{"_id":"6a4a2c835e27c6e5270700bb","slug":"mp-news-uproar-over-privatization-of-community-health-centres-health-organizations-warn-government-of-agitat-2026-07-05","type":"story","status":"publish","title_hn":"Bhopal: स्वास्थ्य केंद्रों के निजीकरण के खिलाफ एकजुट हुए डॉक्टर, कर्मचारी और जनसंगठन, फैसला वापस लेने की मांग","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Bhopal: स्वास्थ्य केंद्रों के निजीकरण के खिलाफ एकजुट हुए डॉक्टर, कर्मचारी और जनसंगठन, फैसला वापस लेने की मांग
Sun, 05 Jul 2026 04:09 PM IST
Sandeep Kumar Tiwari
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
Published by: Sandeep Kumar Tiwari
Updated Sun, 05 Jul 2026 04:09 PM IST
सार
मध्य प्रदेश सरकार के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को निजी संस्थाओं को सौंपने के फैसले का डॉक्टरों, स्वास्थ्य कर्मचारियों और जनस्वास्थ्य संगठनों ने विरोध किया है। संगठनों ने कहा कि सरकार निजीकरण की बजाय स्वास्थ्य बजट बढ़ाए, खाली पदों पर भर्ती करे और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत बनाए। फैसला वापस नहीं लेने पर आंदोलन की चेतावनी भी दी गई।
विज्ञापन
स्वास्थ्य संगठनों की प्रेसवार्ता
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
मध्य प्रदेश सरकार द्वारा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को निजी संस्थाओं के माध्यम से संचालित करने के फैसले का डॉक्टरों, स्वास्थ्य कर्मचारियों और जनस्वास्थ्य से जुड़े संगठनों ने कड़ा विरोध किया है। रविवार को भोपाल में आयोजित प्रेसवार्ता में संगठनों ने सरकार से यह निर्णय तत्काल वापस लेने की मांग करते हुए कहा कि यदि फैसला नहीं बदला गया तो आंदोलन किया जाएगा। संगठनों का कहना है कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को निजी हाथों में सौंपने के बजाय सरकार को स्वास्थ्य बजट बढ़ाने, डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों के खाली पद भरने तथा सरकारी अस्पतालों को संसाधनों से सशक्त बनाने पर ध्यान देना चाहिए।
कैबिनेट से मिली है मंजूरी
सरकार ने ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी दूर करने के उद्देश्य से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को निजी संस्थाओं को सौंपने का निर्णय लिया है। हाल ही में हुई कैबिनेट बैठक में इस परियोजना को मंजूरी दी गई। पहले चरण में रीवा, देवास और गुना जिले के कुल 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को पायलट परियोजना में शामिल किया गया है।
निजीकरण से बिगड़ सकती है व्यवस्था
मध्य प्रदेश मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. आनंद शर्मा ने कहा कि प्रदेश पहले से ही मातृ मृत्यु दर जैसी स्वास्थ्य चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में यदि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों का निजीकरण किया गया तो हालात और गंभीर हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी सरकारी व्यवस्था के निजीकरण से भविष्य में भ्रष्टाचार बढ़ने की आशंका रहती है, इसलिए सरकार को अपना फैसला वापस लेना चाहिए।
विज्ञापन
एमएलसी और पोस्टमार्टम को लेकर भी चिंता
मध्य प्रदेश मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. राकेश मालवीय ने कहा कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में मेडिको-लीगल सर्टिफिकेट, पोस्टमार्टम और अन्य मेडिकल जांच जैसे संवेदनशील कार्य किए जाते हैं। इनकी रिपोर्ट अदालतों में भी साक्ष्य के रूप में पेश होती है। ऐसे में यदि ये केंद्र निजी संस्थाओं के हवाले कर दिए गए तो इन प्रक्रियाओं की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
समस्या निजीकरण नहीं, डॉक्टरों और अस्पतालों की कमी
संगठन ने कहा कि प्रदेश की सबसे बड़ी चुनौती निजीकरण नहीं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में संसाधनों और मानवबल की भारी कमी है। ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी 2021-22 के अनुसार मध्य प्रदेश में 4,134 उप स्वास्थ्य केंद्र, 1,045 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 245 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की कमी है। वहीं, लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 के मुताबिक प्रदेश में 55 जिला अस्पताल, 51 ट्रॉमा सेंटर, 158 सिविल अस्पताल, 348 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 1,442 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 10,256 उप स्वास्थ्य केंद्र संचालित हैं।
यह भी पढ़ें-दिग्विजय ने मोहन भागवत को पदयात्रा का दिया न्योता, बोले- धर्म की रक्षा के लिए RSS-VHP करें समर्थन
हजारों डॉक्टरों के पद खाली
ज्ञापन में दावा किया गया है कि प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का बड़ा कारण डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के रिक्त पद हैं। रिपोर्ट के अनुसार 5,543 विशेषज्ञ चिकित्सकों के स्वीकृत पदों में 3,698, 6,513 चिकित्सा अधिकारियों के पदों में 2,689 तथा 728 दंत चिकित्सा अधिकारियों के पदों में 481 पद खाली हैं। ऐसे में निजीकरण के बजाय इन पदों पर नियमित भर्ती की जरूरत है।
यह भी पढ़ें-मध्य प्रदेश में मानसून पूरी तरह सक्रिय, आधे प्रदेश में आज भारी से अति भारी बारिश का अलर्ट
