Science News: दुनियाभर की नदियों पर खतरा मंडरा रहा है। वैज्ञानिकों ने एक नया अध्ययन किया है, जिसमें चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। इस अध्ययन के मुताबिक, ग्लोबल वार्मिंग की वजह से नदियों में धीरे-धीरे ऑक्सीजन कम हो रही है, जिससे मछलियों और अन्य जलीय जीवों के जीवन पर खतरा बढ़ता जा रहा है। शोधकर्ताओं ने दुनियाभर की 21,000 से अधिक नदियों में ऑक्सीजन के स्तर का पता लगाने अध्ययन किया है।
Science News: दुनिया की नदियों पर मंडरा रहा बड़ा खतरा, वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी
Science News: दुनियाभर की नदियों पर ग्लोबल वार्मिंग की वजह से बड़ा खतरा मंडरा रहा है। वैज्ञानिकों ने एक नया अध्ययन किया है, जिसमें चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। अध्ययन के मुताबिक, नदियों में ऑक्सीजन कम हो रही है।
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अध्ययन के मुताबिक, अगर ऑक्सीजन घटने की वर्तमान गति ऐसे ही चलती रही, तो सदी के अंत तक दुनिया की नदियों में औसतन चार प्रतिशत अतिरिक्त ऑक्सीजन कम हो जाएंगा और कुछ मामलों में यह करीब पांच फीसदी तक कम हो सकती है। अध्ययन के प्रमुख लेखक और नानजिंग स्थित चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज के पर्यावरण वैज्ञानिक ची गुआन के मुताबिक, यह वह स्तर है जहां ऑक्सीजन की कमी को डीऑक्सीजनेशन कहा जाता है, जो मछलियों और नदियों पर निर्भर लोगों के लिए गंभीर समस्या बन जाती है।
क्या है वैज्ञानिकों की चिंता?
वैज्ञानिकों ने चिंता जताई है कि नदियों में ऑक्सीजन इतनी कम हो सकती है कि मैक्सिको की खाड़ी, चेसापीक खाड़ी और लेक एरी की तरह डेड जोन बनने लगें। यह ऐसे इलाके होते हैं, जहां पर मछलियों के लिए सांस लेना कठिन होता है और वो मर जाती हैं। गुआन ने कहा कि डीऑक्सीजनेश एक बेहद धीमी प्रक्रिया है, लेकिन लंबे समय तक जारी रही, तो इसका नकारात्मक प्रभाव नदी पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ेगा। ऑक्सीजन का निम्न स्तर जैव विविधता में कमी, पानी की गुणवत्ता में गिरावट और मछलियों की मौत जैसी पारिस्थितिक समस्याएं उत्पन्न कर सकता है।
एरिजोना विश्वविद्यालय के भू-विज्ञानी कार्ल फ्लेसा का कहना है कि कुछ नदियों की स्थिति पहले से बहुत खराब है। अगर थोड़ा सा भी बदलाव होता है, तो भविष्य में उन्हें खतरनाक स्तर तक पहुंचा सकता है। हालांकि, इस अध्ययन में कार्ल फ्लेसा शामिल नहीं थे।
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भारत, पूर्वी अमेरिका और अमेजन सबसे ज्यादा प्रभावित
अध्ययन के मुताबिक, इस सदी की शुरुआत में भारत की गंगा नदी वैश्विक औसत की तुलना में 20 गुना तेजी से ऑक्सीजन खो रही थी। विश्लेषण में पाया गया कि अगर कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन मध्यम से उच्च स्तर तक बढ़ता रहा, तो सदी के अंत तक पूर्वी अमेरिका, आर्कटिक, भारत और दक्षिण अमेरिका के बड़े इलाकों की नदियां करीब 10 प्रतिशत ऑक्सीजन खो सकती हैं।
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नीदरलैंड्स के उट्रेख्ट विश्वविद्यालय के जल-विज्ञान प्रोफेसर मार्क बीयरकेंस ने बताया कि उनके और उनके सहयोगियों के बीते साल के अध्ययन में पाया कि दुनिया की नदियों में ऑक्सीजन तनाव हर दशक में 13 दिन बढ़ा है और 1980 के बाद से डेड जोन की घटनाएं करीब तीन दिन प्रति दशक बढ़ी हैं। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे पृथ्वी गर्म होगी, ये आंकड़े और तेजी से बढ़ेंगे।
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ची गुआन के अध्ययन में दुनिया की नदियों में ऑक्सीजन घटने की कई वजहे बताई गई हैं, जिनमें उर्वरकों और शहरी बहाव से होने वाला पोषक प्रदूषण, बांध निर्माण, जल प्रवाह और हवा से जुड़ी समस्याएं शामिल हैं। लेकिन अध्ययन के मुताबिक, करीब 63 प्रतिशत समस्या का कारण पानी का गर्म होना है।