विश्व धरोहर में शामिल ऐतिहासिक कालका-शिमला रेलवे मार्ग सोमवार को 117 साल हो गया है। नौ नवंबर, 1903 को कालका- शिमला रेल मार्ग की शुरूआत हुई थी। अपने 117 वर्षों के सफर में यह रेल मार्ग कई इतिहास संजोए हुए है। उक्त रेल मार्ग उत्तर रेलवे के अंबाला डिवीजन के अंतर्गत आता है। देश-विदेश के सैलानी शिमला के लिए इसी रेल मार्ग से टॉय ट्रेन में सफर का लुत्फ उठाते हैं।
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वर्ष-1896 में इस रेल मार्ग को बनाने का काम दिल्ली-अंबाला कंपनी को सौंपा गया था। रेल मार्ग कालका स्टेशन (656 मीटर) से शिमला (2,076 मीटर) तक जाता है। 96 किलोमीटर लंबे इस रेल मार्ग पर 18 स्टेशन हैं। कालका-शिमला रेलमार्ग को केएसआर के नाम से भी जाना जाता है। 1921 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी इस मार्ग से यात्रा की थी।
103 सुरंगें होती हैं सैलानियों के आकर्षण का केंद्र
कालका-शिमला रेलवे लाइन पर 103 सुरंगें सफर को और भी रोमांचक बनाती हैं। बड़ोग रेलवे स्टेशन पर 33 नंबर बड़ोग सुरंग सबसे लंबी है, जिसकी लंबाई 1143.61 मीटर है। यह सुरंग क्रॉस करने में टॉय ट्रेन अढ़ाई मिनट का समय लेती है और रेल मार्ग पर 869 छोटे-बड़े पुल हैं, इससे यह सफर और भी रोमांचक हो जाता है। पूरे रेल मार्ग पर 919 घुमाव आते हैं। तीखे मोड़ों पर ट्रेन 48 डिग्री के कोण पर घूमती है। कालका-शिमला रेलमार्ग को नैरोगेज लाइन कहते हैं। इसमें पटरी की चौड़ाई दो फीट छह इंच है।
जुलाई-2008 में मिला था विश्व धरोहर का दर्जा
कालका-शिमला रेलवे लाइन के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए यूनेस्को ने जुलाई-2008 में इसे विश्व धरोहर में शामिल किया था। इसके अलावा कनोह रेलवे स्टेशन पर ऐतिहासिक आर्च गैलरी पुल 1898 में बना था। शिमला जाते हुए यह पुल 64.76 किलोमीटर पर मौजूद है। आर्च शैली में निर्मित चार मंजिला पुल में 34 मेहराबें हैं। यह इंडियन रेलवे में आर्च गैलरी पुल सबसे बेहतरीन पुलों में शामिल है।
बाबा भलकू के सहयोग से पूरी हुई थी सुरंग
कालका से 41 किलोमीटर दूर बड़ोग रेलवे स्टेशन के पास ही बड़ोग सुरंग है, जिसे सुरंग नंबर-33 भी कहते हैं, यह 1143.61 मीटर लंबी सीधी सुरंग है। इस सुरंग को बनाते हुए जब दोनों सिरे नहीं मिले थे तो ब्रिटिश इंजीनियर कर्नल बड़ोग ने एक रुपया जुर्माना लगने के कारण आत्महत्या कर ली थी। इसके बाद में बाबा भलकू के सहयोग से यह सुरंग पूरी हुई थी।
