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V Shantaram Birthday: यहां से शुरू हुआ बायोपिक का शानदार सिलसिला, ‘दो आंखें बारह हाथ’ ने जीता जहां

Wed, 18 Nov 2020 05:17 PM IST
anand anand अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई Published by: anand anand Updated Wed, 18 Nov 2020 05:17 PM IST
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10 best films producer director v Shantaram navrang dr kotnish ki amar kahani do aankhe barah haath
वी शांताराम की फिल्में - फोटो : अमर उजाला

शांताराम राजाराम वनकुद्रे यानी वी शांताराम यानी भारतीय सिनेमा के एक ऐसे फिल्मकार रहे जिन्होंने सिनेमा अपने साथ सिनेमा को भी आगे बढ़ाया। शांताराम वह फिल्मकार हैं जिन्होंने सिनेमा में अपना काम तब शुरू किया जब देश में मूक फिल्में बनती थीं। पहली बोलती फिल्म तो शांताराम ने नहीं बनाई लेकिन फिल्मों में तकनीक का इस्तेमाल सबसे पहले शुरू करने का श्रेय जरूर शांताराम को जाता है। उन्होंने अपने करियर में 90 से ज्यादा फिल्में बनाईं। 55 फिल्मों के वह निर्देशक रहे। भारत सरकार की तरफ से दिए जाने वाले सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से वी शांताराम को 1985 में सम्मानित किया गया। आज उनके जन्मदिन के मौके पर हम आपको उनकी कुछ बेहतरीन फिल्मों के बारे में बताते हैं।

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दुनिया ना माने - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

दुनिया ना माने (1937)
वी शांताराम ने अपने करियर की शुरुआत से ही चुनौतीपूर्ण फिल्में बनाना शुरू किया था। 'नेताजी पालकर', 'गोपाल कृष्ण', 'उदयकाल' जैसी साइलेंट फिल्में बनाने के बाद शांताराम ने 'अमृत मंथन', 'अमर ज्योति' जैसी बेहतरीन बोलती फिल्में भी बनाईं। उनकी हर फिल्म का मुद्दा अलग ही रहता था। शांताराम ने 1937 में फिल्म 'दुनिया न माने' बनाई। यह फिल्म हिंदी के साथ मराठी भाषा में भी 'कुंकु' शीर्षक से बनी है। इस फिल्म के साथ शांताराम ने भारतीय समाज में महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहार पर हिम्मत दिखाकर प्रकाश डाला। साथ ही उन्होंने बाल विवाह का भी अपनी फिल्म में चित्रण किया। यह फिल्म उन्होंने वेनिस इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में भी दिखाई। इस फिल्म को हर जगह दर्शकों और समीक्षकों दोनों से ही सराहना मिली।

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आदमी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

आदमी (1939)
शांताराम ने वर्ष 1939 में 'आदमी' नाम से एक ड्रामा फिल्म बनाई। मूल रूप से यह फिल्म मराठी में रही जिसका शीर्षक है 'माणूस'। यह फिल्म ए भास्करराव की लिखी कहानी 'द पुलिस कांस्टेबल' पर आधारित है। यह कहानी भी एक ईमानदार पुलिस वाले की है जो एक वेश्या से प्रेम करने लगता है। वह पुलिस वाला उस वैश्या को अपनाने के लिए तैयार है और वह उस वेश्या का काम भी छुड़वा देता है। प्रेम की वजह से वह पुलिस वाला भले ही उस वेश्या को अपना लेता है लेकिन समाज उसे कभी नहीं अपनाता। समाज की इस धारणा का ही शांताराम ने खूबसूरती से चित्रण किया है।

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डॉक्टर कोटनीस की अमर कहानी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

डॉक्टर कोटनीस की अमर कहानी (1946)
शांताराम ने अपनी पहली फिल्म 'नेताजी पालकर' वर्ष 1927 में महाराष्ट्र फिल्म कंपनी के बैनर तले बनाई जिसे मराठी की पहली बायोपिक माना जा सकता है। इसके बाद फिर उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर प्रभात फिल्म कंपनी शुरू की। इस प्रोडक्शन हाउस के अंतर्गत उन्होंने वर्ष 1929 से लेकर 1941 तक कई फिल्में बनाईं। फिर उन्होंने प्रभात फिल्म कंपनी को छोड़ दिया और अपनी एक अलग प्रोडक्शन कंपनी राजकमल कालामंदिर शुरू की। उनकी वर्ष 1946 में आई फिल्म 'डॉक्टर कोटनीस की अमर कहानी' इसी नई कंपनी के अंतर्गत बनी। शांताराम ने यह बायोपिक फिल्म हिंदी के अलावा अंग्रेजी भाषा में भी बनाई जिसका अंग्रेजी में शीर्षक 'द जर्नी ऑफ डॉक्टर कोटनीस' रखा। इस फिल्म में शांताराम ने मुख्य भूमिका भी निभाई। यह कहानी डॉक्टर कोटनीस की है जिसे द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान लड़ रहे सिपाहियों की मदद के लिए चीन भेज जाता है। कहानी में कई उतार-चढ़ाव आते हैं लेकिन अंत में डॉक्टर कोटनीस की मिर्गी का दौरा पड़ने से मौत हो जाती है। फिल्म में शांताराम की हीरोइन उनकी पत्नी जयश्री रहीं।

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अमर भूपाली - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

अमर भूपाली (1951)
वर्ष 1951 में आई 'अमर भूपाली' फिल्म का निर्देशन और निर्माण दोनों ही शांताराम ने किए हैं। यह भी एक बायोपिक जैसी ही है। मराठी भाषा की इस फिल्म कहानी एक साधारण गायों के चरवाहे की है जो बेहतरीन कविता भी करता है। कहानी 19वीं सदी की शुरुआत की है जब देश के पश्चिम में मराठा शासन था। वह चरवाहा अपनी कविताओं से लोगों के अंदर इतना जोश भर देता है कि वह साहस दिखाकर अंग्रेजी शासन से लोहा लेने के लिए तैयार रहते हैं। शांताराम ने जब इस फिल्म को कांन्स फिल्म फेस्टिवल में दिखाया यो इसे ग्रैंड प्राइज ऑफ द फेस्टिवल की श्रेणी में नामांकन मिला।

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