंग जिसने बुंदेलखंड में जगाई क्रांति

Sat, 15 Aug 2026 06:52 AM IST
सागर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सागर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सागर Published by: सागर ब्यूरो Updated Sat, 15 Aug 2026 06:52 AM IST
सार

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में बुंदेलखंड की धरती ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ वीरता की कई गाथाएं लिखीं। सागर का राहतगढ़ किला उसी संघर्ष का गवाह है। इस जंग में 24 क्रांतिकारियों को किले के मुख्य द्वार पर दी गई फांसी आज भी राहतगढ़ की माटी में अमर है।

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Independence Day: Reliefgarh Fort’s Soil Still Echoes the Bravery of 1857 Heroes and the Revolt in Bundelkhand
राहतगढ़ किला - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आजादी के अमृतकाल में जब-जब स्वतंत्रता संग्राम के स्वर्णिम इतिहास के पन्ने पलटे जाते हैं, बुंदेलखंड की माटी का शौर्य सोने की तरह चमकता नजर आता है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के पराक्रम से तो पूरी दुनिया वाकिफ है, लेकिन बुंदेलखंड के सागर जिले स्थित राहतगढ़ का किला उस ऐतिहासिक बगावत का साक्षी है, जहां भारतीय वीरों ने ब्रिटिश सेना के दांत खट्टे कर दिए थे। 

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अंग्रेजी हुकूमत के जुल्मों से सुलग रही क्रांति की आग 27 जून 1857 को झांसी के झोकनबाग के बाद सागर तक फैल गई। सागर में तैनात ब्रिटिश इंडियन फोर्स की 33 वीं और 42वीं पल्टन ने शेख रमजान की अगुआई में विद्रोह कर दिया। इसी दौरान भोपाल रियासत की गढ़ी अंबापानी के जागीरदार आदिल मोहम्मद खान और फाजिल मोहम्मद खान ने स्थानीय क्रांतिकारियों के साथ मिलकर राहतगढ़ किले पर धावा बोलकर उस पर कब्जा कर लिया। इस घटना से पूरे क्षेत्र में ऊर्जा भर गई और खुरई, खिमलासा व मालथौन तक बगावत की लहर दौड़ गई। 
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बुंदेलखंड का प्रवेश द्वार था राहतगढ़ का किला
सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण राहतगढ़ के किले को 'बुंदेलखंड का प्रवेश द्वार' माना जाता था। क्रांतिकारियों की रणनीति थी कि इंदौर और भोपाल से आने वाली ब्रिटिश सैन्य टुकड़ियों को इसी रास्ते पर रोककर सागर की तरफ बढ़ने न दिया जाए।  इस बगावत को कुचलने के लिए ब्रिटिश सरकार ने अपने सबसे क्रूर अफसर जनरल ह्यू रोज को सेंट्रल इंडिया फोर्स का प्रमुख बनाकर भेजा। ह्यू रोज भारी सेना और तोपखाने के साथ राहतगढ़ पहुंचा और किले को घेरकर अंधाधुंध गोलाबारी शुरू कर दी। जब अंदर फंसे क्रांतिकारियों ने बाहर मदद का संदेश भेजा, तो शाहगढ़ और बानपुर के राजा मर्दन सिंह की संयुक्त सेनाएं मदद के लिए टूट पड़ीं। जवाहर सिंह, हिम्मत सिंह और मलखान सिंह ने अंग्रेजी सेना को चारों तरफ से घेरकर भीषण हमला बोला। इस भीषण युद्ध का फायदा उठाकर कई क्रांतिकारी साजो-सामान के साथ सुरक्षित निकलने में सफल रहे।

मुख्य द्वार पर 24 क्रांतिकारियों को दी गई फांसी 
युद्ध के अंत में अंग्रेजों के हाथ लगे 24 क्रांतिकारियों को राहतगढ़ किले के मुख्य द्वार पर ही फांसी पर लटका दिया गया। इन अमर शहीदों में अंबापानी के जागीरदार फाजिल मोहम्मद खान भी शामिल थे। डॉ. प्रो. बी.के. श्रीवास्तव (विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग, सागर सेंट्रल यूनिवर्सिटी) कहते है कि 1857 के संग्राम में सागर जिले का कोना-कोना वीरों की शहादत का साक्षी रहा है। यदि उस दौरान स्थानीय स्तर पर अंग्रेजों को कुछ रियासतों का सहयोग न मिला होता, तो देश का इतिहास 1857 में ही बदल चुका होता। राहतगढ़ में अगर अंग्रेजी फौज रुक जाती, तो बुंदेलखंड में क्रांति का दमन होना असंभव था।

 

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