अपने ‘ढाई किलो के हाथ’ के लिए फिल्म ‘घायल’ से मशहूर हुए अभिनेता सनी देओल के करियर को डूबने से जिस एक्शन फिल्म ने उबारा, उसका नाम है ‘अर्जुन’। सलीम-जावेद ने मिलकर हिंदी सिनेमा को एक एंग्री यंगमैन फिल्म ‘ज़ंजीर’ में दिया था साल 1973 में उसके 12 साल बाद जब सलीम और जावेद दोनों अलग अलग हो चुके थे तो एक और एंग्री यंगमैन परदे पर उतरा सनी देओल के रूप में। इस बार पोस्टर पर लिखा था, रिटेन बाई जावेद। जावेद अख्तर ने अपने जोड़ीदार सलीम से अलग होकर गाने तो फिल्म ‘सिलसिला’ से ही लिखने शुरू कर दिए थे लेकिन बतौर कथाकार जावेद अख्तर पर बिना सलीम खान के भरोसा दिखाने वाले पहले निर्देशक बने राहुल रवैल। राहुल ने उनसे सनी देओल की डेब्यू फिल्म ‘बेताब’ लिखवाई। ‘बेताब’ के बाद सनी देओल की तीन फिल्में बतौर रोमांटिक हीरो और रिलीज हुईं ‘सनी’, ‘मंज़िल मंज़िल’ और ‘सोहनी महिवाल’ और तीनों ही बॉक्स ऑफिस पर अपेक्षित कारोबार नहीं कर पाईं। राहुल रवैल की ही फिल्म ‘अर्जुन’ ने सनी देओल का करियर फिर से संवारा। और, ये फिल्म ‘अर्जुन’ ही थी जिसके सेट पर राजकुमार संतोषी ने पहली बार सनी देओल को ज़बर्दस्त एक्टिंग करते देखा और तय किया कि जब भी वह डायरेक्टर बनेंगे, सनी देओल के साथ काम ज़रूर करेंगे। संतोषी उन दिनों निर्देशक गोविंद निहलानी के सहायक हुआ करते थे।
Bioscope S2: इस एक्शन फिल्म ने बचाया था सनी देओल का करियर, डिंपल के नाम पर लगा दिया था वीटो
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दुनिया माने बुरा तो गोली मारो
10 मई 1985 को रिलीज हुई फिल्म ‘अर्जुन’ उन दिनों के किशोरों और युवाओं की फेवरिट फिल्म आज भी है। खास तौर से इसका एक गाना ‘ममैया केरो केरो केरो मामा’ उन दिनों का यूथ एंथेम था, ‘दुनिया माने बुरा तो गोली मारो..., दुश्मन को ये बता तो दुश्मनी है क्या..!’ गाने की ओपनिंग लाइन का वैसे तो हिंदी भाषा में कोई मतलब नहीं है लेकिन जहां तक इस गाने की बात है तो बताते हैं कि जावेद अख्तर ने इसकी रचना ब्राजीलिन कलाकार कारमेन मिरांडा के गाने ‘ममैए यू केरो..’ (मां, मुझे ये चाहिए) से प्रेरित होकर की। दिलचस्प ये भी है कि ये गाना कभी इस फिल्म के लिए बना ही नहीं था। जावेद अख्तर और राहुल रवैल इसके पहले फिल्म ‘अर्जुन’ के निर्माताओं करीम मोरानी और बंटी सूरमा के लिए फिल्म ‘बेटे’ बना रहे थे। फिल्म में सनी देओल, कुमार गौरव, अमृता सिंह आदि कलाकार थे। हालांकि बाद में ऋषि कपूर ने कुमार गौरव की जगह ले ली थी लेकिन फिल्म बीच में ही बंद हो गई। इसके बाद फिल्म ‘अर्जुन’ की शुरूआत बहुत ही दिलचस्प तरीके से हुई। हां, निर्माताओं ने फिल्म ‘बेटे’ का ये गाना कैसे भी करके फिल्म ‘अर्जुन’ में रखने का फरमान पहले ही राहुल रवैल को सुना दिया था।
अखबार से मिला ‘अर्जुन’ का आइडिया
हुआ यूं कि राहुल रवैल और जावेद अख्तर बंबई के सबसे करीबी और आसानी से पहुंचे जा सकने वाले हिल स्टेशन लोनावला में वक्त बिता रहे थे। तड़के चार बजे के करीब जावेद अख्तर ने राहुल रवैल को सोते से जगा दिया। बोले, उनके पास फिल्म का कमाल का आइडिया आया है। जावेद को अखबार पढ़ने की आदत शुरू से रही है और इस बार उनको फिल्म का आइडिया भी अखबार से ही मिला। ये उन दिनों की बात है जब मुंबई में पठान गैंग और दाऊद गैंग की जड़ें फैलने लगी थीं और वे बेरोजगार