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विश्व साइकिल दिवस आज: जब साइकिल पर लगता था टैक्स और लाइसेंस, जानिए इंदौर की रोचक साइकिल कहानी; कैसे बदली पहचान

Kamlesh Sen कमलेश सेन
Updated Wed, 03 Jun 2026 06:31 AM IST
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सार

इंदौर में 1930 के दशक से साइकिल लोकप्रिय परिवहन साधन रही है। कभी 10 रुपये में मिलने वाली साइकिल पर लाइसेंस और कर लगता था। आज साइकिल फिटनेस और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक बन चुकी है, जिसकी कीमतें लाखों तक पहुंच गई हैं।

World Bicycle Day Today: Transformed from a Mode of Transport into a Tool for Health Discover Its Key Features
साइकिल दिवस - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

साइकिल का अविष्कार भले भी वर्ष 1817 के लगभग हुआ था पर भारत में साइकिल का आगमन वर्ष 1890 से 1910 के दौरान मुंबई में हुआ था। आरंभ में साइकिल विदेशों से आयात की जाती थी। साइकिल एक आश्चर्यजनक परिवहन का साधन था, जिसे लोग बड़े आश्चर्य से देखा करते थे। 1942 के करीब से देश में ही साइकिल का निर्माण होने लगा, फिर धीरे-धीरे कई कंपनियां साइकिल निर्माण करने लगीं और देश में सस्ते-सुगम यातायात के साधन के रूप में इसने अपनी पहचान कायम कर ली। आज यह परिवहन के साथ ही सेहत का साधन बन गई है। 


1930 में महारानी रोड बना साइकिल का बाजार
इंदौर में 1930 के करीब महारानी रोड पर साइकिल की दुकानें खुलना आरंभ हुईं और धीरे-धीरे यह साइकिल बिक्री का प्रमुख केंद्र बन गया। 1950 से 60 के मध्य इंदौर में 10 रुपये में साइकिल मिल जाया करती थी, वह भी किस्तों में।  साइकिल की बिक्री पर विशेष छूट दुकानदारों द्वारा दी जाती थी।  
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लाइसेंस के साथ लगता था सालाना कर
दहेज या उपहार में साइकिल देने का प्रचलन 1950 के दशक में शुरू हुआ। क्लर्क कॉलोनी निवासी 96 वर्षीय अन्नाजी बताते हैं कि साइकिल के बारे में सुना तो बड़ा आश्चर्य हुआ। मैं मेरे पिताजी के साथ पहली बार साइकिल देखने गया था। बड़े ही कौतुहल के साथ साइकिल को हमने निहारा था। साइकिल चलाने का लाइसेंस लगता था और साइकिल पर वार्षिक कर भी वसूला जाता था। घरेलू और व्यावसायिक उपयोग की दरें अलग-अलग थीं।  
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1958 में चुनावी मुद्दा बना था कर हटाना
1958 के स्थानीय नगर निगम के चुनाव में साइकिल पर लगने वाले कर की समाप्ति का वादा विपक्षी पार्टी द्वारा किया गया और इसी मुद्दे पर वह चुनाव में विजयी हुई। 1957-58 में नगर में साइकिल कर से निगम को 51,284 रुपये प्राप्त हुए थे। इंदौर की कपड़ा मिलों के अधिकतर मजदूरों के पास साइकिल थी। साइकिल पर लगने वाले कर और समय-समय निगम की साइकिल कर की जांच से वे परेशान थे।  

सस्ता और सुगम साधन
साइकिल एक परिवहन का सस्ता और सुगम साधन था। साइकिल दुकानों से प्रति घंटे की दर से किराए पर भी दी जाती थी। वर्तमान में एआईसीटीएल द्वारा आधुनिक साइकिलें केंद्रों पर किराये में उपलब्ध हैं। पहले दूध की आपूर्ति करने करने वाले सर्वाधिक साइकिल का उपयोग करते थे, पर समय के साथ अब वे भी बाइक से दूध देने आते हैं। इसकी मुख्य वजह शहर का विस्तार और दूरियों का बढ़ना प्रमुख है। साइकिल मुख्यत: पर्यावरण हितैषी वाहन है। जब देश में ईंधन संकट होता है तो साइकिल पर आने-जाने की बातें चर्चा बनी रहती हैं।

साइकिल का बदला स्वरूप 
समय से साथ साइकिल अब स्वास्थ्य और फिटनेस का प्रमुख साधन हो गई है। पुरातन साइकिल तो अब दुर्लभ हो गई हैं। उनकी जगह गियर और आधुनिक स्टाइल की साइकिल अब उपलब्ध हैं। साइकिल की दुकानों पर अब स्वदेशी ब्रांड के अलावा विदेशी ब्रांड की साइकिल भी उपलब्ध है। साइकिल की कीमतें भी पांच हजार से दो लाख तक पहुंच चुकी हैं। 

फुटपाथ पर साइकिल सुधारने वालों का दर्द 
अधिकतर साइकिल सुधारने की दुकानें फुटपाथ पर रहती थी, पर अब समय के साथ ये दुकानें भी आधुनिक हो गई हैं। फुटपाथ पर साइकिल रिपेयरिंग का पांच दशक से कार्य करने वाले जुगल किशोर का कहना है कि मैंने तो पेड़ के नीचे बैठकर कर साइकिल का कार्य किया पर अब बच्चों ने इसे समीप ही एक दुकान किराये से लेकर सु-सज्जित तरीके से शुरू किया है। इससे आर्थिक लाभ ही काफी अच्छा होने लगा। पंचर पकाने के भी आधुनिक तरीके आ गए हैं। कई दुकानदार सुबह जल्दी दुकान खोल देर रात्रि तक यह कार्य करते हैं। एक दुकानदार का कहना है कि साइकिल के पंचर के बजाय दो पहिया वाहनों के ज्यादा पंचर सुधारे जाते हैं।

इसलिए मनाया जाता है साइकिल दिवस
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2018 में 3 जून को विश्व साइकिल दिवस के रूप में मनाए जाने का प्रस्ताव पारित किया। इसे मनाने का मुख्य उद्देश्य साइकिल के प्रति लोगों में जागरूकता, स्वास्थ्य, पर्यावरण तथा साइकिल को एक टिकाऊ साधन के रूप में इसकी पहचान कायम रखना है।
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