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MP Rajya Sabha Election: परिवाद और एफआईआर के कानूनी अंतर पर टिकी मीनाक्षी नटराजन की राहत की उम्मीद
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
Published by: Anand Pawar
Updated Tue, 09 Jun 2026 10:35 PM IST
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सार
मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त होने के बाद अब कानूनी बहस इस बात पर केंद्रित हो गई है कि संबंधित मामला एफआईआर था या केवल परिवाद। विशेषज्ञों का मानना है कि इसी प्रश्न का जवाब आगे की न्यायिक प्रक्रिया की दिशा तय करेगा।
पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त होने के बाद अब पूरा मामला कानूनी बहस का विषय बन गया है। विवाद का केंद्र यह है कि जिस न्यायालयीन प्रकरण का उल्लेख नामांकन पत्र के साथ प्रस्तुत शपथ पत्र (फॉर्म-26) में नहीं किया गया, वह एफआईआर आधारित आपराधिक मामला था या फिर केवल एक परिवाद (कम्प्लेंट केस)। इस मामले में जबलपुर हाईकोर्ट के वकील अमित नामदेव ने बताया कि एफआईआर और परिवाद दोनों की प्रकृति अलग-अलग होती है। एफआईआर पुलिस थाने में दर्ज की जाती है और उसके बाद पुलिस जांच करती है। आमतौर पर संज्ञेय अपराधों से जुड़े मामलों में एफआईआर दर्ज होती है। दूसरी ओर परिवाद सीधे न्यायालय में दायर किया जाता है, जहां न्यायालय शिकायत की प्रारंभिक जांच के बाद पुलिस को केस दर्ज करने के निर्देश देता है।
ये भी पढ़ें- मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द: कैलाश विजयवर्गीय का दावा- हमें लंबित मामले की जानकारी कांग्रेस से ही मिली
मीनाक्षी नटराजन के नामांकन निरस्तीकरण के आदेश में उल्लेख किया गया है कि उनके खिलाफ एक न्यायालयीन प्रकरण लंबित था, जिसमें न्यायालय द्वारा समन जारी किया गया था और उन्होंने स्वयं अपना जवाब भी प्रस्तुत किया था। रिटर्निंग ऑफिसर ने इसे उम्मीदवार की जानकारी में मौजूद मामला मानते हुए शपथ पत्र में इसका उल्लेख नहीं करने को तथ्य छिपाने की श्रेणी में रखा है।
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ये भी पढ़ें- MP Rajya Sabha: क्या था वो मामला जिसकी वजह से रद्द हुआ मीनाक्षी का नामांकन, कैसे कांग्रेस के हाथ से निकली सीट?
हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि यदि संबंधित मामला केवल परिवाद पर समन था और एफआईआर आधारित आपराधिक प्रकरण नहीं था, तो यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या उसका खुलासा चुनावी शपथ पत्र में अनिवार्य था। यही बिंदु आगे किसी न्यायिक चुनौती की स्थिति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मामला अदालत तक पहुंचता है तो मुख्य प्रश्न यह होगा कि संबंधित प्रकरण की प्रकृति क्या थी? और निर्वाचन आयोग के नियमों के अनुसार उसका उल्लेख फॉर्म-26 में करना आवश्यक था या नहीं? इसी आधार पर यह तय होगा कि नामांकन निरस्त करने का आदेश कानूनी कसौटी पर कितना खरा साबित होता है।
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मीनाक्षी नटराजन के नामांकन निरस्तीकरण के आदेश में उल्लेख किया गया है कि उनके खिलाफ एक न्यायालयीन प्रकरण लंबित था, जिसमें न्यायालय द्वारा समन जारी किया गया था और उन्होंने स्वयं अपना जवाब भी प्रस्तुत किया था। रिटर्निंग ऑफिसर ने इसे उम्मीदवार की जानकारी में मौजूद मामला मानते हुए शपथ पत्र में इसका उल्लेख नहीं करने को तथ्य छिपाने की श्रेणी में रखा है।
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हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि यदि संबंधित मामला केवल परिवाद पर समन था और एफआईआर आधारित आपराधिक प्रकरण नहीं था, तो यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या उसका खुलासा चुनावी शपथ पत्र में अनिवार्य था। यही बिंदु आगे किसी न्यायिक चुनौती की स्थिति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मामला अदालत तक पहुंचता है तो मुख्य प्रश्न यह होगा कि संबंधित प्रकरण की प्रकृति क्या थी? और निर्वाचन आयोग के नियमों के अनुसार उसका उल्लेख फॉर्म-26 में करना आवश्यक था या नहीं? इसी आधार पर यह तय होगा कि नामांकन निरस्त करने का आदेश कानूनी कसौटी पर कितना खरा साबित होता है।

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