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World Cancer Day: कैंसर को जड़ से खत्म कर देगा यह पौधा, वैज्ञानिकों ने बताया कारगर

Mon, 05 Feb 2018 06:30 AM IST
न्यूज डेस्क/अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क/अमर उजाला, देहरादून Updated Mon, 05 Feb 2018 06:30 AM IST
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World Cancer Day‬‬ 2018 scientist search cancer saving plant
Lycium ruthenicum plant - फोटो : amar ujala
विश्व कैंसर दिवस पर हम आपको बता रहे हैं एक ऐसे पौधे के बारे में जो इसे जड़ से खत्म कर देगा। वैज्ञानिकों ने भी इसके पूरी तरह से कारगर बताया है।



 
World Cancer Day‬‬ 2018 scientist search cancer saving plant
cancer

लद्दाख की नुब्रा घाटी भारतीय हिमालयी क्षेत्र में इकलौता ऐसा स्थान है जहां कैंसर के फैलाव को रोकने वाली वनस्पति खीचर (लाइसियम रूथेनिसियम) पैदा होती है। बॉटेनिकल सर्वे आफ इंडिया ने इस वनस्पति की पहचान करके संरक्षण का मशविरा दिया है। साथ ही इसके गायब हो जाने की आशंका व्यक्त की है। विज्ञानियों का कहना है कि गढ़वाल और कुमाऊं हिमालयी क्षेत्र में खीचर की खेती हो सकती है। खीचर कैंसर के अलावा गुर्दा, लीवर, नपुंसकता, बांझपन आदि रोगों के इलाज में बहुत कारगर है।

 

World Cancer Day‬‬ 2018 scientist search cancer saving plant
Lycium ruthenicum plant

बॉटेनिकल सर्वे आफ इंडिया के विज्ञानियों का कहना है कि लाइसियम रूथेनिसियम के क्षेत्रीय लोग विभिन्न नामों से पुकारते हैं। इसे खीचर, खितसर, कितसरमा, ब्लैक गोजी भी कहा जाता है। वैसे यह पाकिस्तान, कजाकिस्तान, मंगोलिया, चीन, दक्षिणी-पूर्बी रूस, ताजिकस्तान, उजबेकिस्तान आदि देशों में भी होती है, लेकिन भारतीय हिमालयी क्षेत्र में यह नुब्रा घाटी में ही होती है। जलवायु परिवर्तन के कारण नष्ट होते वासस्थलों और इसका संरक्षण न किए जाने से यह दुर्लभ प्रजाति की श्रेणी में आ रही है।

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World Cancer Day‬‬ 2018 scientist search cancer saving plant
Lycium ruthenicum plant

विज्ञानियों का अंदेशा है कि संरक्षण न होने पर भारतीय हिमालय क्षेत्र में यह वनस्पति प्रजाति गायब हो सकती है। बीएसआई के निदेशक डॉ. परमजीत सिंह और नार्दन रीजनल सेंटर के कार्यालयाध्यक्ष डॉ. कुमार अम्बरीश ने लद्दाख की नुब्रा घाटी में इसकी पहचान की है।

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cancer

यह समुद्र तल से 2800 और 3200 मीटर ऊपर कोल्ड डिजर्ट में पाई गई। इस पर विज्ञानियों ने खीचर पर व्यापक शोध किए जाने की संस्तुति की है। इसके साथ ही यह मशविरा दिया है कि उच्च हिमालयी क्षेत्र में इसकी खेती की जाए। विभिन्न देशों की कंपनियां इससे औषधियां तैयार कर रही हैं। डॉ. अम्ब्रीश ने बताया कि इसके संरक्षण और प्रसार की जरूरत है। भारतीय हिमालयी क्षेत्र में यह नुब्रा घाटी में ही उपलब्ध है।

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