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Navratri: बिहार के इस शक्तिपीठ में नहीं दी जाती बलि, कबूतर उड़ाने की अनोखी परंपरा, नेपाल-बंगाल तक है ख्याति
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुजफ्फरपुर
Published by: हिमांशु प्रियदर्शी
Updated Mon, 07 Oct 2024 06:43 PM IST
सार
Navratri: बिहार के इस शक्तिपीठ में नहीं दी जाती बलि, कबूतर उड़ाने की अनोखी परंपरा, नेपाल-बंगाल तक है ख्याति
Navratri: no sacrifice in Bhasmi Devi Shaktipeeth Muzaffarpur, tradition of flying pigeons, Nepal-Bengal
मुजफ्फरपुर का भस्मी देवी शक्तिपीठ एक ऐसा उप शक्तिपीठ है जिसकी ख्याति नेपाल और बंगाल तक फैली हुई है। यह मंदिर जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर की दूरी पर एनएच 27 के उत्तर दिशा में पानापुर में स्थित है, जो श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। यह माना जाता है कि जो भी श्रद्धालु यहां आते हैं, वे कभी खाली हाथ नहीं लौटते। खासकर नवरात्र के दौरान यहां भारी भीड़ उमड़ती है, लेकिन साल भर भी यहां भक्तों का आना-जाना लगा रहता है।
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माता भस्मी देवी
- फोटो : अमर उजाला
प्राकृतिक सुंदरता के बीच स्थित मंदिर
माता भस्मी देवी का यह प्राचीन मंदिर बूढ़ी गंडक नदी के किनारे पांच पीपल के पेड़ों के बीच स्थित है। मंदिर का इतिहास काफी पुराना है, और इसे पाल वंश काल का बताया जाता है। मंदिर का गर्भगृह और इसका स्थापत्य इसे ऐतिहासिक धरोहर के रूप में भी दर्शाता है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहां न केवल बिहार और झारखंड से बल्कि नेपाल, बंगाल, ओड़ीशा और असम जैसे राज्यों से भी श्रद्धालु आते हैं।
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मंदिर में बड़ी संख्या में पहुंचते हैं श्रद्धालु
- फोटो : अमर उजाला
बलि प्रथा नहीं, अहिंसक परंपरा
शक्तिपीठ होते हुए भी यहां बलि प्रथा नहीं है। वर्ष 1958 तक यहां बलि की प्रथा थी, लेकिन बाद में अयोध्या और अन्य जगहों से आए नागा साधुओं ने इस प्रथा को बंद करवाया। अब यहां मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु कबूतर उड़ाते हैं। नवरात्र के समय विशेषकर बड़ी संख्या में कबूतर उड़ाने की प्रथा निभाई जाती है। यह प्रथा बलि के स्थान पर अहिंसक बलि के रूप में जानी जाती है, जिससे मंदिर की पवित्रता और माता के प्रति श्रद्धा अहिंसक रूप में बनी रहती है।
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माता भस्मी देवी की पूजा करते श्रद्धालु
- फोटो : अमर उजाला
विशेष हवन कुंड का महत्व
मंदिर परिसर के बीचों-बीच एक विशाल हवन कुंड है जिसका इतिहास भी उतना ही पुराना है जितना मंदिर का। यह हवन कुंड पहले 30 फीट का था, जहां बलि दी जाती थी। अब इसे छोटा कर दिया गया है और यहां हवन के दौरान उत्पन्न भस्म का विशेष महत्व है। श्रद्धालु इस भस्म का लेप अपने शरीर पर लगाते हैं, जिससे वे अपने कष्टों, बीमारियों और चर्म रोगों से मुक्त हो जाते हैं। यह भी माना जाता है कि भस्मी देवी महिलाओं की सूनी गोद भरती हैं और बच्चों के मानसिक एवं शारीरिक विकास की बाधाओं को दूर करती हैं।
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भस्मी देवी धाम पानापुर
- फोटो : अमर उजाला
मंदिर के पुजारी का दावा
मंदिर के महंत और प्रधान पुजारी रविशंकर दुबे बताते हैं कि माता भस्मी देवी का मंदिर कभी भी भक्तों को निराश नहीं करता। जो भी सच्चे मन से यहां आता है, उसकी मुराद अवश्य पूरी होती है। मंदिर के पास से बहने वाली बूढ़ी गंडक नदी अब करीब एक किलोमीटर दूर बहती है। यह भी एक चमत्कार माना जाता है कि मंदिर परिसर में कभी बाढ़ का प्रभाव नहीं होता। इस कारण बाढ़ प्रभावित लोग भी यहां शरण लेते हैं और माता की कृपा प्राप्त करते हैं।
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