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Momos History: भूख और मजबूरी से ‘कंफर्ट फूड’ तक, जानें 600 साल पुरानी मोमोज की दिलचस्प कहानी

फीचर डेस्क, अमर उजाला Published by: Jyoti Mehra Updated Wed, 15 Apr 2026 01:22 PM IST
सार

How Momos Came To India: क्या आप जानते हैं कि जिस मोमोज को हम आज बड़े मजे के साथ खाते हैं, उसकी शुरुआत किसी स्वाद या शौक से नहीं, बल्कि मजबूरी से हुई थी? आइए जानते हैं कि मोमोज की शुरुआत कहां और कैसे हुई थी...

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Momos origin history where did momos originate know how momos came to India
कहां से आया मोमोज? - फोटो : Amar Ujala

Where Did Momos Originate: शाम ढलते ही जैसे ही बाजारों में रौनक बढ़ती है, गली-नुक्कड़ पर लगे मोमोज के ठेले लोगों को अपनी ओर खींचने लगते हैं। भाप से उठती मन ललचाने वाली खुशबू, तीखी लाल चटनी और दोस्तों के साथ मोमोज का स्वाद, आज के समय में ये शहरी जीवन का हिस्सा बन चुका है। खासकर दिल्ली और आसपास के इलाकों में तो मोमोज के लिए लोगों की दीवानगी साफ नजर आती है। 



आज बाजार में मोमोज के कई अलग-अलग प्रकार खाने को मिलते हैं, जिनका स्वाद इतना लाजवाब होता है कि लोग उसे बार-बार खाने पर मजबूर हो जाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस मोमोज को हम आज बड़े मजे के साथ खाते हैं, उसकी शुरुआत किसी स्वाद या शौक से नहीं, बल्कि मजबूरी से हुई थी? आइए जानते हैं कि मोमोज की शुरुआत कहां और कैसे हुई थी...

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ठंड से जंग और पेट भरने का आसान तरीका - फोटो : Amar Ujala

ठंड से जंग और पेट भरने का आसान तरीका
मोमोज की कहानी हमें करीब 600 साल पहले तिब्बत की बर्फीली वादियों में ले जाती है। वहां की कड़ाके की ठंड और कठिन जीवन परिस्थितियों में लोगों के पास खाने के सीमित साधन होते थे। खेती करना मुश्किल था, ऐसे में उन्हें ऐसा भोजन चाहिए था जो कम संसाधनों में तैयार हो जाए और शरीर को ऊर्जा भी दे सके।

इसी जरूरत से एक आसान तकनीक सामने आई, मैदे की पतली परत में मांस भरकर उसे भाप में पकाना। तिब्बती भाषा में इसे ‘मोग-मोग’ कहा जाता था। यह डिश जल्दी बन जाती थी, ज्यादा लोगों का पेट भरती थी और शरीर को गर्म रखने में भी मदद करती थी। धीरे-धीरे यह तिब्बती खानपान का अहम हिस्सा बन गई।
 

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नेपाल के रास्ते बदला स्वाद - फोटो : Adobe stock

नेपाल के रास्ते बदला स्वाद
समय के साथ मोमोज तिब्बत की सीमाओं से बाहर निकले। 1960 के दशक में काठमांडू के व्यापारी जब व्यापार के लिए तिब्बत जाते थे, तो इस डिश के स्वाद से प्रभावित हो गए। वे इसे अपने साथ नेपाल ले आए, जहां इसे ‘ममो’ नाम दिया गया।

नेपाल में स्थानीय मसालों के साथ इसमें नए स्वाद जुड़े और यह और भी लाजवाब बन गया। यहीं से मोमोज ने दक्षिण एशिया के अलग-अलग हिस्सों में अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी।
 

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भारत में कैसे बनी पहचान - फोटो : Adobe stock

भारत में कैसे बनी पहचान
भारत में मोमोज की असली एंट्री 1959 के बाद हुई, जब तिब्बती समुदाय के लोग यहां आकर बसे। धर्मशाला, दार्जिलिंग, सिक्किम और दिल्ली के मजनू का टीला जैसे इलाकों में उन्होंने अपने खानपान की परंपरा को जिंदा रखा।

शुरुआत में यह डिश केवल तिब्बती लोगों तक सीमित थी, लेकिन 90 के दशक के बाद यह धीरे-धीरे दिल्ली की गलियों में लोकप्रिय होने लगी। लोगों को इसका सॉफ्ट टेक्सचर और तीखी चटनी इतनी पसंद आई कि देखते ही देखते यह हर गली-मोहल्ले का फेवरेट स्ट्रीट फूड बन गया।
 

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आज का ‘कंफर्ट फूड’ - फोटो : instagram

आज का ‘कंफर्ट फूड’
आज मोमोज सिर्फ स्टीम्ड नहीं रह गए हैं। भारतीय स्वाद के अनुसार इसमें कई बदलाव किए गए हैं, तंदूरी मोमोज, फ्राइड मोमोज, पनीर और सोया मोमोज जैसी कई वैरायटी बाजार में मिलती हैं।

एक समय जो खाना ठंड और भूख से लड़ने का जरिया था, वही आज युवाओं का पसंदीदा ‘कंफर्ट फूड’ बन चुका है। यह सफर बताता है कि कैसे एक साधारण-सी डिश समय और जगह के साथ बदलकर हर दिल की पसंद बन सकती है।

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