हर तरफ हिंदी सिनेमा में इन दिनों कंटेंट का जोर है। बड़े सितारे पिट रहे हैं। कहानियां हिट हो रही हैं। साल 2018 की बड़ी सुपरहिट फिल्मों में से एक रही निर्देशक श्रीराम राघवन की फिल्म अंधाधुन। फिल्म का नाम लोगों को शुरू में समझ नहीं आया। फिर फिल्म के प्रचार में तमाम तरह की अड़चनें। फिल्म मेकिंग के बदलते दौर, क्रिएटिव स्पेस में कॉरपोरेट की दखल और तमाम दूसरे मुद्दों पर श्रीराम राघवन से अमर उजाला की बातचीत के कुछ अंश।
इस डायरेक्टर के साथ वरुण धवन ने काम करने से किया था मना, बाद में बना दी 100 करोड़ी फिल्म
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श्रीराम, फिल्म हिट हो गई और बहुत बड़ी हिट हो गई तो क्या कहेंगे, काम बोलता है?
- हां, मेरा तो काम ही बोलता है। अभी दो दिन पहले एक अंग्रेजी वेबसाइट ने मेरा इंटरव्यू प्रकाशित किया, जिसे लेकर वॉयकॉम 18 में हंगामा हो गया। उनको लगा कि मैं उन्हें जानबूझकर टारगेट कर रहा हूं लेकिन, वह ये नहीं समझ पाए कि मैं एक परंपरा के खिलाफ हूं। एक निर्देशक अपने जीवन के कुछ साल देता है एक फिल्म को। जैम्स कैमरॉन की टाइटैनिक को ही ले लीजिए। निर्देशक और स्टूडियो के बीच झगड़े का ये सबसे सटीक उदाहरण है। इसी फिल्म ने स्टूडियो को नया जीवनदान भी दिया।
लेकिन, ये तो सच है कि फिल्म अंधाधुन का वैसा प्रचार उत्तर भारत में नहीं किया गया, जिसकी आपको या फिल्म के कलाकारों को उम्मीद रही होगी?
- मैं थोड़ा साधारण किस्म का इंसान हूं। लेकिन मुझे लगता है कि ये सब अब मुझे सीखना पड़ेगा। हमारी फिल्म को एक दो टीवी शो को छोड़ दें तो इसका कहीं कोई प्रचार ही नहीं हुआ। फिल्म की रिलीज कुछ हफ्ते पहले मुझे इंडस्ट्री के एक नामी निर्देशक किसी पार्टी में मिले। उनको मैंने बताया कि मैं अंधाधुन कर रहा हूं तो उनका पहला सवाल था कि कब शूटिंग शुरू कर रहे हो। मैं तो डर गया कि फिल्म रिलीज होने वाली है और इंडस्ट्री के ही लोगों को नहीं पता कि ऐसी कोई फिल्म बन रही है। ऐसा मेरे साथ जॉनी गद्दार के समय भी हुआ, लोग फिल्म पसंद कर रहे थे लेकिन थिएटर से फिल्म दूसरे हफ्ते में ही निकालनी शुरू कर दी गई।
और, ये वो फिल्म थी जिसके लिए झामू सुगंध जैसा प्रोड्यूसर आपके घर तक आया?
- हां, ये वाकया सच है। एक हसीना थी कि कामयाबी के बाद मैंने संजय राउतरे को जॉनी गद्दार सुनाई थी। एक दिन मेरे पास झामू सुगंध का फोन आया कि कोई कहानी है तुम्हारे पास। उन दिनों झामू सुगंध इंडस्ट्री का सबसे बड़ा नाम हुआ करता था। बड़ी-बड़ी फिल्मों में उनका पैसा लगता था। तो मैं चौंक गया। मैंने कहा कि मिलता हूं आपसे। लेकिन, अगले ही दिन वह मेरे घर पहुंच गए।
इसके बाद एजेंट विनोद से लेकर बदलापुर तक के सफर ने आपको क्या सिखाया?
- एजेंट विनोद चली नहीं तो उसके कई कारण हैं। किसी बड़े स्टार से दोस्ती करना और फिर उसके साथ फिल्म बनाना। दोनों अलग अलग बातें हैं। दोस्ती यारी में फिल्म बनाते वक्त आप बहक जाते हैं। सेट पर और सेट के अलावा भी एक ऐसा माहौल बन जाता है कि आप जो कुछ कर रहे हैं, सही कर रहे हैं। बदलापुर बनकर तैयार हुई तो एक कॉन्टेस्ट किया फिल्म की मार्केटिंग टीम ने कि आप बदलापुर क्यों देखना चाहते हैं, ऑप्शन में वरुण धवन, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, हुमा कुरैशी और आखिर में मेरा नाम भी था। मुझे केवल एक वोट मिला इस कॉन्टेस्ट में। लेकिन, वह एक वोट मेरे लिए जीवन का सबसे कीमती वोट है। मैं आज भी उस शख्स से मिलकर उसे धन्यवाद देना चाहता हूं।