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छात्रसंघ चुनाव से सियासी बिसात बिछी: एबीवीपी-एनएसयूआई मैदान में, 2028 विधानसभा की तैयारी कैंपस से शुरू
Wed, 05 Aug 2026 06:37 PM IST
Sandeep Kumar Tiwari
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
Published by: Sandeep Kumar Tiwari
Updated Wed, 05 Aug 2026 06:37 PM IST
सार
करीब 9 साल बाद मध्यप्रदेश में छात्रसंघ चुनाव होने जा रहे हैं। हाईकोर्ट के निर्देश के बाद सितंबर में चुनाव का रास्ता साफ होते ही एबीवीपी और एनएसयूआई युवाओं को जोड़ने के अभियान में जुट गए हैं। कांग्रेस और भाजपा भी छात्र राजनीति के जरिए 2028 विधानसभा चुनाव की तैयारी में कैंपस पर फोकस कर रही हैं।
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एमपी में छात्र संगठन चुनाव
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मध्यप्रदेश में करीब नौ साल बाद होने जा रहे छात्रसंघ चुनाव सिर्फ कॉलेज परिसरों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि इन्हें 2028 विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल भी माना जा रहा है। हाईकोर्ट के निर्देश के बाद सितंबर के पहले दस दिनों में छात्रसंघ चुनाव कराने का रास्ता साफ होते ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) और राष्ट्रीय छात्र संगठन (एनएसयूआई) पूरी ताकत से मैदान में उतर गए हैं। दोनों संगठन अधिक से अधिक युवाओं को अपने साथ जोड़ने में जुट गए हैं, जबकि कांग्रेस और भाजपा भी छात्र राजनीति के जरिए भविष्य की राजनीतिक जमीन मजबूत करने की रणनीति बना रही हैं।
नौ साल बाद लौटेगी छात्र राजनीति
प्रदेश के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में वर्ष 2017 के बाद पहली बार छात्रसंघ चुनाव होंगे। हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 का कैलेंडर पेश कर सितंबर के पहले दस दिनों में चुनाव कराने का लिखित आश्वासन दिया है। इसके बाद छात्र राजनीति में हलचल तेज हो गई है।
युवाओं के जरिए भविष्य की राजनीति साधने की कोशिश
छात्रसंघ चुनाव हमेशा से बड़े राजनीतिक दलों के लिए नए नेतृत्व की प्रयोगशाला रहे हैं। यही वजह है कि एबीवीपी और एनएसयूआई सदस्यता अभियान, कॉलेज संपर्क और छात्र मुद्दों को लेकर सक्रिय हो गए हैं। दोनों संगठनों की कोशिश है कि अधिक से अधिक युवाओं को अपने साथ जोड़कर चुनावी बढ़त बनाई जाए।
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2028 विधानसभा चुनाव पर भी नजर
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि छात्रसंघ चुनाव में जीत का असर सीधे 2028 के विधानसभा चुनाव तक दिखाई दे सकता है। छात्र राजनीति से निकलने वाले युवा नेता आगे चलकर विधानसभा और लोकसभा चुनावों में अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए कांग्रेस और भाजपा भी अपने छात्र संगठनों के जरिए कैंपस में पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही हैं।
दोनों संगठन जीत का दावा कर रहे
एनएसयूआई का दावा है कि छात्रसंघ चुनाव उनके लंबे आंदोलन और न्यायालय की सख्ती का परिणाम हैं। वहीं एबीवीपी इसे छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली बताते हुए लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अनुसार निष्पक्ष और समयबद्ध चुनाव कराने की मांग कर रही है।
एबीवीपी ने लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली बताया
एबीवीपी के मध्य भारत प्रांत मंत्री केतन चतुर्वेदी ने कहा कि छात्रसंघ चुनाव विद्यार्थियों में नेतृत्व क्षमता और सामाजिक उत्तरदायित्व विकसित करते हैं। उन्होंने सरकार से लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अनुसार निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध चुनाव कराने की मांग की।
यह भी पढ़ें-कांग्रेस का बड़ा संगठनात्मक फैसला, मध्यप्रदेश के सभी विभाग और प्रकोष्ठ भंग, नए गठन की तैयारी शुरू
एनएसयूआई बोली- छात्रों के संघर्ष की जीत
एनएसयूआई के प्रदेश अध्यक्ष आशुतोष चौकसे ने कहा कि छात्रसंघ चुनाव बहाल होना छात्रों के लंबे संघर्ष और लोकतांत्रिक अधिकारों की जीत है। उन्होंने कहा कि संगठन प्रदेशभर के कॉलेजों में छात्रों के बीच पहुंचकर नए युवाओं को जोड़ने और छात्र हितों के मुद्दों को मजबूती से उठाने का काम करेगा।
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नौ साल बाद लौटेगी छात्र राजनीति
प्रदेश के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में वर्ष 2017 के बाद पहली बार छात्रसंघ चुनाव होंगे। हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 का कैलेंडर पेश कर सितंबर के पहले दस दिनों में चुनाव कराने का लिखित आश्वासन दिया है। इसके बाद छात्र राजनीति में हलचल तेज हो गई है।
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युवाओं के जरिए भविष्य की राजनीति साधने की कोशिश
छात्रसंघ चुनाव हमेशा से बड़े राजनीतिक दलों के लिए नए नेतृत्व की प्रयोगशाला रहे हैं। यही वजह है कि एबीवीपी और एनएसयूआई सदस्यता अभियान, कॉलेज संपर्क और छात्र मुद्दों को लेकर सक्रिय हो गए हैं। दोनों संगठनों की कोशिश है कि अधिक से अधिक युवाओं को अपने साथ जोड़कर चुनावी बढ़त बनाई जाए।
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2028 विधानसभा चुनाव पर भी नजर
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि छात्रसंघ चुनाव में जीत का असर सीधे 2028 के विधानसभा चुनाव तक दिखाई दे सकता है। छात्र राजनीति से निकलने वाले युवा नेता आगे चलकर विधानसभा और लोकसभा चुनावों में अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए कांग्रेस और भाजपा भी अपने छात्र संगठनों के जरिए कैंपस में पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही हैं।
दोनों संगठन जीत का दावा कर रहे
एनएसयूआई का दावा है कि छात्रसंघ चुनाव उनके लंबे आंदोलन और न्यायालय की सख्ती का परिणाम हैं। वहीं एबीवीपी इसे छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली बताते हुए लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अनुसार निष्पक्ष और समयबद्ध चुनाव कराने की मांग कर रही है।
एबीवीपी ने लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली बताया
एबीवीपी के मध्य भारत प्रांत मंत्री केतन चतुर्वेदी ने कहा कि छात्रसंघ चुनाव विद्यार्थियों में नेतृत्व क्षमता और सामाजिक उत्तरदायित्व विकसित करते हैं। उन्होंने सरकार से लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अनुसार निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध चुनाव कराने की मांग की।
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एनएसयूआई बोली- छात्रों के संघर्ष की जीत
एनएसयूआई के प्रदेश अध्यक्ष आशुतोष चौकसे ने कहा कि छात्रसंघ चुनाव बहाल होना छात्रों के लंबे संघर्ष और लोकतांत्रिक अधिकारों की जीत है। उन्होंने कहा कि संगठन प्रदेशभर के कॉलेजों में छात्रों के बीच पहुंचकर नए युवाओं को जोड़ने और छात्र हितों के मुद्दों को मजबूती से उठाने का काम करेगा।
