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Independence Day Special: इंदौर की वो कहानी, जब आजादी की आवाज पर मिली सजा, प्रजामंडल के संघर्ष ने रचा इतिहास
Sat, 15 Aug 2026 06:54 AM IST
कमलेश सेन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
Published by: कमलेश सेन
Updated Sat, 15 Aug 2026 06:54 AM IST
सार
जब देश आजादी की ओर बढ़ रहा था, तब इंदौर की होलकर रियासत में भी आंदोलन की चिंगारी तेज हो रही थी। युवाओं से लेकर प्रजामंडल कार्यकर्ताओं तक ने दमन सहकर आजादी की आवाज बुलंद की।
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तात्या सरवटे
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
इस बार देश अपना 80 वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। इस मौके पर इंदौर के स्वतंत्रता सेनानियों का पुण्य स्मरण करना लाजमी है। तत्कालीन होलकर रियासत के वक्त देश की आजादी के आंदोलन में युवाओं और छात्रों की सक्रिय भूमिका थी और उन्होंने आजादी पाने के लिए कष्ट भी सहे। होलकर राज्य में राष्ट्रीय आंदोलन की गतिविधियों में जुड़े लोगों को अंग्रेज हुकूमत द्वारा दंडित किया जाता था।
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आजादी के आंदोलन के दौरान इंदौर के अर्जुनलाल सेठी को शिक्षक पद छोड़ना पड़ा था तो गणपति उत्सव मनाने के अपराध में भाई कोतवाल को राज्य से निर्वासित किया गया था। वहीं शिवाजी उत्सव मनाने पर तात्या सरवटे को रियासत से चेतावनी दी गई थी। आजादी के बाद होलकर रियासत के कर्ताधर्ता भी भारतीय संघ में शामिल होने को लेकर आरंभिक रूप से आनाकानी करते रहे लेकिन प्रजामंडल की उत्तरदायी शासन की मांग और उसके दबाव में होलकर राजाओं ने विलय स्वीकार किया।
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राष्ट्रीय आंदोलनों में हमेशा अग्रणी रहा इंदौर
नौ जनवरी 1915 महात्मा गांधी भारत लौटे थे। गांधीजी के आगमन के तीन वर्ष बाद होलकर स्टेट में पहली बार उनका आगमन हुआ था। उनकी प्रदेश में सर्वप्रथम यात्रा 28 मार्च 1918 को इंदौर की हुई थी। गांधीजी के इंदौर आगमन के बाद यहां राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में तेजी आई। 1922 में इंदौर में राज्य प्रजा परिषद का अधिवेशन हुआ। इसके बाद प्रजा परिषद के कार्यकर्ताओं ने 1935 में इंदौर राज्य प्रजामंडल की स्थापना की थी, जिसने आजादी तक अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
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आम जनता में लोकप्रिय हुआ प्रजामंडल
इंदौर राज्य प्रजामंडल अपनी स्थापना के कुछ ही समय में लोकप्रिय हो गया था। 1936 में राज्य प्रजामंडल ने इंदौर नगर पालिका चुनाव में भाग लिया था इसमें प्रजामंडल को काफी सफलता मिली थी। इस सफलता से होलकर रियासत में प्रजामंडल के प्रति नाराजगी थी। रियासत ने प्रजामंडल के प्रमुख कार्यकर्ताओं को राज्य से निर्वासित कर दिया था। 1939 में राज्य प्रजामंडल का प्रथम अधिवेशन प्रस्तावित था लेकिन अधिवेशन पर रोक लगा दी गई थी।
प्रजामंडल पत्रिका का प्रकाशन
आमजन तक अपनी बात पहुंचाने के लिए 1940 से 1948 तक प्रजामंडल ने इसी नाम से पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया लेकिन 1942 से 1944 तक प्रजामंडल पत्रिका के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। उस वक्त देश में अनाज संकट था, इसलिए प्रतिबंध के दौर में अनाज नाम से साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया गया।
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स्वतंत्रता के पक्ष में नहीं था होलकर राजपरिवार
राज्य प्रजामंडल ने 1946 से उत्तरदायी शासन की मांग आरंभ कर दी थी और होलकर रियासत को अल्टीमेटम दे दिया था और लगे हाथ प्रजामंडल ने जनमत आंदोलन भी आरंभ कर दिया था। कैबिनेट मिशन के तहत भारत के विधान के लिए विधान परिषद का गठन किया गया। इसके बाद भारत की कई देशी रियासतें भारतीय संघ में शामिल होने लगी थीं।
होलकर रियासत ने विधान परिषद में कोई प्रतिनिधि नहीं भेजा, न ही भारतीय संघ में शामिल होने का अपना इरादा प्रकट किया। 14 अगस्त 1947 तक यानी देश की आजादी के एक दिन पहले तक इंदौर रियासत या होलकर रियासत संघ में शामिल होगी या नहीं, इस बात का संशय बना रहा। आखिरकार इसी दिन देर रात भारतीय संघ में शामिल होने का फैसला हुआ।
अप्रैल 1948 में बना मध्य भारत संघ
राज्य प्रजामंडल ने भारतीय संघ में होलकर रियासत के शामिल होने को लेकर जोरदार प्रयास किए और 1947 में इंदौर में पूर्णतः उत्तरदायी शासन की स्थापना हुई। देशभर में रियासतों के एकीकरण के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल प्रयासरत थे। ग्वालियर, इंदौर और मध्यभारत के छोटे-बड़े राज्यों को मिलाकर मध्यभारत संघ बनाए जाने के प्रयास हुए और 20 अप्रैल 1948 को विलय पत्र पर रियासतों के राजाओं ने हस्ताक्षर किए और मध्य भारत संघ का निर्माण हुआ। मध्य भारत ही आगे चलकर कई अन्य रियासतों के विलय व एकीकरण के बाद कालांतर में मध्य प्रदेश बना।
