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MP News: इंदौर त्रासदी के बाद सवालों के घेरे में PHE, 155 लैब सिर्फ तीन नियमित केमिस्ट, चीफ केमिस्ट का पद खाली

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल Published by: संदीप तिवारी Updated Sat, 10 Jan 2026 08:56 PM IST
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सार

इंदौर में दूषित पानी की घटना के बाद पीएचई विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं। प्रदेश में 155 लैब होने के बावजूद सिर्फ तीन नियमित केमिस्ट हैं और भोपाल की प्रदेश स्तरीय लैब में भी चीफ केमिस्ट का पद खाली है। हर साल 400 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी पानी की जांच आउटसोर्स कर्मचारियों के भरोसे चल रही है।

MP News: PHE department under scrutiny after Indore tragedy; 155 labs have only three regular chemists, Chief
लैब - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों ने मध्यप्रदेश की जल गुणवत्ता जांच व्यवस्था की गंभीर पोल खोल दी है। इस घटना के बाद जांच की सुई सीधे लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (PHE) विभाग पर टिक गई है, जो प्रदेश में पेयजल और औद्योगिक जल की गुणवत्ता जांच का जिम्मा संभालता है। हैरानी की बात यह है कि प्रदेशभर में 155 प्रयोगशालाएं होने के बावजूद पूरे मध्यप्रदेश में सिर्फ तीन नियमित केमिस्ट पदस्थ हैं।
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अनुभव के आधार पर चल रहा काम
भोपाल स्थित राज्य अनुसंधान प्रयोगशाला के प्रभारी चीफ केमिस्ट चूड़ामणि कलेले ने खुद विभाग में नियमित केमिस्टों की भारी कमी को स्वीकार किया है। उन्होंने बताया कि अनुभव के आधार पर आउटसोर्स और कार्यभारित कर्मचारी केमिस्ट का काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि उन्हें भी अनुभव के आधार पर प्रभारी चीफ केमिस्ट बनाया गया है और कई अन्य लैबों में भी लैब असिस्टेंट को प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है। कलेले ने यह भी बताया कि एमपीपीएससी के माध्यम से चीफ केमिस्ट की भर्ती प्रस्तावित है और आने वाले समय में नियमित अधिकारियों की नियुक्ति होने की उम्मीद है, जिसके बाद स्थिति में सुधार हो सकता है।


लैब असिस्टेंट और आउटसोर्स कर्मियों के भरोसे पानी की जांच
पीएचई विभाग के पास प्रदेश में 102 सब-डिवीजन लैब और 52 जिला स्तरीय लैब हैं, लेकिन अधिकतर जगहों पर वैज्ञानिक जांच की जिम्मेदारी नियमित केमिस्ट की बजाय लैब असिस्टेंट, संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों के कंधों पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह व्यवस्था न सिर्फ विभागीय नियमों के खिलाफ है, बल्कि आम लोगों की सेहत के साथ भी बड़ा जोखिम है।

राजधानी की सबसे अहम लैब में भी चीफ केमिस्ट नहीं
सिस्टम की हालत का सबसे बड़ा उदाहरण राजधानी भोपाल स्थित प्रदेश स्तरीय अनुसंधान प्रयोगशाला है, जिसे पूरे राज्य की रेफरेंस लैब माना जाता है। यहां भी चीफ केमिस्ट का पद वर्षों से खाली है और प्रभारी व्यवस्था के सहारे काम चल रहा है।


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400 करोड़ का बजट, लेकिन जमीनी सच्चाई अलग
पीएचई विभाग हर साल करीब 400 करोड़ रुपये पानी की गुणवत्ता जांच और जल आपूर्ति से जुड़े कार्यों पर खर्च करता है। विभाग का मुख्य काम ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की टेस्टिंग के साथ-साथ शहरों में लगने वाले उद्योगों के पानी की जांच करना है। इसके बावजूद कई जिलों में लैब या तो पूरी तरह खाली हैं या नाम मात्र के स्टाफ के सहारे चल रही हैं।

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इंदौर की घटना ने सिस्टम पर बड़ा सवाल खड़ा किया
इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों के बाद यह सवाल और गहरा हो गया है कि अगर समय पर, नियमित और वैज्ञानिक तरीके से पानी की जांच होती, तो क्या यह हादसा रोका जा सकता था? जानकारों का मानना है कि केमिस्टों की भारी कमी, खाली लैब और कमजोर मॉनिटरिंग ही ऐसी घटनाओं की सबसे बड़ी वजह बन रही है। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार और पीएचई विभाग सिर्फ जांच के आदेश देकर जिम्मेदारी से बच जाएंगे, या फिर इंदौर त्रासदी के बाद लैब सिस्टम को दुरुस्त करने और नियमित केमिस्टों की तत्काल भर्ती पर ठोस और समयबद्ध कार्रवाई होगी?

 
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