{"_id":"5c0ce37fbdec224168292557","slug":"akshay-kumar-and-rajnikanth-film-2-0-special-story","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"रजनीकांत की फिल्म 2.0 के डर में कितनी सच्चाई, क्या सच में फोन रखने वाला हर व्यक्ति है हत्यारा","category":{"title":"Bollywood","title_hn":"बॉलीवुड","slug":"bollywood"}}
रजनीकांत की फिल्म 2.0 के डर में कितनी सच्चाई, क्या सच में फोन रखने वाला हर व्यक्ति है हत्यारा
Sun, 09 Dec 2018 03:40 PM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी
Updated Sun, 09 Dec 2018 03:40 PM IST
विज्ञापन
1 of 11
2.0
- फोटो : instagram
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
एक शख्स मोबाइल टावर पर चढ़ा और फांसी लगा ली। फिर हजारों पक्षी उस टावर के इर्द-गिर्द मंडराने लगे, मानों उस शख्स की मौत का विलाप कर रहे हों। फिल्म स्टार रजनीकांत की मूवी 2.0 यहीं से शुरू होती है। मूवी के अगले सीन में अचानक लोगों के फोन हवा में उड़ने लगते हैं। हर इंसान का फोन गायब हो चुका है। सरकार ने पूरी पुलिस फोर्स को मोबाइल ढूंढने के काम पर लगा दिया है, लेकिन किसी को पता नहीं चल पा रहा कि फोन आखिर गए कहां? फिर उन्हीं मोबाइल से बना एक शख्स सामने आता है। गुस्से से भरी आंखों से वो कहता है, "सेल फोन रखने वाला हर व्यक्ति हत्यारा है।" वो हर 'हत्यारे' को सज़ा देना चाहता है। उसका दावा है कि मोबाइल फोन टावर से निकलने वाली रेडिएशन पक्षियों की मौत का कारण है। सारी फिल्म इसी दावे के इर्द-गिर्द घूमती है। फिल्म में क्या है, ये देखने के लिए तो आपको थिएटर जाना होगा।
2 of 11
2.0
- फोटो : twitter
लेकिन जैसे ही फिल्म देखकर आप थिएटर से बाहर आएंगे, आपको किसी मुजरिम जैसा महसूस होगा। आप सोच में पड़ जाएंगे कि क्या आप सच में एक 'हत्यारा' हैं। उन बेज़ुबान परिंदों के 'हत्यारे'! आपके मन में कई तरह के सवाल उठेंगे कि क्या सच में मोबाइल टावर रेडिएशन से पक्षियों की मौत हो जाती है...? पक्षियों की डॉक्टर और वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. रीना देव कहती हैं कि कई चीजें जो फिल्म में दिखाई गई हैं वो सच हैं। डॉ. रीना के मुताबिक पक्षी दो तरह के होते हैं- एक तो वो जो हमारे आसपास रहते हैं और एक वो जो यहां बाहर से आते हैं। बाहर से आने वाले पक्षियों को माइग्रेटरी बर्ड्स यानी प्रवासी पक्षी कहा जाता है। कुछ पक्षी दूसरे देशों से मीलों का सफर तय करके पहुंचते हैं। वो धरती के चुंबकीय क्षेत्र (मैग्नेटिक फील्ड) की मदद से अपना रास्ता ढूंढते हैं। उनका खुद का नेविगेशन सिस्टम होता है। लेकिन जब वो मोबाइल टावर से निकलने वाली इलेक्ट्रोमेग्नेटिक फील्ड रेडिएशन के संपर्क में आते हैं तो भ्रमित हो जाते हैं।
3 of 11
मास्कड बूबी
