जलियांवाला बाग हत्याकांड के भले ही 102 साल बीत चुके हैं लेकिन ब्रिटेन की सरकार ने इस अमानवीय घटना पर आज तक माफी नहीं मांगी है। हालांकि ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री टेरीजा मे इस घटना पर अफसोस जरूर जता चुकी हैं। उन्होंने कहा था कि 'जो भी हुआ था और उससे लोगों को जो पीड़ा हुई उसका हमें बेहद अफसोस है।' लेकिन इस घटना पर ब्रिटेन का माफी न मांगना और भी शर्मनाक है। ब्रिटिश बिशप ने जलियांवाला बाग में दड़वत होकर कहा था कि मैं इस घटना से बेहद शर्मिंदा हूं।
जलियांवाला बाग : जब दंडवत होकर ब्रिटिश बिशप ने कही बड़ी बात...मगर शर्मिंदा ब्रिटेन ने आज तक नहीं मांगी माफी
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जब लंदन के मेयर की आंखे हुईं नम
जलियांवाला बाग की दीवारों पर गोलियों के निशान देखकर लंदन के मेयर सदीक खान की आंखें नम हो गईं थीं। उन्होंने 13 अप्रैल 1919 की घटना पर गहरा दुख व्यक्त किया था। यहां पर जो त्रासदी हुई उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। ब्रिटिश सरकार को जलियांवाला बाग के शहीदों से माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने उपरोक्त बातें जलियांवाला बाग विजिटर बुक में भी लिखी थी। वह 2017 में अमृतसर आए थे।
डेविड कैमरन ने घटना को कहा था शर्मनाक
साल 2013 में ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड कैमरन जलियांवाला बाग आए थे। दीवारों पर गोलियों के निशान और शहीदी कुआं भी देखा था। उन्होंने जलियांवाला बाग के विजिटर बुक में लिखा था ब्रिटेन के इतिहास में यह बेहद शर्मनाक घटना है। इस त्रासदी को हमें कभी नहीं भूलना चाहिए। हमें सुनिश्चित करना चाहिए कि इंग्लैंड हमेशा शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के पक्ष में खड़ा रहे।
जब दंडवत होकर बिशप बोले- बेहद शर्मिंदगी महसूस होती है
ब्रिटिश ईसाई धर्मगुरु आर्कबिशप ऑफ कैंटरबरी जस्टिन पोर्टल वेल्बी ने जलियांवाला बाग घटना पर दुख जताया था। उन्होंने यहां विजिटर बुक में लिखा था कि उन्हें इस घटना पर बेहद शर्मिंदगी महसूस होती है। आर्कबिशप ने प्रार्थना कर परमात्मा से इस घृणित कार्य के लिए माफी मांगी। उन्होंने जलियांवाला बाग में स्थित शहीदी लाट पर दंडवत होकर शहीदों को नमन किया और कहा कि शहीदों की यह यादगार सदा जीवित रहेगी। यहां होने वाले अपराध के लिए उन्हें खेद है। बता दें कि भारत में ब्रिटेन के उच्चायुक्त रह चुके डोमिनिक एस्क्विथ भी घटना को शर्मनाक कृत्य बता चुके हैं।
क्या है जलियांवाला बाग हत्याकांड
13 अप्रैल 1919 को बैसाखी का दिन था। स्वर्ण मंदिर के नजदीक स्थित जलियांवाला बाग में हजारों भारतीय इकट्ठा थे। सभी लोग शांति से सभा कर रहे थे। इस सभा का आयोजन पंजाब के दो लोकप्रिय नेताओं को गिरफ्तारी और रोलेट एक्ट के विरोध में किया गया था। घटना से दो दिन पहले पंजाब में कुछ ऐसा हुआ था जिससे कि ब्रिटिश सरकार काफी गुस्से में थी। सभा में नेता भाषण दे रहे थे। तभी जनरल डायर ने बाग से बाहर निकलने वाले सभी रास्ते बंद कर दिए।