फिल्म ‘सितारे जमीन पर’ के प्रमोशन के दौरान आमिर खान अपनी एक पुरानी और अजीज फिल्म 'लाल सिंह चड्ढा' को याद करते दिखे। इस फिल्म से आमिर खान को बहुत उम्मीदें थीं। ऐसे में फिल्म का फ्लॉप होना आमिर खान को दुखी कर गया। वैसे इस फिल्म से पहले 'ठग्स ऑफ हिंदोस्तान' फिल्म भी फ्लॉप थी लेकिन इसके असफल होने का अंदाजा आमिर को रिलीज से पहले हो चुका था। आमिर हालिया बातचीत में बताते हैं कि ‘लाल सिंह चड्ढा’ के फ्लॉप होने पर काफी मुश्किल दौर गुजरे, ऐसे में परिवार और अपनों का साथ उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण था।
Aamir Khan: ‘लाल सिंह चड्ढा’ ने दिया ऐसा तमाचा, आमिर खान बोले- करियर की पहली बड़ी फ्लॉप; दर्द कभी नहीं भूला
हाल ही में अपनी आने वाली फिल्म 'सितारे जमीन पर' के प्रमोशन के दौरान आमिर खान ने अपनी पिछली फिल्म 'लाल सिंह चड्ढा' की असफलता पर खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि यह उनके लिए एक बड़ा झटका था क्योंकि इससे पहले उनकी ज्यादातर फिल्में हिट रही थीं।
ऐसा तमाचा, जो मैंने कभी पहले महसूस नहीं किया था
आमिर खान ने हालिया बातचीत में कहा, 'मेरी फैमिली हमेशा से मेरा सबसे बड़ा सहारा रही है। लेकिन 'लाल सिंह चड्ढा' की असफलता के बाद उनका साथ मेरे लिए और भी खास हो गया। यह फिल्म मेरे करियर की पहली बड़ी फ्लॉप थी, एक ऐसा तमाचा, जो मैंने कभी पहले महसूस नहीं किया था। क्योंकि मेरी ज्यादातर फिल्में हमेशा सफल रही हैं, इसलिए इसका असफल होना मेरे लिए बहुत भारी पड़ा।'
उन्होंने बताया कि लंबे समय के बाद कोई फिल्म इतनी कमाल नहीं कर पाई थी। हां, 'ठग्स ऑफ हिंदोस्तान' भी फ्लॉप थी, लेकिन उसे लेकर उन्हें पहले से पता था कि वह दर्शकों को पसंद नहीं आएगी। 'लेकिन 'लाल सिंह चड्ढा' मेरी पहली ऐसी फिल्म थी, जिसे मैं खुद दिल से पसंद करता था। बावजूद इसके, करीब 75% ऑडियंस उससे जुड़ नहीं पाई, इसलिए फिल्म सफल नहीं हो सकी।'
फिल्म के फ्लॉप होते ही आमिर डिप्रेशन में चले गए थे। लेकिन उस मुश्किल वक्त में उनके दोस्त और परिवार वाले उनके साथ खड़े थे। जुनैद, किरण, आजाद, अम्मी, निखत, आयरा और उनके पापा। उन्होंने उन्हें संभाला और याद दिलाया कि चाहे फिल्म सफल हो या ना हो, वे हमेशा उनके साथ हैं।
कोई भी जान-बूझकर खराब फिल्म करने की नहीं सोचता
आमिर ने 'ठग्स ऑफ हिंदोस्तान' को साइन करने के पीछे की वजह भी बताई। उन्होंने कहा, 'जब कोई फिल्म साइन करता है, तो दिल में हमेशा उम्मीद होती है कि ये हिट होगी। कोई भी जान-बूझकर खराब फिल्म करने की सोचता नहीं है। फिल्म बनाना बहुत मुश्किल काम है, हर कदम पर गलतियां हो सकती हैं, कभी-कभी ये गलतियां इतनी बड़ी हो जाती हैं कि पूरी फिल्म पर असर पड़ता है।'
