गुजरता साल 2023 इस बात के लिए हमेशा याद किया जाएगा कि इसी साल युवा पीढ़ी का डिजिटल और ओटीटी से मोह धीरे धीरे भंग होना शुरू हुआ। कुछ कुछ ऐसी ही कहानी पर बनी है नेटफ्लिक्स की फिल्म ‘खो गए हम कहां’। इस फिल्म में अभिनेता आदर्श गौरव ने मध्यमवर्गीय परिवार के एक ऐसे युवक का किरदार किया है, जिसके दोस्त रईस है लेकिन जिसके सपने अब भी गरीब ही हैं। पिता से उसकी बनती नहीं है, जिसे वह दोस्त समझता है, वह सिर्फ उसका इस्तेमाल कर रही है और जीवन में कहीं ठौर उसका बन नहीं रहा। इस किरदार और जीवन के संघर्ष के बारे में आदर्श गौरव से ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल की एक खास मुलाकात।
Adarsh Gourav Video Interview: 10 साल में बदलने पड़े 15 घर, दूसरों के नाइकी शूज देख मुझे बाटा पर शर्म आती थी
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एक तेलुगू परिवार की संतान का हिंदी सिनेमा में अपनी अभिनय यात्रा शुरू करना कितना चुनौतीपूर्ण रहा अब तक?
जमशेदपुर में मेरा जन्म हुआ तो मैं बचपन से ही हिंदी ज्यादा बोलता रहा हूं। घर पर हमारा नियम रहा है कि हम अपनी मातृभाषा तेलुगु में बात करते हैं। लेकिन, घर पर तो हम समय ही कितना गुजारते हैं। छोटे होते हैं तो बाहर खेल रहे होते हैं। और, बड़े हो जाते हैं तो काम धंधे में लग जाते हैं।
इस साल पिता-पुत्र संबंधों पर सिनेमा में बहुत फोकस रहा है। अपने अभिभावकों से रिश्ते के बारे में कुछ बताना चाहेंगे?
मेरे पिताजी का बैंक में नौकरी के चलते हमेशा तबादलता होता रहता था। मैंने मम्मी के साथ समय ज्यादा गुजारा है। पिताजी के साथ उतना समय मिला नहीं। अब जाकर मैं पिताजी के साथ समय गुजार रहा हूं और उन्हें समझने की कोशिश शुरू कर रहा हूं।
आप एक मध्यमवर्गीय परिवार से हैं और फिल्म ‘खो गए हम कहां’ में भी ऐसा ही किरदार कर रहे हैं, जो अमीर घरों के युवाओं का दोस्त है..
ऐसे किरदारों के मेरे जो अनुभव रहे हैं, वे मेरी हकीकत से बहुत मिलते जुलते हैं। 2007 मैं मुंबई आया और पापा को बैंक की तरफ से जुहू में मिले फ्लैट में रहता था। शुरू के दो साल मेरे लिए जुहू ही मुंबई था। ये समझ ही नहीं थी कि इसके बाहर क्या है? जमशेदपुर के जिस स्कूल से आया था, वहां स्कूल की फीस तीन सौ रूपये थी और यहां मुंबई में तीन हजार। मेरे आसपास एकदम से ऐसे लोग आ गए जो ब्रांड्स की बातें करते रहे थे। हमारे यहां तो जूतों, कपड़ो के बारे में बातें ही नहीं होती थी। मुझे भी लगने लगा कि अरे, इसने नाइकी के जूते पहने हैं, और मेरे पास तो बाटा के हैं।
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तो इसका कैसा असर हुआ?
इस तरह की बातों से मेरे भीतर बहुत ही कम उम्र में गहरी आर्थिक असुरक्षा घर करने लग गई थी। मैं अपनी और अपने माता-पिता की तुलना इन ब्रांड्स प्रेमी लोगों और उनके माता पिता से करने लग गया था। ये सब अब जाकर सोशल मीडिया पर हो रहा है लेकिन मैं इससे 16 साल पहले ही गुजर चुका हूं। अब ये मुझे बहुत अजीब सी बात लगती है लेकिन उस समय का तो यही सच है।
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