डॉ. रीना एक वाकया सुनाती हैं, ''एक बार मुझे एक मास्कड बूबी (प्रवासी पक्षी) मुंबई में अंधेरी इस्ट के इंडस्ट्रियल एरिया में मिला था। वो समुद्री पक्षी है इसलिए उसका इंडस्ट्रियल एरिया में मिलना हैरानी भरा था। शायद वो अपना रास्ता भटककर यहां आ गया था। साल दर साल इस स्थिति में मिलने वाले पक्षियों की तादाद बढ़ती जा रही है।" रीना के मुताबिक रेडिएशन की वजह से पक्षियों की प्रजनन क्षमता, अंडों के आकार, अंडों के छिलके की मोटाई पर भी फर्क पड़ता है। रीना कहती हैं, "विदेशों में मोबाइल टावर के पक्षियों पर बुरे असर को लेकर कई शोध हुए हैं लेकिन भारत में ऐसे और रिसर्च की जरूरत है ताकि पुख्ता तौर पर पता लगाया जा सके कि सच में मोबाइल टावर से ऐसे नुकसान हो रहे हैं।" पक्षी विज्ञानी पंकज गुप्ता भी ऐसी स्टडी की जरूरत बताते हैं। वो कहते हैं कि ऐसी बातें आई तो हैं, लेकिन अब तक विदेशों में भी ऐसी कोई स्टडी नहीं है जो इस बात की 100 फीसदी पुष्टि करती हो कि मोबाइल टावर की रेडिएशन से पक्षियों को नुकसान होता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
4 of 11
birds
पंकज के मुताबिक शहरों में पक्षी इसलिए नजर नहीं आते क्योंकि जंगल कम हो रहे हैं, पानी के तालाब कम हो रहे हैं। उनके पास खाने को नहीं है, रहने को नहीं है। उन्होंने कहा, "कई प्रवासी पक्षी इसलिए भटक जाते हैं क्योंकि वो हजारों किलोमीटर का सफर तय करके आ रहे होते हैं। ऐसे में कई बार वो तूफ़ान या खराब मौसम की वजह से इधर-उधर हो जाते हैं।" तमिलनाडु में मदुरै के अमरीकन कॉलेज में जीवविज्ञान के प्रोफ़ेसर एम. राजेश ने बीबीसी से कहा कि ऐसा भी नहीं है कि रेडिएशन का असर नहीं पड़ता लेकिन ये असर जानलेवा नहीं होता।
राजेश कहते हैं कि मोबाइल टावर तो पक्षियों के लिए ख़तरनाक है क्योंकि उनसे टकराकर उनकी मौत हो जाती है लेकिन मोबाइल टावर से निकलने वाली रेडिएशन इतनी खतरनाक नहीं होती। जब लैब में पक्षियों को इलेक्ट्रोमेग्नेटिक फील्ड रेडिएशन में रखकर प्रयोग किया जाता है तो उन पर असर दिखता है? इस पर प्रोफ़ेसर एम राजेश कहते हैं कि लैब में रेडिएशन पक्षियों पर सीधे पड़ती है इसलिए पक्षियों के शरीर पर उसका बुरा असर होता है, लेकिन असल में जो मोबाइल टावर हैं, उनसे निकलने वाला रेडिएशन वातावरण में फैल जाता है। यह जीव-जंतुओं पर सीधा नहीं पड़ता। इसलिए वो इतना नुक़सान नहीं पहुंचाता।
विज्ञापन
5 of 11
पेट्रोल की बोतल लेकर टॉवर पर चढ़े दो टीचर्स
एम्स के रेडियोथेरेपी और ओन्कोलॉजी डिपार्टमेंट के पूर्व डीन डॉ प्रमोद कुमार जुल्का भी प्रोफ़ेसर राजेश से सहमति जताते हैं। वो कहते हैं कि रेडिएशन दो तरह की होती है-एक आयनाइज़िंग और दूसरी नॉन आयनाइज़िंग। एक्स-रे की रेडिएशन आयनाइज़िंग होती है, जो कि शरीर के लिए नुक़सानदायक हैं और इससे कैंसर हो सकता है. वहीं मोबाइल टावर से निकलने वाली इलेक्ट्रोमेग्नेटिक फील्ड रेडिएशन लो एनर्जी रेडिएशन होती है. ये इतनी ख़तरनाक नहीं होती। इसका रेडिएशन इतना शक्तिशाली नहीं होता जिससे डीएनए को नुक़सान पहुंचे। ये एक मिथक है कि घर के आस-पास लगे टावर बहुत ख़तरनाक हैं। जब तक कोई पुख़्ता स्टडी सामने नहीं आती, तब तक इसे माना नहीं जा सकता। लेकिन आबादी वाले इलाक़ों में बढ़ते मोबाइल टावरों का लगातार विरोध होता रहा है. मोबाइल टावरों के विरोध में अभिनेत्री जूही चावला ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका भी दाख़िल की थी।
एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें
Next Article
Disclaimer
हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।