हाईकोर्ट सख्त: गंभीर मामलों में रूटीन तरीके से नहीं दी जा सकती अग्रिम जमानत; एक्साइज एक्ट मामलों में टिप्पणी
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हाईकोर्ट के जस्टिस राम कुमार चौबे की एकलपीठ ने अपने एक अहम आदेश में कहा है कि जमानत देना न्यायालय का स्वविवेकाधिकार है, लेकिन अग्रिम जमानत (एंटीसिपेटरी बेल) का अधिकार विशेष परिस्थितियों में ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। गंभीर मामलों में आरोपी को अंतरिम सुरक्षा या संरक्षण देने से न्याय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इससे जांच में बाधा आने, साक्ष्यों से छेड़छाड़ होने या जांच का रुख भटकने की आशंका रहती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अग्रिम जमानत की शक्ति का उपयोग सामान्य प्रक्रिया की तरह नहीं, बल्कि अत्यंत सावधानी के साथ किया जाना चाहिए।
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मामला पन्ना जिले के सिमरिया थाना क्षेत्र का है, जहां पुलिस ने आबकारी अधिनियम की धारा 34(2) के तहत प्रकरण दर्ज किया था। इस मामले में आरोपी बनाए गए बब्लू उर्फ रामपाल यादव ने हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि उसके मवेशी शेड से पुलिस ने 65 लीटर शराब बरामद की थी और मौके से उसके भतीजे अनुज यादव को गिरफ्तार किया गया था। भतीजे के मेमोरेंडम के आधार पर उसे भी आरोपी बनाया गया।
एकलपीठ ने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि अवैध शराब आवेदक के स्वामित्व वाले मवेशी शेड से बरामद हुई थी, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि उसके खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि आबकारी अधिनियम की धारा 59-ए, धारा 34(2) से जुड़े मामलों में अग्रिम जमानत पर रोक लगाती है। ऐसे में उक्त प्रावधानों को देखते हुए एंटीसिपेटरी बेल आवेदन पर विचार करना विधिसम्मत नहीं है। कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

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