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Sirf Ek Bandaa Kaafi Hai: मिलिए ‘सिर्फ एक बंदा काफी है’ के खलनायक से, लखनऊ के सूर्य का मुंबई तक फैला उजाला

Tue, 23 May 2023 10:33 AM IST
प्रियंका नेगी एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: प्रियंका नेगी Updated Tue, 23 May 2023 10:33 AM IST
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Amar Ujala Exclusive Interview with Surya Mohan Kulshreshtha Asaram Bapu in Sirf Ek Bandaa Kaafi Hai Manoj
सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ - फोटो : अमर उजाला

फिल्म 'सिर्फ एक बंदा काफी है' का ट्रेलर अगर आपने देखा है तो इसमें ‘आसाराम’ जैसी सूरत और वैसी ही मिलती जुलती आवाज वाले अभिनेता को देखकर जरूर चौंके होंगे। उनके इसी अभिनय ने हमें भी चौंकाया। ये अभिनेता हैं सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ। मशहूर रंगकर्मी और लखनऊ स्थित भारतेंदु नाट्य अकादमी के पूर्व निदेशक सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ को भारत सरकार से संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिल चुका है। आत्मप्रचार से दूर रहने वाले कुलश्रेष्ठ का उनका कहना है कि फिल्म या वेब सीरीज उनका क्षेत्र नहीं है, इसलिए कभी उन्होंने इसके  लिए कोशिश नहीं की। सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ से ‘अमर उजाला’ की एक्सक्लूसिव बातचीत।

Amar Ujala Exclusive Interview with Surya Mohan Kulshreshtha Asaram Bapu in Sirf Ek Bandaa Kaafi Hai Manoj
सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आप भारतेंदु नाट्य अकादमी के छात्र रहे और फिर भारतेंदु नाट्य अकादमी के ही निदेशक बने। आपकी यह यात्रा कैसी रही ? 
नाटक तो बचपन से ही करते रहे है लेकिन तब नाटकों के बारे में इतना पता नहीं था। इसे बच्चों का खेल समझते थे। जब बड़े हुए तो पता चला कि बड़े लोग ‘नाटक’ नहीं करते हैं। उस समय तो यह भी नहीं पता था कि थियेटर नाम की कोई चीज होती है। साल 1974 से नाटकों के प्रति थोड़ा गंभीर हुआ तो शुरुआती दौर में रंजीत कपूर, भानु भारती, देवेंद्र राजन जैसे निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिला। जब 1976 में भारतेंदु नाटक अकादमी खुली तो पहले बैच में एडमिशन लिया और निर्देशन में ट्रेनिंग ली। शुरू से ही मेरा ज्यादा फोकस निर्देशन की ही तरफ रहा। कभी कभी बीच में एक्टिंग भी की। साल 2006 में भारतेंदु नाटक अकादमी का निदेशक बनने का मौका मिला तो मैंने एलआईसी की नौकरी छोड़ दी।

Amar Ujala Exclusive Interview with Surya Mohan Kulshreshtha Asaram Bapu in Sirf Ek Bandaa Kaafi Hai Manoj
सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आपका पूरा जीवन ही रंगमंच के नाम रहा है, ये प्रेरणा कहां से मिली?
हमें तो बचपन में यही लगता था कि नाटकों का आविष्कार हमने ही किया। उससे पहले तो थियेटर कभी देखा ही नहीं था। लखनऊ में जन्माष्टमी मनाई जाती थी तो सभी बच्चे सज-धज के खड़े रहते थे। कोई कृष्ण बनता था तो कोई और। हमें भी सजा दिया जाता था और कृष्ण बनकर उन्हीं बच्चों में खड़े हो जाते थे। एक दिन लगा कि चल फिर कर कुछ किया जाए। हमारे क्लास में नरोत्तम दास की एक कविता 'सीस पगा न झगा तन में, प्रभु जानै को आहि, बसै केहि ग्रामा' पढाई जाती थी। उसे हमने अपने भाई बहन के साथ चल फिर कर किया। यह मेरे लिए एक आविष्कार जैसे था। यहां से नाटकों के प्रति मेरा रुझान हुआ। 

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सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

रंगमंच से जुड़े कलाकारों के लिए फिल्मों के दरवाजे हमेशा ही खुले रहते हैं, लेकिन फिल्मों में आपकी सक्रियता शुरू से ही बहुत कम रही है, इसकी कोई खास वजह ?
मेरा क्षेत्र तो थियेटर ही है, मैंने कभी भी खुद फिल्म या फिर वेब सीरीज के लिए कोशिश नहीं की। हालंकि यह अच्छी चीज है,लेकिन यह मेरा क्षेत्र नहीं है। जब मेरा क्षेत्र फिल्म नहीं, तो उस प्रतिस्पर्धा में क्यों पड़ा जाए? मुझे रंगमंच पर ही खुशी मिलती है। फिल्म अपने आप में एक बहुत अच्छा और सशक्त माध्यम है। लेकिन मुझे लगता है कि थियेटर भी कहीं ज्यादा प्रभावशाली है, भले ही वह कम लोगों तक पहुंचता हो लेकिन दर्शक उससे सीधे तौर पर जुड़ते हैं। थियेटर का अपना एक बहुत बड़ा चैलेंज यह है कि छोटे सी जगह में पूरी दुनिया दिखानी होती है।

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सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

लेकिन आप इस बात को तो मानते ही होंगे कि रंगमंच से आए कलाकारों के ऊपर फिल्म के निर्देशकों का एक विश्वास होता है?
बिल्कुल। रंगमंच की ट्रेनिंग भावनाओं और व्यक्तित्व को निखारती है। यह ट्रेनिंग थियेटर में बड़ी अद्भुत होती है क्योंकि थियेटर में रिहर्सल बड़ी लंबी चलती है। रिहर्सल के दौरान उस प्रक्रिया से गुजरना कि एक्टिंग करते समय कैसे उसे पूरे शरीर में महसूस करना है, दैहिक क्रिया, आवाज और भाव से उस चरित्र को कैसे अपने अंदर लेकर आएं। फिल्म की शूटिंग में  माइक्रोफोन दर्शकों का कान है और कैमरा दर्शकों की आंख। मेरा फोकस थियेटर में ही ज्यादा रहा। अब तक मैं इंग्लैंड, जर्मनी, नार्वे, सूडान, अमेरिका, और पाकिस्तान जैसे कई देशों में नाटक कर चुका हूं।

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