चंडीगढ़ के हेरिटेज फर्नीचर की दुनिया भर में चर्चा होती है। लेकिन देश के लोगों को इसकी जानकारी बहुत कम है। दुनिया के कई देशों में चंडीगढ़ की विरासत नीलाम होती रही है। चंडीगढ़ प्रशासन का ढुलमुल रवैया और लोगों में जानकारी का अभाव भी इसके लिए जिम्मेदार है। ऐसे में अमर उजाला चंडीगढ़ के हेरिटेज फर्नीचर से जुड़ी जानकारी लेकर आया है, जो आपको पढ़नी चाहिए...
चंडीगढ़ के एक सोफे में क्या है खास, जो विदेश में 32 लाख में बिका, क्यों यहां के फर्नीचर की दुनिया दीवानी
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अमर उजाला ने हेरिटेज फर्नीचर से संबंधित सभी सवाल हेरिटेज प्रोटेक्शन सेल के सदस्य अजय जग्गा और प्रशासक के सलाहकार और हेरिटेज प्रोटेक्शन सेल के चेयरमैन मनोज परिदा से पूछे। अमर उजाला के इस डिजिटल विशेष में आप जानेंगे कि हेरिटेज फर्नीचर क्या है, इनकी इतनी मांग क्यों है, शहर में कहां-कहां है, विदेश में महंगे क्यों बिकते हैं, चंडीगढ़ से विदेश ये पहुंच कैसे रहे हैं, चंडीगढ़ के अधिकारी इनको बचाने के लिए क्या कर रहे हैं।
यह हैं हेरिटेज फर्नीचर
चंडीगढ़ देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के सपनों का शहर है। जवाहरलाल नेहरू ने स्विस-फ्रांसीसी आर्किटेक्ट ली कार्बूजिए को चंडीगढ़ के निर्माण की जिम्मेदारी सौंपी थी। उनके चचेरे भाई पियरे जेनरे और उन्होंने मिलकर चंडीगढ़ के लिए हेरिटेज फर्नीचर डिजाइन किया। उन्होंने सिर्फ फर्नीचर ही नहीं, बल्कि मैनहोल कवर, फुट लैंप्स, कंक्रीट लाइट फिक्सचर (जो सुखना लेक पर लगे हैं) और कुछ लोहे के पल्ले भी डिजाइन किए। यह सभी काफी पुराने हैं और काफी अलग है। यह चंडीगढ़ की विरासत है।
इन हेरिटेज आइटम्स की इतनी मांग क्यों है
ली कार्बूजिए और पियरे जेनरे के काम को पसंद करने वालों की संख्या लाखों-करोड़ों में हैं। उनके चाहवान कीमत की परवाह किये बिना, उनके द्वारा डिजाइन किये गए सामानों को खरीदते हैं। ली कार्बूजिए और पियरे जेनरे ने काफी साल रहकर चंडीगढ़ में काम किया। इसलिए उनके डिजाइन किये गए कई सामान चंडीगढ़ में बिखरे पड़े हैं। इन फर्नीचरों की मांग कितनी है, इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि वर्ष 2020 में चंडीगढ़ का एक सोफा करीब 32 लाख रुपये में बिका था।
चंडीगढ़ में ये हेरिटेज फर्नीचर कहां-कहां मौजूद हैं
पियरे जेनरे ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट, विधानसभा, सचिवालय, पंजाब विश्वविद्यालय, शैक्षणिक संस्थान और दूसरी प्रशासनिक बिल्डिंग के लिए फर्नीचर डिजाइन किए थे। पंजाब यूनिवर्सिटी में यह फर्नीचर सबसे बड़ी मात्रा में उपलब्ध है। अभी भी इस्तेमाल हो रहा है। हालांकि प्रशासन के पास ऐसी कोई निश्चित संख्या नहीं है।