कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली बॉर्डर पर 15 दिन से चल रहे किसानों के आंदोलन का रुख अब लेफ्ट की तरफ झुकने लगा है। गुरुवार को राष्ट्रीय मानव अधिकार दिवस के मौके पर भारतीय किसान यूनियन एकता उगराहां ने दिल्ली के पास बाबा बंदा सिंह बहादुर नगर में एक समारोह का आयोजन किया गया। इस समारोह में लेफ्ट पार्टियों के गिरफ्तार लोगों की फोटो लगाकर केंद्र सरकार से रिहाई की मांग की गई।
किसान आंदोलन को लेफ्ट का रंग देने की कोशिश, दिखीं ऐसी तस्वीरें...लोगों ने खड़े किए सवाल
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किसान यूनियन ने समारोह की तस्वीरों को अपने फेसबुक पेज पर शेयर किया है। अब यूनियन को आलोचना का भी सामना करना पड़ रहा है। ज्यादातर लोगों का कहना है कि यह धरना सिर्फ कृषि कानूनों को रद्द करवाने के लिए है। ऐसे में अब कामरेड बीच में कहा से आ गए। जो भी कामरेड जेल में बंद हैं, उनका आंदोलन से क्या लेना देना है। क्या मानवाधिकार सिर्फ कामरेडों के लिए है, पंजाब के कई युवा सजा पूरी होने के बावजूद जेलों में बंद हैं, क्या उनके लिए मानव अधिकार नहीं हैं। किसान यूनियन की इस पोस्ट पर लोग अपनी प्रतिक्रियाएं भी दे रहे हैं।
गौरतलब है कि गुरुवार को राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के मौके भारतीय किसान यूनियन एकता उगराहां की तरफ से टिकरी बॉर्डर पर समारोह का आयोजन किया गया। हालांकि टिकरी बार्डर से लेकर रोहतक सड़क तक यूनियन की तरफ से सात स्टेज लगाए गए थे। गुरुवार को बाबा बंदा सिंह बहादुर नगर स्टेज पर राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस पर विशेष आयोजन रखा गया था। इस स्टेज के ठीक पीछे लेफ्ट से संबंधित उन लोगों की फोटो लगाई गई, जिन्हें विभिन्न मामलों में गिरफ्तार किया जा चुका है।
ऐसी रहीं लोगों की प्रतिक्रियाएं
अमेरिका से जोबन खहरा ने किसान यूनियन के फेसबुक पेज पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि कानून को रद्द करवाने के बहाने कामरेडों ने सरकार को मांग पत्र दिया है कि इन कामरेड को जेलों से रिहा किया जाए। इसके साथ उन्होंने चार सवाल भी रखे हैं, जिनके जवाब भी खुद दिए हैं। क्या कामरेड पंजाब के हैं, इसका जवाब है नहीं, ये अन्य प्रदेशों से हैं। सवाल अन्य मुद्दों पर गिरफ्तार कामरेडों से पंजाब को क्या लेना देना है, इसका जवाब है कि कुछ नहीं। अमृतसर निवासी रजनीश कौर कहती हैं कि अर्बन नक्सल को सपोर्ट नहीं किया जाए, सिर्फ किसानों को सपोर्ट करो। लुधियाना निवासी अमनिंदर सिंह का कहना है कि बंदी सिखों की रिहाई पर कुछ नहीं बोलते। अब किसान आंदोलन की आड़ में अपना मतलब निकालना शुरू कर दिया।
संदीप सिंह ने अपना प्रतिक्रिया देते हुए लिखा है कि पंजाब ने अपने व देश के अन्य प्रदेशों के किसानों के लिए दिल्ली को घेरा हुआ है। ओडिशा के कामरेड को छुड़ाने के लिए नहीं। अगर आप जेलों में बंद कामरेड को छुड़ाने के लिए सिखों का इस्तेमाल कर रहे हो तो सिख जत्थेबंदियों की रिहाई के नाम पर तकलीफ क्यों होती है। कपूरथला से गुरबिंदर सिंह ने लिखा है कि क्या सिख मनुष्य नहीं हैं या फिर कामरेड के लिए मानव अधिकार होते हैं। अमृतसर निवासी अमृतपाल सिंह ने अपनी भड़ास निकालते हुए लिखा है कि पंजाब के सैकड़ों युवा सजा पूरी होने के बाद जेल में बंद हैं। कामरेडों को यहां मानव अधिकारी की बात याद नहीं आती। हमें बताओ कि जेल में बंद कामरेड कौन से किसान हैं।