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Indore News: 'मैंने आज तक ऐसा ऑर्डर नहीं देखा', सोनम रघुवंशी की जमानत पर वरिष्ठ वकीलों ने ऐसा क्यों कहा?
Sat, 11 Jul 2026 09:13 AM IST
Arjun Richhariya
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
Published by: Arjun Richhariya
Updated Sat, 11 Jul 2026 09:13 AM IST
सार
राज रघुवंशी मर्डर केस में मुख्य आरोपी सोनम रघुवंशी को हाई कोर्ट से जमानत मिल गई है, जिस पर अब कानूनी विशेषज्ञों के बीच एक नई बहस छिड़ गई है।
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राजा रघुवंशी केस में वरिष्ठ वकीलों से बातचीत।
- फोटो : अमर उजाला, डिजिटल डेस्क, इंदौर
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विस्तार
राज रघुवंशी मर्डर केस में आरोपी सोनम रघुवंशी को जमानत मिल गई है। उन्हें जमानत किस आधार पर मिली है इस पर अब बहस छिड़ गई है। कानून के विशेषज्ञों के इस पर कई तर्क हैं।
मैंने पहली बार इस तरह की जमानत देखी
इंदौर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष मनीष यादव ने कहा कि मैंने पहली बार ऐसा देखा है कि टेक्निकल आधार पर किसी भी कोर्ट ने जमानत दी हो। मैंने ऑर्डर भी पढ़ा था। पर मैंने आज तक 302 के अपराध में ऐसा जमानत ऑर्डर नहीं देखा। कानूनन देखा जाए तो वो सही माना जा सकता है पर टाइपिंग की एरर पर या केवल अभियोजन के द्वारा कुछ त्रुटि रह जाने से या धारा कम हो जाने से इस तरह की जमानत दे देना मुझे हजम नहीं हुआ था। इसके अलावा जो अन्य वरिष्ठ वकील हैं उनको भी यह निर्णय समझ नहीं आया। सोनम की जमानत के हाईकोर्ट के फैसले को अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। यह संभावना है कि सुप्रीम कोर्ट से सोनम की जमानत निरस्त हो जाएगी।
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इससे समाज में बहुत गलत संदेश जाएगा
मनीष यादव ने कहा कि हाई कोर्ट ने टेक्निकल आधार पर जमानत दी है। अगर सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि टेक्निकल आधार पर जमानत देना चाहिए तो कल से इस तरह के फैसलों की बाढ़ सी आ जाएगी। अगर ये अपने आप में नजीर बन गया तो बहुत मुश्किल होगा। कई बार ऐसा होता है कि पुलिस जल्दबाजी में होती है। अभियोजन जल्दबाजी में होता है तो धाराओं की आगे पीछे लिख देता है। पर इसका फायदा अगर सोनम रघुवंशी को मिल जाता है और सुप्रीम कोर्ट भी यह मान लेती है कि उसको जमानत सही मिली तो इसका एक बहुत गलत मैसेज जाएगा। क्योंकि मैं डिफेंस लॉयर हूं। मेरा पक्ष है कि आरोपी गण को बचाना पर फिर भी अगर देखा जाए तो इससे पीड़ित पक्ष कहीं ना कहीं प्रभावित होगा।
जमानत देना न्यायालय का विशेषाधिकार, लेकिन जो त्रुटि हुई वह कई स्तर पर पकड़ी जा सकती थी
हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष रितेश ईनाणी ने कहा कि अगर एप्लीकेशन मेघालय कोर्ट में लगाई गई और उसमें धाराएं गलत लिखी गई थी तो उसकी एक प्रोसेस होती है। फाइल चेक होती है। हम जब भी कोई फाइल फाइल करते हैं वहां चेकिंग के दौरान उसको देखा जाता है। सुनवाई के दौरान जो भी शासकीय अधिवक्ता वहां रहते हैं वह यह बात बता सकते हैं। इन सब तथ्यों के बाद भी अगर न्यायालय ने किसी केस में जमानत दे दी है तो एक न्यायालय का एक विशेषाधिकार होता है। अब सुप्रीम कोर्ट के सामने निश्चित तौर पर एक नई चीज उभर कर आई है, जिसमें किसी भी जमानत प्रक्रिया में है कोर्ट को क्या-क्या मापदंड निर्धारित करने चाहिए इस पर विचार होगा।
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मैंने पहली बार इस तरह की जमानत देखी
इंदौर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष मनीष यादव ने कहा कि मैंने पहली बार ऐसा देखा है कि टेक्निकल आधार पर किसी भी कोर्ट ने जमानत दी हो। मैंने ऑर्डर भी पढ़ा था। पर मैंने आज तक 302 के अपराध में ऐसा जमानत ऑर्डर नहीं देखा। कानूनन देखा जाए तो वो सही माना जा सकता है पर टाइपिंग की एरर पर या केवल अभियोजन के द्वारा कुछ त्रुटि रह जाने से या धारा कम हो जाने से इस तरह की जमानत दे देना मुझे हजम नहीं हुआ था। इसके अलावा जो अन्य वरिष्ठ वकील हैं उनको भी यह निर्णय समझ नहीं आया। सोनम की जमानत के हाईकोर्ट के फैसले को अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। यह संभावना है कि सुप्रीम कोर्ट से सोनम की जमानत निरस्त हो जाएगी।
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इससे समाज में बहुत गलत संदेश जाएगा
मनीष यादव ने कहा कि हाई कोर्ट ने टेक्निकल आधार पर जमानत दी है। अगर सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि टेक्निकल आधार पर जमानत देना चाहिए तो कल से इस तरह के फैसलों की बाढ़ सी आ जाएगी। अगर ये अपने आप में नजीर बन गया तो बहुत मुश्किल होगा। कई बार ऐसा होता है कि पुलिस जल्दबाजी में होती है। अभियोजन जल्दबाजी में होता है तो धाराओं की आगे पीछे लिख देता है। पर इसका फायदा अगर सोनम रघुवंशी को मिल जाता है और सुप्रीम कोर्ट भी यह मान लेती है कि उसको जमानत सही मिली तो इसका एक बहुत गलत मैसेज जाएगा। क्योंकि मैं डिफेंस लॉयर हूं। मेरा पक्ष है कि आरोपी गण को बचाना पर फिर भी अगर देखा जाए तो इससे पीड़ित पक्ष कहीं ना कहीं प्रभावित होगा।
जमानत देना न्यायालय का विशेषाधिकार, लेकिन जो त्रुटि हुई वह कई स्तर पर पकड़ी जा सकती थी
हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष रितेश ईनाणी ने कहा कि अगर एप्लीकेशन मेघालय कोर्ट में लगाई गई और उसमें धाराएं गलत लिखी गई थी तो उसकी एक प्रोसेस होती है। फाइल चेक होती है। हम जब भी कोई फाइल फाइल करते हैं वहां चेकिंग के दौरान उसको देखा जाता है। सुनवाई के दौरान जो भी शासकीय अधिवक्ता वहां रहते हैं वह यह बात बता सकते हैं। इन सब तथ्यों के बाद भी अगर न्यायालय ने किसी केस में जमानत दे दी है तो एक न्यायालय का एक विशेषाधिकार होता है। अब सुप्रीम कोर्ट के सामने निश्चित तौर पर एक नई चीज उभर कर आई है, जिसमें किसी भी जमानत प्रक्रिया में है कोर्ट को क्या-क्या मापदंड निर्धारित करने चाहिए इस पर विचार होगा।
