फैशन और लाइफस्टाइल की टॉप मॉडल, शास्त्रीय संगीत की प्रशिक्षित गायिका, मार्शल आर्ट्स की ट्रेनिंग और हिंदी, उड़िया, बांग्ला में चरित्र प्रधान भूमिकाओं वाली आठ साल में 16 फिल्में। सिनेमा को बिदिता बाग रास आ रही हैं। बाबूमोशाय बंदूकबाज की फुलवा अब शोले गर्ल की रेशमा बनकर महक रही है।
'शोले गर्ल' बनीं बाबूमोशाय की 'फुलवा', इंटरव्यू में बताया क्यों नहीं बनना चाहतीं सुपरस्टार
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पश्चिम बंगाल के एक छोटे से शहर संतरागाछी की लड़की ने जब फिल्मों में काम करने की ठानी, तो परिवार वालों की क्या प्रतिक्रिया रही होगी?
हम दो हमारे दो वाला हमारा छोटा सा परिवार है। पिताजी आयकर विभाग में थे। शाम को घर आते, नुक्कड़ नाटकों की रिहर्सल करते और, भोर में क्लासिक गाने ग्रामोफोन पर बजाते। संगीत और अभिनय एक तरह से मुझे घुट्टी में मिला। लेकिन, जब मैंने एक दिन एमए की पढ़ाई के बीच मुंबई जाकर एक्टिंग को अपना करियर बनाने का ऐलान किया तो घर में भूचाल आ गया। पिताजी तो घर ही छोड़कर चले गए, 45 दिन बाद लौटे।
मॉडलिंग तो अब स्कूल के दिनों से करती रही हैं, फिर ऐसा क्यों?
हां, मैं बालिग होने से पहले आत्मनिर्भर हुई। सब्यसाची मुखर्जी से लेकर कोलकाता के तमाम बड़े फैशन डिजाइनर्स की मैं पसंदीदा मॉडल रही हूं। रैम्प से लेकर देसी-विदेशी पत्रिकाओं में खूब छपती और सबको अच्छा भी लगता लेकिन मेरा घर छोड़कर जाने का फैसला अच्छा नहीं लगा। पिताजी बाद में मान भी गए और मेरे काम को देखकर बहुत खुश भी हुए।
मुंबई का पहला अनुभव कैसा रहा?
मेरी थिएटर की ट्रेनिंग रही है। मॉडलिंग में तो खैर जितना ऊपर कोई जा सकता है, वहां तक का आसमान छू लिया लेकिन, मुंबई इतना कुछ सिखाएगी मुझे एहसास नहीं था। यहां रिश्ते-नाते, जान-पहचान कुछ काम नहीं आती। मुझे लगा था मैं टॉप मॉडल हूं लोग मुझे हाथोंहाथ लेंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। मुंबई में एक्टिंग को करियर बनाने के लिए आने वाली लड़कियों को मैं यही बता सकती हूं कि हर दूसरे करियर की तरह यहां भी संघर्ष बहुत है। एक सीट के लाखों दावेदार हैं और यहां कोई रिजर्वेशन भी नहीं है।
अब तो आपने नाम भी कमा लिया है, कामयाबी भी आपके अपने घर की खिड़की से दिख ही रही है, किधर जाती दिख रही है आपको अपनी यात्रा?
मैं सुपरस्टार बनने की कोशिश नहीं कर रही हूं। मैं सिर्फ अच्छे और ऐसे दमदार किरदार करने की कोशिश कर रही हूं, जिनमें एक कलाकार की अदाकारी दर्शकों को दिख सके। मेरी सुंदरता को देख जो रोल मुझे आते हैं, वे मैं नहीं करती। घर मेरा मॉडलिंग से चलता है। अभिनय मेरा जुनून है। सिनेमा और डिजिटल की बड़ी कंपनियां अपने पास आने वाले निर्माताओं को मेरा नाम सुझाती हैं, यही मेरे अभिनय की असली कामयाबी है।
शोले गर्ल में पहली स्टंट वूमन रेशमा के किरदार के अलावा आप छिंदवाड़ा में सामाजिक काम करने वाली मर्सी मैथ्यू उर्फ दयाबाई की बायोपिक कर रही हैं। यूपी पुलिस के एक अफसर की बायोपिक में भी हैं, बायोपिक्स आपको कितना रोमांचित करती हैं?
कहानी असली हो या काल्पनिक, लगनी सच्ची जैसी चाहिए। बायोपिक में ईमानदारी न हो तो लोगों को पसंद नहीं आती। वहीं, तमाम काल्पनिक कहानियों लोगों को खूब भाती हैं। दर्शकों को कहानी के किरदार पसंद आते हैं। मैं इन्हीं किरदारों को जीना चाहती हूं। हर किरदार के लिए मेरा अलग रिसर्च वर्क होता है। मैं किरदार के हिसाब से आवाज बदलने पर भी काम करती हूं। मुझे अमिताभ बच्चन नहीं बनना है।