ओंकारेश्वर-महेश्वर से पैदल नर्मदा जल ले जा रहे उज्जैन, कांवड़ यात्रा में दिखे आस्था के नए रंग
ओंकारेश्वर और महेश्वर से उज्जैन तक निकल रही कांवड़ यात्रा आस्था, भक्ति और समर्पण का अनूठा संगम बन गई है। छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हजारों शिवभक्त हर दिन 25 से 30 किलोमीटर पैदल चलकर बाबा महाकाल को नर्मदा जल अर्पित करने पहुंच रहे हैं।
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इंदौर की तरफ आने वाली सड़कों पर सावन माह में आस्था के नए रंग बिखरे हैं। आंखों पर महंगे सनग्लासेस, कंधे पर सजी-धजी कांवड़ और बोल बम के जयघोष के साथ उठते कदमों से ओंकारेश्वर से उज्जैन के बीच की दूरी पैदल तय हो रही है। कई भक्त महेश्वर से भी उज्जैन जा रहे हैं।
आस्था की कांवड़ उठाने वालों में 12 से 15 साल के बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग भी हैं। आखिर क्या मिलता है कांवड़ यात्रा से? यह पूछे जाने पर उनका जवाब होता है—बाबा की भक्ति के बाद मन में संतोष रहता है। शरीर में अलग ही ऊर्जा रहती है। हर रोज हजारों कदम पैदल चलने के बावजूद दर्द नहीं ठहरता है।
बंगाली कांवड़ बनने में किए दस हजार खर्च
कांवड़ यात्रा में शामिल एक युवक की कांवड़ पीतल से बनी थी और काफी सजी-धजी थी। उसने बताया कि वह पांच साल से पैदल कांवड़ यात्रा में शामिल होता है। इस बार बंगाली कांवड़ से यात्रा करने की इच्छा थी। दस हजार का खर्च आया, लेकिन कांवड़ देखकर लोग आते हैं तो खुशी मिलती है। उसकी कांवड़ में फूल, मोरपंख और पीतल की घंटियां बंधी हैं। एक शिवभक्त तो कंधे पर शिव प्रतिमा को लेकर पैदल-पैदल चल रहे हैं।
नाबालिग भी उठा रहे कांवड़
कांवड़ यात्रा में नाबालिग भी कांवड़ उठाए चल रहे हैं। वे अपने माता-पिता या अन्य रिश्तेदार के साथ यात्रा में शामिल हैं। इसके अलावा एक पिता अपने कंधे के एक तरफ कांवड़ और एक तरफ बेटे को बैठाकर चलते नजर आए।
हर दिन 25 से 30 किमी पैदल यात्रा
कांवड़ के साथ शिवभक्त हर दिन 25 से 30 किलोमीटर पैदल यात्रा कर रहे हैं। हरी-भरी वादियों और पहाड़ों के बीच से पैदल चलते शिवभक्त रात में किसी मंदिर में विश्राम करते हैं। डेढ़ सौ किलोमीटर का सफर चार से पांच दिन में किया जा रहा है।
