रामलीलाओं को लेकर तमाम मिथक सामने आते रहे हैं। ऐसा ही एक गांव है जहां जब हनुमान जी की एंट्री होती है तो रामलीला का समापन कर दिया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि, उत्तराखंड के चमोली जिले में चीन (तिब्बत) सीमा क्षेत्र में स्थित द्रोणागिरी गांव के ग्रामीण आज भी रामभक्त हनुमान से नाराज हैं। गांव में बजरंग बली की पूजा नहीं होती है।
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- फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
रामलीला का मंचन होने पर लीला में जब हनुमान जी की एंट्री होती है तो रामलीला बंद हो जाती है। मान्यता है कि त्रेता युग में जब लक्ष्मण मूर्छित हुए थे तो हनुमान संजीवनी बूटी लेने द्रोणागिरी गांव आए थे और गांव के पास द्रोणागिरी पर्वत का एक हिस्सा उखाड़ कर ले गए थे। गांव के लोग मानते हैं कि हनुमान उस समय उनके द्रोणागिरी पर्वत देवता की दाहिनी भुजा उखाड़ कर ले गए थे।
समुद्रतल से करीब 12 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित द्रोणागिरी गांव में करीब सौ परिवार निवास करते हैं। शीतकाल में यह गांव बर्फ से ढक जाता है। तब यहां के ग्रामीण छह माह तक जिले के निचले क्षेत्रों में प्रवास करते हैं। ग्रीष्मकाल के छह माह गांव में खूब चहल-पहल रहती है। ग्रामीण ऊन के साथ ही सब्जी, दाल और आलू का भी उत्पादन करते हैं। इस गांव में राम भक्त हनुमान की कभी पूजा नहीं होती है।
ग्रामीण गांव के पास स्थित द्रोणागिरी पर्वत को ‘पर्वत देवता’ के रुप में पूजते हैं। कहा जाता है कि त्रेता युग में जब राम-रावण युद्ध के दौरान लक्ष्मण मूर्छित हो गए थे तो सुशैन वैद्य के कहने पर रामभक्त हनुमान संजीवनी बूटी लेने के लिए द्रोणागिरी गांव पहुंचे थे। तब संजीवनी बूटी की पहचान नहीं होने से वे द्रोणागिरी पर्वत के एक बड़े हिस्से को ही उठाकर ले गए थे।
तब से ग्रामीण बजरंग बली हनुमान से नाराज हैं। ग्रामीण उदय सिंह का कहना है कि बजरंग बली हनुमान तब द्रोणागिरी पर्वत देवता की दाहिनी भुजा को उखाड़ कर ले गए थे, इसलिए ग्रामीण आज भी हनुमान जी से नाराज है। गांव में हनुमान की पूजा नहीं होती है।