लड़कों के भोले भाले चेहरों को आगे कर अपना उल्लू सीधा कर रहे थे। राहुल रवैल को टाइम्स ऑफ इंडिया की संडे मैगजीन में छपे इस आलेख की बातें रोचक लगीं। ये ऐसा समय था जब देश में बेरोजगारी बहुत बढ़ रही थी और नेता लोग युवाओं को बरगलाने में लगे थे। इसी मूल विचार पर जावेद अख्तर ने फिल्म ‘अर्जुन’ की कहानी लिख डाली। राहुल रवैल के साथ बैठकर जावेद ने एक मराठी मानुष का किरदार गढ़ा। उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि बुनी। एक सौतेली मां का किरदार गढ़ा जो हमेशा उसे ताने मारती रहती है। और, बेटा ऐसा कि उसका भी बुरा नहीं मानता। वह कहता है, ‘बात सगे या सौतेली की नहीं है, बेकार आदमी किसी को भी बोझ लगता है।’
मराठी मानुष की कहानी
फिल्म ‘अर्जुन’ अर्जुन मालवंकर की कहानी है। एक पढ़ा लिखा नौजवान जो नौकरी न मिलने से परेशान है। उसके चार साथी और हैं और सब सिस्टम को लग चुके घुन से परेशान भी हैं और हताश भी। अर्जुन बहुत परेशान होता है तो छोटी बहन सुधा से बातें करता है या फिर अपनी दोस्त गीता साहनी की बाहों में सुकून पाता है। एक लुच्चे की ठुकाई के बाद वह इलाके के नेता चौगुले की नजरों में आता है। चौगुले को अर्जुन में अपना अचूक हथियार नजर आता है। वह उसे भावात्मक तरीके से अपने विरोधी त्रिवेदी के खिलाफ तैयार करता है। वह चौगुले के लिए जान पर खेल जाता है लेकिन एक दिन उसे पता ये चलता है कि त्रिवेदी और चौगुले ने तो हाथ मिला लिए हैं। इस लड़ाई में वह अपने सबसे करीबी दोस्त मोहन को खो देता है। उसकी लड़ाई सिस्टम से है और पूरे सिस्टम में उसका सिर्फ एक मददगार सामने आता है, जो है इंस्पेक्टर राणे। फिल्म ‘अर्जुन’ की इस कहानी में कुछ और किरदार भी बेहद अहम ढंग से जावेद अख्तर ने बुने हैं। मटका किंग अनूप लाल का किरदार उस समय के बंबई शहर का असली रंग उजागर करता है। परेश रावल इसके पहले दो तीन फिल्मों में यहां वहां दिखाई दिए थे, लेकिन बतौर एक किरदार उनकी ये डेब्यू फिल्म मानी जा सकती है। उनका सेलेक्शन उनके एक नाटक को देखने के बाद फिल्म के निर्माता करीम मोरानी ने किया था।
डिंपल के लिए सनी हुए बेताब
फिल्म ‘अर्जुन’ ही वो फिल्म है जिससे सनी देओल और डिंपल कपाड़िया की दोस्ती गाढ़ी होनी शुरू हुई। इससे पहले दोनों पहली बार फिल्म ‘मंज़िल मंज़िल’ में साथ आए थे। उस वक्त के सिनेमा के जानकार बताते हैं कि फिल्म ‘बेटे’ के बंद होने की जो वजह फिल्म बनाने वालों ने जाहिर की थी वो ये थी कि फिल्म की कहानी अच्छे से आगे नहीं बढ़ पा रही है, लेकिन मूल मुद्दा फिल्म का ये भी था कि फिल्म के हीरो सनी देओल और हीरोइन अमृता सिंह की पटरी नहीं बैठ पा रही थी। बीच फिल्म से हीरोइन को निकालना ठीक नहीं लगता तो निर्माताओं ने वह फिल्म ही बंद कर दी और एक नया प्रोजेक्ट नए नाम से शुरू हो गया। फिल्म में डिंपल कपाड़िया से पहले पद्मिनी कोल्हापुर को भी लेने की बात चली थी लेकिन सनी देओल का वीटो डिंपल के नाम पर ही रहा। और, इसके बाद पद्मिनी कोल्हापुरे ने भी कभी सनी देओल के साथ काम नहीं किया। फिल्म में सत्यजीत और राजा बुंदेला के रोल छोटे लेकिन असरदार रहे। सत्यजीत के किरदार मोहन ने फिल्म में उत्प्रेरक की भूमिका निभाई है और ये उसकी हत्या का ही दृश्य है जिसने पूरी फिल्म इंडस्ट्री को राहुल रवैल की फिल्ममेकिंग का दीवाना बना दिया।