निजीकरण नहीं, स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करें
प्रेसवार्ता में मौजूद संगठनों ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार चाहती है तो निजीकरण की राह छोड़कर सरकारी अस्पतालों में निवेश बढ़ाए, रिक्त पदों पर शीघ्र भर्ती करे और स्वास्थ्य संस्थानों को आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए। उनका कहना है कि मजबूत सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था ही आम लोगों को बेहतर और सुलभ इलाज दे सकती है। ज्ञापन पर चिकित्सा शिक्षा महासंघ, मध्य प्रदेश मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन, मध्य प्रदेश मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन, जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन, नर्सिंग ऑफिसर्स एसोसिएशन, संविदा चिकित्सक संघ, भारतीय मजदूर संघ, जन स्वास्थ्य अभियान सहित कई स्वास्थ्य और कर्मचारी संगठनों के प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किए हैं।
विज्ञापन
कैबिनेट से मिली है मंजूरी
सरकार ने ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी दूर करने के उद्देश्य से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को निजी संस्थाओं को सौंपने का निर्णय लिया है। हाल ही में हुई कैबिनेट बैठक में इस परियोजना को मंजूरी दी गई। पहले चरण में रीवा, देवास और गुना जिले के कुल 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को पायलट परियोजना में शामिल किया गया है।
विज्ञापन
निजीकरण से बिगड़ सकती है व्यवस्था
मध्य प्रदेश मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. आनंद शर्मा ने कहा कि प्रदेश पहले से ही मातृ मृत्यु दर जैसी स्वास्थ्य चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में यदि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों का निजीकरण किया गया तो हालात और गंभीर हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी सरकारी व्यवस्था के निजीकरण से भविष्य में भ्रष्टाचार बढ़ने की आशंका रहती है, इसलिए सरकार को अपना फैसला वापस लेना चाहिए।
विज्ञापन
एमएलसी और पोस्टमार्टम को लेकर भी चिंता
मध्य प्रदेश मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. राकेश मालवीय ने कहा कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में मेडिको-लीगल सर्टिफिकेट, पोस्टमार्टम और अन्य मेडिकल जांच जैसे संवेदनशील कार्य किए जाते हैं। इनकी रिपोर्ट अदालतों में भी साक्ष्य के रूप में पेश होती है। ऐसे में यदि ये केंद्र निजी संस्थाओं के हवाले कर दिए गए तो इन प्रक्रियाओं की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
समस्या निजीकरण नहीं, डॉक्टरों और अस्पतालों की कमी
संगठन ने कहा कि प्रदेश की सबसे बड़ी चुनौती निजीकरण नहीं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में संसाधनों और मानवबल की भारी कमी है। ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी 2021-22 के अनुसार मध्य प्रदेश में 4,134 उप स्वास्थ्य केंद्र, 1,045 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 245 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की कमी है। वहीं, लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 के मुताबिक प्रदेश में 55 जिला अस्पताल, 51 ट्रॉमा सेंटर, 158 सिविल अस्पताल, 348 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 1,442 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 10,256 उप स्वास्थ्य केंद्र संचालित हैं।
यह भी पढ़ें-दिग्विजय ने मोहन भागवत को पदयात्रा का दिया न्योता, बोले- धर्म की रक्षा के लिए RSS-VHP करें समर्थन
हजारों डॉक्टरों के पद खाली
ज्ञापन में दावा किया गया है कि प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का बड़ा कारण डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के रिक्त पद हैं। रिपोर्ट के अनुसार 5,543 विशेषज्ञ चिकित्सकों के स्वीकृत पदों में 3,698, 6,513 चिकित्सा अधिकारियों के पदों में 2,689 तथा 728 दंत चिकित्सा अधिकारियों के पदों में 481 पद खाली हैं। ऐसे में निजीकरण के बजाय इन पदों पर नियमित भर्ती की जरूरत है।
यह भी पढ़ें-मध्य प्रदेश में मानसून पूरी तरह सक्रिय, आधे प्रदेश में आज भारी से अति भारी बारिश का अलर्ट
निजीकरण नहीं, स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करें
प्रेसवार्ता में मौजूद संगठनों ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार चाहती है तो निजीकरण की राह छोड़कर सरकारी अस्पतालों में निवेश बढ़ाए, रिक्त पदों पर शीघ्र भर्ती करे और स्वास्थ्य संस्थानों को आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए। उनका कहना है कि मजबूत सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था ही आम लोगों को बेहतर और सुलभ इलाज दे सकती है। ज्ञापन पर चिकित्सा शिक्षा महासंघ, मध्य प्रदेश मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन, मध्य प्रदेश मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन, जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन, नर्सिंग ऑफिसर्स एसोसिएशन, संविदा चिकित्सक संघ, भारतीय मजदूर संघ, जन स्वास्थ्य अभियान सहित कई स्वास्थ्य और कर्मचारी संगठनों के प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किए हैं।
