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दो रुपये रोज कमाने वाली कल्पना बनीं 700 करोड़ की मालकिन, कभी बेचती थीं गोबर के उपले

Sat, 11 Jan 2020 03:11 PM IST
Garima Garg एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: Garima Garg Updated Sat, 11 Jan 2020 03:11 PM IST
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kalpana saroj Chairperson and Padma Shri are honored with awards know her success story
कल्पना सरोज - फोटो : social media
खुद पर भरोसा हो तो सफलता पाने से कोई नहीं रोक सकता। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है कल्पना सरोज ने। गरीब परिवार में जन्मी कल्पना आज करोड़पति हैं। वे आज 700 करोड़ की कंपनी की मालकिन हैं। कल्पना करोड़ों का टर्नओवर देने वाली कंपनी की चेयरपर्सन और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित हैं। आखिर कैसे मिली उन्हें सफलता? पढ़ते हैं इनके बारे में सबकुछ...
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कल्पना सरोज
  • कल्पना सरोज  कमानी स्टील्स, केएस क्रिएशंस, कल्पना बिल्डर एंड डेवलपर्स, कल्पना एसोसिएट्स जैसी दर्जनों कंपनियों की मालकिन हैं।
  • समाजसेवा और उद्यमिता के लिए कल्पना को पद्मश्री और राजीव गांधी रत्न के अलावा देश-विदेश में दर्जनों पुरस्कार मिल चुके हैं। 
  • कभी दो रुपए रोज कमाने वाली कल्पना आज 700 करोड़ के साम्राज्य पर राज कर रही हैं। 
  • कल्पना का जन्म सूखे का शिकार रह चुके महाराष्ट्र के 'विदर्भ' में हुआ था। 
  • घर के हालात खराब थे और इसी के चलते कल्पना गोबर के उपले बनाकर बेचा करती थीं। 
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कल्पना सरोज
  • 12 साल की उम्र में ही कल्पना की शादी उससे 10 साल बड़े आदमी से कर दी गई। 
  • कल्पना विदर्भ से मुंबई की झोंपड़पट्टी में आ पहुंची। 
  • उनकी पढ़ाई रुक चुकी थी। ससुराल में घरेलू कामकाज में जरा सी चूक पर कल्पना रोज पिटतीं।
  • शरीर पर जख्म पड़ चुके थे और जीने की ताकत खत्म हो चुकी थी। एक रोज इस नर्क से भागकर कल्पना अपने घर जा पहुंचीं। 
  • ससुराल पहुंचने की सजा कल्पना के साथ-साथ उसके परिवार को मिली।
  • पंचायत ने परिवार का हुक्का-पानी बंद कर दिया। हुक्का-पानी के साथ कल्पना को जिंदगी के सभी रास्ते भी बंद नजर आने लगे।
  • कल्पना के पास जीने का कोई मकसद नहीं बचा था । उन्होंने तीन बोतल कीटनाशक पीकर जान देने की कोशिश की लेकिन रिश्ते की एक महिला ने उसे बचा लिया। 
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कल्पना सरोज
  • कल्पना बताती हैं कि जान देने की कोशिश उसकी जिंदगी में एक बड़ा मोड़ लेकर आई। 'मैंने सोचा कि मैं क्यों जान दे रही हूं, किसके लिए? क्यों न मैं अपने लिए जिऊं, कुछ बड़ा पाने की सोचूं, कम से कम कोशिश तो कर ही सकती हूं।' 
  • 16 साल की उम्र में कल्पना फिर मुंबई लौट आई। लेकिन इस बार एक नई जिंदगी शुरू करने के लिए। 
  • मुंबई पहुंची कल्पना को हुनर के नाम पर कपड़े सिलने आते थे और उसी के बल पर उन्होंने एक गारमेंट कंपनी में नौकरी कर ली। 
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कल्पना सरोज
  • यहां एक दिन में 2 रुपए की मजदूरी मिलती थी जो बेहद कम थी। कल्पना ने निजी तौर पर ब्लाउज सिलने का काम शरू किया।
  • एक ब्लाउज के 10 रुपए मिलते थे। इसी दौरान कल्पना की बीमार बहन की मौत हो गई। कल्पना बुरी तरह टूट गई। 
  • उन्होंने सोचा कि अगर रोज चार ब्लाउज सिले तो 40 रुपए मिलेंगे और घर की मदद भी होगी। उन्होंने ज्यादा मेहनत की, दिन में 16 घंटे काम करके कल्पना ने पैसे जोड़े और घरवालों की मदद की।
  • इसी दौरान कल्पना ने देखा कि सिलाई और बुटीक के काम में काफी स्कोप है और उन्होंने इसे एक बिजनेस के तौर पर समझने की कोशिश की। 
  • दलितों को मिलने वाला 50,000 का सरकारी लोन लेकर एक सिलाई मशीन और कुछ अन्य सामान खरीदा और एक बुटीक शॉप खोल ली। दिन रात की मेहनत से बुटीक शॉप चल निकली तो कल्पना अपने परिवार वालों को भी पैसे भेजने लगी।
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