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EXCLUSIVE: हां, मेरा सिनेमा बदला है लेकिन इसकी वजह मेरा ब्लड कैंसर से जूझना नहीं है: अनुराग बसु

Sat, 28 Nov 2020 09:46 AM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Sat, 28 Nov 2020 09:46 AM IST
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Anurag basu speaks to Pankaj Shukla on his new film ludo Abhishek bachchan rajkumar rao barfi oscar
अनुराग बसु - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

अनुराग बसु का करियर टेलीविजन से शुरू होकर बड़े परदे से होते हुए मोबाइल तक पहुंच गया है। वह अब डिजिटल के लिए अलग से भी कुछ करने के पक्षधर हैं। उनके पास संवेदनाओं का खजाना है और रुपहले परदे पर बिखेरने को लाखों रंग। पर, अनुराग शुरू से ऐसे नहीं थे। कैसे समय के साथ बदला अनुराग बसु का सिनेमा और परदे पर कहानियां कहने के क्या हैं उनके कारक? बता रहें अनुराग बसु इस खास बातचीत में वरिष्ठ फिल्म समीक्षक पंकज शुक्ल को।

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अनुराग बसु, अभिषेक बच्चन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

‘लूडो’ में जो लोग भी अभिषेक बच्चन को देख रहे हैं, उनको इस किरदार में ‘युवा’ का लल्लन दिख रहा है। आपको भी ऐसा लगता है क्या?
अभिषेक बच्चन एक बेहतरीन अभिनेता हैं। किरदारों में वह रम जाते हैं। फिल्म ‘लूडो’ में उन्होंने खुद को एक नए आयाम के साथ पेश किया है। लेकिन, हां अगर लोगों को बिट्टू में लल्लन की छवि नजर आती है तो मैं ये बात स्वीकार करता हूं कि ये किरदार लिखते समय मेरे मन में लल्लन का काफी प्रभाव था। निर्देशक मणिरत्नम की ये फिल्म थी ही ऐसी और अभिषेक बच्चन ने लल्लन का किरदार जिया भी बहुत शानदार तरीके से था।

पढ़ें: Ludo Netflix Review: चौकड़ी भरने में कामयाब अनुराग बसु की ‘लूडो’, त्योहारी मौसम में रंगों की मुस्कान


 

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राजकुमार राव - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

और, राजकुमार राव को मिथुन चक्रवर्ती का फैन बनाने की वजह?
राजकुमार राव के किरदार में मिथुन दा के फैन का अंश बाद में आया। पटकथा लिखते समय ये था नहीं लेकिन बाद में शूटिंग के वक्त उनके किरदार में ये रंग धीरे धीरे आता गया। लंबे बाल, चलने का एक अलग स्टाइल, बात करने का अलहदा अंदाज और प्रेम में निभाई गईं प्रतिज्ञाएं। पश्चिम बंगाल में मिथुन दा का एक अलग आभामंडल रहा है तो ये किरदार धीरे धीरे ऐसा बनता चला गया।

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अनुराग बसु - फोटो : file photo

आपके शुरूआती सिनेमा पर महेश भट्ट का काफी असर रहा और फिर आपने एकदम से अपने सिनेमा की धुरी ही बदल दी, ऐसा क्या जीवन में आए किसी बड़े मोड़ की वजह से है?
मैं समझ रहा हूं कि शायद आप मुझे हुए ब्लड कैंसर की तरफ इशारा कर रहे हैं। लेकिन, मैं कहूंगा कि नहीं। मेरे जीवन में और मेरे सिनेमा में असल बदलाव मेरी शादी के बाद आया। मेरी दो बेटियों के जन्म के बाद आया। इशाना और अहाना की आंखों में मैंने जितने भी जीवन के रंग देखे हैं, वे सब अब मेरी कल्पनाओं का हिस्सा हैं।

पढ़ें: अमर उजाला से खास बातचीत में अभिषेक बच्चन ने बताया, कैसे मिली ‘लूडो’

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अनुराग बसु - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

आपकी फिल्में बनाने की गति थोड़ी सुस्त सी जान पड़ती है, एक फिल्म से दूसरी फिल्म के बीच इतना लंबा अंतराल रखने की वजह?
मेरे पास जीवन में सिनेमा के अलावा भी बहुत कुछ है। मैं सिर्फ सिनेमा के लिए नहीं जीता हूं। हां, मेरे सिनेमा की गति सुस्त है और वह इसलिए कि मैं एक आलसी फिल्ममेकर हूं। जब तक कोई विचार या वस्तु मुझे मजबूर न कर दे, मैं उसे सिनेमा में ढाल नहीं पाता हूं। कोशिश कर रहा हूं कि ये गति थोड़ा बढ़े। अपनी अगली फिल्म में मैं ये अंतराल कम रखने की पूरी कोशिश कर रहा हूं।

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