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MP News: MLA संजय पाठक के केस में फैसला सुरक्षित, हाईकोर्ट जज को फोन लगाने का मामला, बिना शर्त फिर मांगी माफी

Wed, 15 Jul 2026 10:44 PM IST
जबलपुर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर Published by: जबलपुर ब्यूरो Updated Wed, 15 Jul 2026 10:44 PM IST
सार

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भाजपा विधायक संजय पाठक के खिलाफ आपराधिक अवमानना मामले में सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया। विधायक स्वयं अदालत में पेश हुए। उनके वकील ने जज को फोन गलती से लगने की दलील दी, जबकि हस्तक्षेपकर्ता ने इसे न्यायिक प्रक्रिया में गंभीर हस्तक्षेप बताते हुए कड़ा विरोध किया। 

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Verdict reserved in the case of BJP MLA Sanjay Pathak
मप्र हाईकोर्ट

विस्तार

मप्र हाईकोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया की अध्यक्षता वाली युगलपीठ में बुधवार को भाजपा विधायक संजय पाठक के खिलाफ विचाराधीन आपराधिक अवमानना मामले की सुनवाई हुई। पूर्व निर्देश के पालन में विधायक पाठक स्वयं अदालत में उपस्थित हुए। युगलपीठ ने सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रखने के निर्देश जारी किए।

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गौरतलब है कि विधायक संजय पाठक से संबंधित कंपनी के खिलाफ कथित अवैध उत्खनन के मामले की सुनवाई के दौरान संबंधित न्यायाधीश ने विधायक संजय पाठक द्वारा उनसे फोन पर संपर्क किए जाने का प्रयास किए जाने के कारण स्वयं को प्रकरण से अलग कर लिया था। एकलपीठ ने इस मामले को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने के निर्देश जारी किए थे। इसके अलावा कटनी निवासी आशुतोष मिश्रा की तरफ से भी न्यायालय की गरिमा को आहत करने के कारण विधायक संजय पाठक के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी।
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हाईकोर्ट ने न्यायिक कार्य में हस्तक्षेप और न्यायपालिका की गरिमा से जुड़े मामले पर संज्ञान लेते हुए उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई प्रारंभ करते हुए नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। विधायक की ओर से दायर हलफनामे में गलती स्वीकार करते हुए बिना शर्त माफी मांगी गई थी। सुनवाई के दौरान संजय पाठक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि संबंधित न्यायाधीश को फोन अनजाने में लग गया था। रिकॉर्ड में केवल मिस्ड काल और एक इंट्रोडक्शन संदेश का उल्लेख है। विधायक पहले ही बिना शर्त माफी मांग चुके हैं। ऐसे में इसे आपराधिक अवमानना का मामला नहीं माना जाना चाहिए।

हस्तक्षेपकर्ता आशुतोष दीक्षित की ओर से इसका कड़ा विरोध किया गया। उनका कहना था कि किसी विचाराधीन मामले में संबंधित न्यायाधीश से संपर्क का प्रयास न्यायिक प्रक्रिया में सीधा हस्तक्षेप है। केवल माफी मांग लेने से अपराध समाप्त नहीं हो जाता। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि विधायक के पास संबंधित हाईकोर्ट जज का मोबाइल नंबर कैसे और क्यों था। यदि मामला न्यायालय में लंबित था तो गलती से फोन लगने की दलील स्वीकार नहीं की जा सकती। दोनों पक्षों की दलीलें पूरी होने के बाद न्यायालय ने मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया।

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