जब कान फिल्म फेस्टिवल का आज के निर्देशकों की तरह फिल्ममेकर अपनी ब्रांडिंग के लिए इस्तेमाल नहीं किया करते थे, उस दौर में बिमल रॉय ने कान जीत लिया था। संजय लीला भंसाली आज भी किसी नई हीरोइन का चयन करते हैं तो उसे बंदिनी, सुजाता और परिणीता देखने की सलाह देते हैं। हिंदी सिनेमा की नायिका को दमदार पहचान देने वाले निर्देशकों में बिमल रॉय का नाम पहले नंबर पर आता है। 11 फिल्मफेयर पुरस्कार, दो राष्ट्रीय पुरस्कार और कान फिल्म महोत्सव में अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले बिमल रॉय ने पुनर्जन्म की कहानी पर मधुमती बनाई और इस फिल्म ने इतने पुरस्कार जीते कि करीब चार दशक तो कोई उनके पास भी नहीं फटक पाया। उनकी पुण्यतिथि पर आइए कोशिश करते हैं उनके निर्देशन का तिलिस्म समझने की, उनकी पांच कालजयी फिल्मों के सहारे।
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दो बीघा जमीन (1953)
यह फिल्म अपने समाजवादी विषय के लिए जानी जाती है। इसे भारत के शुरुआती समानांतर सिनेमा में पथप्रर्दशक के रूप में एक महत्वपूर्ण फिल्म माना जाता है। इटली के नए वास्तविक सिनेमा में निर्देशक विटोरिओ दे सिका की फिल्म बाइसिकल थीव्स से प्रेरित होकर बिमल रॉय ने यह फिल्म बनाई थी। उनकी ज्यादातर फिल्मों की तरह इस फिल्म को भी कला और व्यवसाय को एक साथ जोड़कर एक ऐसी फिल्म में तब्दील की गया जो एक आधार के रूप में देखी जाए। इस फिल्म से उन्होंने भारत के वास्तविक सिनेमा को नई को उड़ान दी, जिसने भारत के भविष्य के निर्माताओं के लिए रास्ता बनाया। इसे सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए ऑल इंडिया सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट से सम्मानित किया गया। यह पहली फिल्म है जिसने सर्वश्रेष्ठ फिल्म का फिल्मफेयर अवार्ड जीता और पहली भारतीय फिल्म है जिसने कान फिल्म फेस्टिवल में अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीता।
परिणीता (1953)
मीना कुमारी की ललिता की भूमिका की व्याख्या के कारण इस फिल्म के संस्करण को कई लोग उपन्यास का सबसे वफादार रूपांतरण मानते हैं। यह फिल्म बंगाली उपन्यासकार शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है। फिल्म में अशोक कुमार और मीना कुमारी मुख्य भूमिका में हैं। इस फिल्म के लिए मीना कुमारी को उनके करियर का दूसरा फिल्मफेयर अवार्ड मिला था। इस फिल्म की सफलता को देखकर निर्देशक बिमल रॉय अपनी अगली फिल्म देवदास में पारो के किरदार के लिए मीना कुमारी को लेने वाले थे, लेकिन कुछ चीजें ठीक नहीं हो पाईं। इस फिल्म के लिए बिमल रॉय को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला।
मधुमती (1958)
दिलीप कुमार और वैजंतीमाला पर फिल्माई गई यह फिल्म हिंदी सिनेमा में पुनर्जन्म की कहानियों की सफल शुरुआत के तौर पर देखी जाती है। बाद में इसी फिल्म से प्रेरित होकर कर्ज, ओम शांति ओम और करण अर्जुन जैसी कई फिल्मों में यह फॉर्मूला इस्तेमाल किया गया। इस फिल्म ने जिस दौर में चार करोड़ रूपये कमाए थे, उसके हिसाब से ये फिल्म उस दौर की ब्लॉकबस्टर फिल्मों में शुमार हुई। ये उस साल की सबसे ज्यादा पैसा कमाने वाली फिल्म भी है। इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और सर्वश्रेष्ठ फिल्म की श्रेणी समेत नौ फिल्मफेयर अवार्ड मिले। ये रिकॉर्ड अगले 37 वर्षों तक कायम रहा।
सुजाता (1959)
महिला किरदारों को केंद्र में रखकर फिल्म बनाने का सिलसिला निर्देशक बिमल रॉय ने ही शुरू किया था। बाद में मदर इंडिया जैसी फिल्मों में दूसरे निर्देशकों ने इस सिलसिले को जारी रखा। यह फिल्म इसी नाम की एक बंगाली लघु कथा पर आधारित है जिसे लेखक सुबोध घोष ने लिखा है। यह फिल्म भारत में जातियों की स्थिति को उजागर करती है। सुनील दत्त और नूतन पर फिल्माई इस फिल्म ने कान फिल्म महोत्सव में भी जगह बनाई थी। इस फिल्म के लिए बिमल रॉय को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और सर्वश्रेष्ठ फिल्म का फिल्मफेयर अवार्ड मिला।