'ठग्स ऑफ हिंदोस्तान' के वक्त उन्हें पहले से ही लग गया था कि यह फिल्म उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरेगी। मैं खुद उससे एक्साइटेड नहीं था। फिल्म को बेहतर बनाने के लिए पूरी टीम का एकमत होना जरूरी होता है, लेकिन उस वक्त निर्देशक और प्रोड्यूसर को लग रहा था कि फिल्म ठीक-ठाक बनी है। इसलिए कोई बदलाव या सुधार नहीं हो पाया।'
फिर भी आमिर को खुशी है कि 'लाल सिंह चड्ढा' में जो गलतियां हुईं, वे एक ही फिल्म में हो गईं। अगर ये गलतियां अलग-अलग फिल्मों में होतीं तो शायद उनका करियर मुश्किल दौर से गुजरता। उन्होंने कहा, 'इन गलतियों के बावजूद, मैंने कुछ ऐसा किया जो शायद कोई और नहीं कर पाता।'
मैंने अब तक जो भी डायरेक्ट किया वो इमरजेंसी थी
डायरेक्शन के बारे में आमिर ने कहा, 'मैंने जो अब तक डायरेक्ट किया है, वह मेरी जिंदगी की कोई पूरी फिल्म नहीं बल्कि एक इमरजेंसी थी। 'तारे जमीन पर' को तो मैं डायरेक्शन में काउंट ही नहीं करता क्योंकि उस वक्त मुझे मजबूरी में ही फिल्म संभालनी पड़ी थी।'
उन्होंने बताया कि फिलहाल वह खुद को असली एक्टिंग वाला ही मानते हैं। 'एक बार जब मैं पूरी तरह से डायरेक्टर बन जाऊंगा तो शायद एक्टिंग छोड़नी पड़ेगी। डायरेक्शन का मजा और जिम्मेदारी एक्टिंग से बिल्कुल अलग होती है। डायरेक्टर हर छोटी-बड़ी चीज का धुरंधर होता है।'
आमिर ने कहा कि वे फिलहाल डायरेक्शन को थोड़ा पीछे रख रहे हैं लेकिन दो-तीन साल में जरूर इसे आगे बढ़ाना चाहते हैं। 'क्योंकि एक बार जब डायरेक्शन का असली मजा चख लूंगा, तो एक्टिंग की तरफ वापसी मुश्किल होगी।'
सामाजिक मैसेज देने के दबाव में नहीं रहता
आमिर ने बताया कि उनकी फिल्मों का फोकस केवल सोशल टॉपिक्स पर नहीं होता। 'हां, मैंने कई ऐसी फिल्में बनाई हैं जिनमें समाज के बड़े मुद्दे उठाए गए हैं, क्योंकि मेरा नेचर ऐसा है कि मैं उन कहानियों की तरफ खिंचा चला जाता हूं जिनका समाज पर असर हो। लेकिन मैं कभी दबाव में नहीं रहता कि मेरी हर फिल्म में कोई बड़ा सामाजिक मैसेज होना चाहिए।'
आमिर खान का मानना है कि फिल्में चुनते वक्त वे खुद एक आम ऑडियंस की तरह सोचते हैं। 'जब मैं स्क्रिप्ट पढ़ता हूं या सुनता हूं, अगर कहानी में वो जादू होता है जो मुझे हंसाता, रुलाता या दिल छू जाता है, तो मैं उस फिल्म को करना चाहता हूं।'
आमिर का कहना है कि कहानी की क्वालिटी सबसे ज्यादा अहम होती है, सोशल मैसेज हो या नहीं। 'लोग सिनेमा हॉल में इसलिए आते हैं कि वे मनोरंजन का पूरा आनंद लें। मेरी सबसे बड़ी जिम्मेदारी एक एंटरटेनर के तौर पर यही है कि मैं लोगों को अच्छा समय दूं। सोशल मैसेज देना मेरा काम नहीं, वह प्रोफेसर का काम है जो कॉलेज में पढ़ाता है।' फिर भी अगर वे एंटरटेमेंट के साथ-साथ कुछ ऐसा भी दे सकें जो सोचने पर मजबूर कर दे तो उन्हें वह बहुत अच्छा लगता है। उनकी कुछ फिल्मों जैसे 'रंग दे बसंती', 'लगान', 'दंगल', 'तारे जमीन पर' में ये बात साफ दिखती है।
