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Sheopur News: अकेलेपन से जूझ रहे दो दिलों ने थामा एक-दूसरे का हाथ, शुरू की नई जिंदगी; लिए सात फेरे

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, श्योपुर Published by: Sabahat Husain Updated Thu, 18 Jun 2026 06:40 PM IST
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सार

श्योपुर के 60 वर्षीय घनश्याम मीणा और बारां की 60 वर्षीय गौरा बाई मीणा ने अकेलेपन को पीछे छोड़ विवाह कर नई जिंदगी शुरू की। रामगढ़ माता मंदिर में हुई मुलाकात प्यार में बदली और दोनों ने कोर्ट मैरिज के बाद सात फेरे लिए।

Sheopur News: Two hearts battling loneliness joined hands embarked on a new life and tied the knot
बुजुर्ग दंपती - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

एक बुजुर्ग की जिंदगी में उस समय नई रोशनी आई, जब वर्षों की तन्हाई के बाद उन्हें ऐसा साथी मिला जिसने उनके जीवन को फिर से खुशियों से भर दिया। पत्नी को खोने के बाद अकेलेपन से जूझ रहे श्योपुर जिले के 60 वर्षीय घनश्याम मीणा ने राजस्थान के बारां जिले की रहने वाली 60 वर्षीय गौरा बाई मीणा के साथ हिंदू रीति-रिवाजों से विवाह कर नई जिंदगी की शुरुआत की है। दोनों ने कोर्ट मैरिज करने के बाद सात फेरे भी लिए।

दरअसल, श्योपुर के छोटा खेड़ा गांव निवासी घनश्याम मीणा और बारां जिले के बोरदा गांव निवासी गौरा बाई मीणा की मुलाकात राजस्थान के प्रसिद्ध रामगढ़ माता मंदिर में हुई थी। बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ और धीरे-धीरे दोनों ने एक-दूसरे का सहारा बनने का फैसला कर लिया। यह सिर्फ एक शादी की कहानी नहीं, बल्कि बुढ़ापे में सम्मान, अपनापन और जीवन को नए सिरे से जीने की उम्मीद की कहानी है।

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गौरा बाई मीणा के जीवन में चार वर्ष पहले उस समय दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था, जब उनके पति रामपाल मीणा का निधन हो गया। पति के जाने के बाद उनके जीवन का सबसे कठिन दौर शुरू हुआ। गौरा बाई का कहना है कि जिन लोगों को उन्होंने अपना परिवार समझा, उन्हीं के बीच उन्हें सम्मान और अपनापन नहीं मिला। बहू की प्रताड़ना, रिश्तेदारों के ताने और आए दिन होने वाले विवादों ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया। एक समय ऐसा भी आया जब उनकी पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं बचा।

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वहीं, श्योपुर जिले के छोटा खेड़ा निवासी घनश्याम मीणा भी पत्नी के निधन के बाद अकेलेपन से गुजर रहे थे। परिवार होने के बावजूद उन्हें जीवन में ऐसे साथी की कमी महसूस होती थी, जिससे वे अपने मन की बात साझा कर सकें। समय के साथ उनका अकेलापन और गहराता जा रहा था।

करीब 15-20 दिन पहले रामगढ़ माता मंदिर में दर्शन के बाद एक चाय की दुकान पर दोनों की मुलाकात हुई। यह एक साधारण मुलाकात थी, लेकिन दोनों के जीवन के संघर्ष लगभग एक जैसे थे। बातचीत के दौरान गौरा बाई ने अपनी पीड़ा साझा की, जबकि घनश्याम ने अपने अकेलेपन की कहानी सुनाई। धीरे-धीरे दोनों को एहसास हुआ कि वे सिर्फ एक-दूसरे की बातें ही नहीं सुन रहे, बल्कि एक-दूसरे के दर्द को भी समझ रहे हैं। यहीं से एक नए रिश्ते और नए सफर की शुरुआत हुई।

अक्सर समाज यह मान लेता है कि प्यार, अपनापन और विवाह सिर्फ युवाओं के हिस्से की बातें हैं। लेकिन घनश्याम और गौरा बाई की कहानी इस सोच को बदलने का संदेश देती है। इंसान को सहारे की जरूरत किसी भी उम्र में पड़ सकती है। उम्र भले ही 60 साल हो, लेकिन सम्मान पाने की इच्छा कभी बूढ़ी नहीं होती, अपनापन पाने की उम्मीद कभी खत्म नहीं होती और किसी का हाथ थामकर मुस्कुराने का सपना भी कभी नहीं मरता। घनश्याम और गौरा बाई की यह प्रेम कहानी उन हजारों लोगों के लिए प्रेरणा है, जो तन्हाई में जीवन बिता रहे हैं। यह कहानी बताती है कि जिंदगी जब तक है, उम्मीद भी तब तक है।

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