मशहूर चित्रकार एम एफ हुसैन की फिल्म ‘मीनाक्षी’ से हिंदी सिनेमा में लॉन्च हुए अभिनेता कुणाल कपूर का एक तरह से डिज्नी प्लस हॉटस्टार की चर्चित वेब सीरीज ‘द एम्पायर’ में पुनर्जन्म हुआ है। वेब सीरीज में उनके निभाए बाबर के किरदार की हर तरफ तारीफ हो रही है और कुणाल कपूर को भी लगता है कि ओटीटी के आने से हिंदी फिल्म जगत में प्रतिभाओं का लोकतंत्रीकरण हो रहा है। कुणाल कहते हैं, ‘पहले निर्माता कोई भी प्रोजेक्ट बनाने से पहले ये सोचते थे कि अमुक सितारा बॉक्स ऑफिस पर पहले दिन कितनी बड़ी ओपनिंग लेकर आएगा। या कि इस कलाकार को लेने से मेरी फिल्म कितनी कमाई करेगी। ओटीटी ने ये परिदृश्य बदल दिया है। अब निर्माता ऐसे कलाकार तलाश रहे हैं जो किसी किरदार को ईमानदारी से और सच्चाई से परदे पर पेश कर सकें।’
EXCLUSIVE: ओटीटी की महिमा पर बोले कुणाल कपूर, ‘इसके आने से प्रतिभाओं का लोकतंत्रीकरण हुआ है’
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इतिहास की चर्चित घटनाओं के आसपास काल्पनिक कथाएं रचने में माहिर रहे लेखकों माइकल प्रेस्टन और डायना प्रेस्टन की जोड़ी के काल्पनिक नाम एलेक्स रदरफोर्ड के प्रयोग से लिखी छह किताबों की सीरीज की पहली किताब ‘एम्पायर ऑफ द मुगल: रेडर्स फ्रॉम द नॉर्थ’ पर बनी है वेब सीरीज ‘द एम्पायर’। इसके बारे में बात करते हुए कुणाल करते हैं, ‘हर अच्छी किताब को फिल्माते समय उस किताब पर अच्छी स्क्रिप्ट बन भी जाए ये जरूरी नहीं होता। लेकिन, यहां जो किताब है, उस पर इसकी लेखकों ने बहुत ही अच्छी पटकथा लिखी है। संयोग ही है कि इस सीरीज में काम करने का प्रस्ताव मिलने से कुछ ही महीने पहले मैंने ये किताब पढ़ी थी और तब सोचा था कि काश इस पर कोई सीरीज बने। और, देखिए बाद में, इसी किताब पर बनी सीरीज में मुझे काम करने का प्रस्ताव भी मिल गया।’
किसी शाही किरदार को परदे पर पेश करने के अपने नफे भी हैं और नुकसान भी। जरा सी ओवरएक्टिंग रंग में भंग डाल सकती है और जरा सा लचीलापन किरदार के आभामंडल को बिखेर सकता है। कुणाल भी मानते हैं कि वेब सीरीज ‘द एम्पायर’ में बाबर का किरदार करना आसान नहीं रहा। वह कहते हैं, ‘बाबर आम राजाओं या बादशाहों की तरह नहीं है। वह शारीरिक रूप से बहुत ही मजबूत इंसान है लेकिन भावनात्मक रूप से वह इतना ही कमजोर। और ऐसे मौकों पर उसे सहारे के लिए अपने आसपास की महिलाओं की जरूरत होती है। उसका खुद अपने ऊपर ही यकीन नहीं है। उसे कभी लगता है कि मैं किस्मत से बादशाह बन गया तो फिर कभी उसे ये भी लगता है कि ये मेरी काबिलियत है। तो ऐसे मतिभ्रम के शिकार बादशाह का किरदार करते समय मुझे काफी सावधानियां बरतनी होती थीं। ये भी ध्यान रखना होता था कि जो रुआब राजा दरबार में दिखाएगा, उसके साथ वह अपने घरवालों के साथ बात तो कतई नहीं करेगा।’
तो इतिहास के इस दौर में बाबर का किरदार करने में कोई झिझक नहीं हुई? इस सवाल पर कुणाल कपूर वेब सीरीज ‘द एम्पायर’ का नजरिया साफ करते हैं, ‘दर्शकों को ये समझना जरूरी है कि ये कोई ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं है। ये एक बायोपिक भी नहीं है। ये एक ऐतिहासिक काल्पनिक कथा है। इसे देखा भी इसी नजरिये से जाना चाहिए। एक कलाकार का काम है कि उसे लोकप्रिय किरदार मिलें या अलोकप्रिय किरदार मिलें, जैसी भी चुनौतियां अदाकारी की मिलें, उसके लिए वह पूरी शिद्दत से काम करे। बाबर का जो किरदार यहां मुझे करने को मिला है, उसको मैंने पूरी शिद्दत के साथ है।’
कुणाल कपूर ने हिंदी सिनेमा में तमाम यादगार किरदार किए हैं। फिल्म ‘रंग दे बसंती’ का उनका असलम का किरदार लोग आज भी नहीं भूले हैं। यशराज फिल्म्स की पिक्चर ‘आजा नच ले’ में भी उनको किरदार अच्छा मिला लेकिन फिल्म नहीं चली। कुणाल कपूर कभी किसी खेमे के पीछे नहीं भागे और न ही कभी विवादों का सहारा लेकर सुर्खियों में रहने की कोशिश करते दिखे। अब ओटीटी के आने से उन्हें ये बड़ा काम मिला है और इससे उनका नाम भी हो रहा है। मनोरंजन माध्यमों में ओटीटी के आने से हुए बदलाव से कुणाल खुश हैं और आने वाले दिनों के और बेहतर होने की उम्मीद करते हैं।