हिंदी सिनेमा में अगर 60 का दशक संगीत का स्वर्णिम युग कहा जाता है तो 80 और 90 के दशक को अब भी इसकी सुरीली धुनों के लिए लोग याद करते हैं। फिल्म ‘कयामत से कयामत तक’ के गानों की सफलता ने संगीतकार आनंद मिलिंद की जोड़ी को हिंदी सिनेमा के सबसे नामचीन संगीतकारों में शुमार किया। ये जोड़ी अब तक 200 से ज्यादा फिल्मों में संगीत दे चुकी है। संगीतकार चित्रगुप्त के बेटों की इस जोड़ी के आनंद 21 दिसंबर को अपना जन्मदिन मनाते है। अपने जन्मदिन के अवसर पर आनंद ने ‘अमर उजाला’ से खास मुलाकात के दौरान अपने करियर से जुड़े तमाम किस्से सुनाए और ये भी खुलासा किया कि निर्देशक पंकज पराशर ने उन्हें पहला ब्रेक दिया था। पंकज पराशर ने ही आनंद मिलिंद को फिल्म 'कयामत से कयामत तक' के निर्देशक मंसूर खान से भी मिलवाया। आइए जानते हैं इस जोड़ी की कामयाबी की कहानी, संगीतकार आनंद की जुबानी।
Anand (Milind) Exclusive: मंसूर खान नहीं इस निर्देशक ने बदल दी जिंदगी, जन्मदिन पर आनंद ने सुनाई राम कहानी
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पहली ही फिल्म में लता मंगेशकर के साथ मौका
निर्देशक पंकज पराशर ने हमें 1982 में अपनी फिल्म 'अब आएगा मजा' में ब्रेक दिया। यह कॉमेडी फिल्म थी जिसमें फारुख शेख और अनीता राज ने काम किया। इस फिल्म का पहला गाना 'राजा तेरे रास्ते से हट जाऊंगी, गाड़ी के नीचे जाकर कट जाऊंगी' लता मंगेशकर ने गाया था। गाना सुपरहिट रहा। लोग पता करने लगे कि आखिर इस गाने के संगीतकार कौन हैं? लता जी के आशीर्वाद से हमने अपने करियर की शुरुआत की। पापा के साथ तो उन्होंने सैकड़ों गाने गाए। फिल्म ‘अब आएगा मजा’ में लता मंगेशकर के अलावा आशा भोसले और किशोर कुमार ने भी गाने गाए थे। लेकिन, बस एक ही बात का मलाल रह गया कि हम कभी रफी साहब से गाना नहीं गवा पाए। रफी साहब तब तक इस दुनिया को छोड़कर जा चुके थे।
पंकज पराशर ने निभाई दोस्ती
सिनेमा में दोस्ती के किस्से बिरले ही मिलते हैं। लेकिन पंकज पराशर ने अपनी दोस्ती खूब निभाई। हमारे घर से दो कदम की दूरी पर पंकज का घर था। बचपन में हम लोग साथ खेलते कूदते बड़े हुए। पंकज पराशर ने वादा किया था कि जब वह निर्देशक बनेंगे तो हमें काम देंगे। वैसे तो यहां बस लोगों की बातें ही रह जाती है लेकिन उसने अपना वादा निभाया। पंकज पराशर जब हमसे अपनी फिल्म 'अब आएगा मजा' के लिए मिले तो हमारे पास तमाम गाने तैयार थे, उन्होंने उनमें से ही अपनी फिल्म के लिए गाने चुन लिए। मेरे पापा चित्रगुप्त और समीर के पापा अनजान जी कहा करते थे, तुम लोग यंग जनरेशन के होने के बाद इतनी अच्छी धुनें बना लेते हो। अनजान जी के बेटे समीर तब नए नए बनारस से आए थे। हम धुनें बनाते थे और उस पर समीर गीत लिखते थे। 'अब आएगा मजा' के गीत समीर ने ही लिखे।
उदित और अल्का के बारे में भविष्यवाणी
जब 'कयामत से कयामत तक' की शुरुआत हुई तो हमने फिल्म के सारे गाने उदित नारायण और अल्का याज्ञनिक से गवाए। मेरे पिताजी ने बहुत सारी भोजपुरी फिल्मों में संगीत दिया दिया है तो उन्होंने उदित नारायण को अपनी फिल्मों में गवाया हुआ था। उदित की आवाज शुरू से ही हमको बहुत पसंद थी। मेरे पिता जी का कहना था कि इन दोनों गायकों को कोई रोक नहीं सकता है, एक उदित नारायण और दूसरी अलका याग्निक। अलका याग्निक ने भी पिताजी की भोजपुरी फिल्मों में गाने गाए थे।
मजरूह सुल्तानपुरी जैसा कोई नहीं
'कयामत से कयामत तक' के सभी गीत मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे थे। वह मेरे पिता चित्रगुप्त के साथ 40-45 फिल्मों के गीत लिख चुके थे। उनको हम बचपन से जानते थे। बहुत ही सीनियर गीतकार थे लेकिन उनको देखकर घबराहट नहीं होती थी क्योंकि वह घर पर आया जाया करते थे तो एक तरह से उनके साथ आत्मीयता हो गई थी। मजरूह सुल्तानपुरी जैसा मीटर पर गीत लिखने वाला बेहतर गीतकार दूसरा नहीं हुआ। 'कयामत से कयामत तक' के जितने भी गाने हमने बनाए थे, उन सभी गानों की पहले धुन बनी थी उसके बाद उस पर गीत लिखे गए थे। सबसे टेढ़ी धुन 'गजब का है दिन' बन गई थी। उसका मीटर बड़ा ही आड़ा टेढ़ा अजीब सा था। हमने सोचा जब हम उनको यह धुन देंगें तो पता नहीं मजरूह साहब कैसा रिएक्ट करेंगे, लेकिन धुन मिलने के दूसरे दिन ही उनका गाना तैयार मिला।