निर्देशक राज खोसला की चर्चित फिल्म ‘दोस्ताना’ के निर्माता थे यश जौहर और इसी फिल्म से उनके प्रोडक्शन हाउस यानी धर्मा प्रोडक्शंस की नींव पड़ी जिसके कर्ताधर्ता करण जौहर ने बाद में इसी नाम से एक और फिल्म अभिषेक बच्चन, प्रियंका चोपड़ा और जॉन अब्राहम के नाम से बनाई। अभी जिस फिल्म ‘दोस्ताना’ की बात हो रही है, उसके दोनों हीरो अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा संघर्ष के दिनों के साथी रहे हैं। दोनों फिल्म ‘परवाना’ में पहली बार एक साथ दिखे। फिर दोनों ने एक और कम चर्चित फिल्म ‘रास्ते का पत्थर’ में भी साथ काम किया। इन गुमनाम सी फिल्मों के अलावा अमिताभ और शत्रुघ्न सिन्हा ने ‘काला पत्थर’, ‘दोस्ताना’, ‘शान’ और ‘नसीब’ में साथ काम किया है। इन फिल्मों के बारे में खासियत ये रही कि हर बार शत्रुघ्न सिन्हा को अमिताभ बच्चन से ज्यादा तालियां मिलीं। इन फिल्मों की आउटडोर शूटिंग के दौरान भी लोग जब शत्रुघ्न सिन्हा को देखकर अमिताभ से ज्यादा सीटियां बजाते तो अक्सर अमिताभ परेशान हो जाते। ‘काला पत्थर’ की शूटिंग के दौरान इसके चलते क्या हो चुका है, ये मैं आपको फिल्म ‘काला पत्थर’ के बाइस्कोप में बता ही चुका हूं।
Bioscope S2: इस सुपरहिट फिल्म से पड़ी धर्मा प्रोडक्शंस की नींव, फिल्मफेयर से नहीं मिला कोई पुरस्कार
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सरेराह छेड़छाड़ से शुरू हुई कहानी
सलीम-जावेद की लिखी फिल्म ‘दोस्ताना’ कहानी है दो ऐसे दोस्तों की जिनकी पढ़ाई तो साथ में हुई लेकिन एक बन गया पुलिस इंस्पेक्टर विजय और दूसरा वकील रवि। दोनों अपने अपने पेशों की बुलंदियों पर हैं और दोनों कभी एक दूसरे के काम में दखल नहीं देते। एक दिन एक खूबसूरत युवती शीतल थाने में छेड़छाड़ की रिपोर्ट लिखाने आती है तो उसकी मुलाकात विजय से होती है। उसी रोज शीतल की मुलाकात रवि से भी होती है। रवि मन ही मन शीतल को चाहने लगता है लेकिन कह नहीं पाता। विजय अपने दिल की बात साफगोई से आगे रख देता है और उसका प्यार पींगे भरने लगता है। रवि शहर के एक बड़े अपराधी डागा के लिए भी काम करता है। विजय और शीतल की प्रेम कहानी रवि को पता चलती है तो वह टूट जाता है। हालात ऐसे मोड़ पर आते हैं जहां विजय का फांसी के तख्ते से बचना या उस पर झूल जाना रवि के हाथ में होता है। शीतल अपने प्यार को बचाने की फरियाद लेकर रवि के पास जाती है और इसके बाद जो होता है, वह फिल्म के क्लाइमेक्स की नींव रखता है।
यश जौहर ऐसे बने निर्माता
ये बात उन दिनों की है जब यश जौहर देव आनंद की कंपनी नवकेतन फिल्म्स के लिए काम करते थे। देव आनंद ने इमरजेंसी के दौरान उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ मोर्चा खोला। उनके विरोध में फिल्मी सितारों को लेकर खूब रैलियां कीं और इसी दौरान उन्होंने अपने दफ्तर में काम करने वाले यश जौहर को खुद फिल्में बनाने को कहा। उधर देव आनंद सियासत करने निकले और इधर यश जौहर ने सलीम जावेद की एक कहानी ली और नवकेतन फिल्म्स के अपने तमाम साथियों जैसे कि जीनत अमान और प्रेम चोपड़ा आदि से बात करके अमिताभ बच्चन को फिल्म के लिए साइन कर लिया। सुनील दत्त के साथ फिल्म ‘मुझे जीने दो’ से फिल्म प्रोडक्शन सीखने की शुरुआत करने वाले यश जौहर को चर्चा मिली, देव आनंद की फिल्म ‘गाइड’ से जिसको तय बजट के हिसाब से पूरा करने में यश जौहर ने बहुत मदद की। देव आनंद ने बाद में यश जौहर को अपनी फिल्मों ‘ज्वैल थीफ’, ‘प्रेम पुजारी’ और ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ का भी प्रोडक्शन सौंपा।
शुत्रघ्न से पहले विनोद खन्ना थे हीरो
बतौर प्रोड्यूसर अपनी पहली फिल्म के लिए यश जौहर पहले देव आनंद के भाई विजय आनंद को ही बतौर निर्देशक लेना चाहते थे। दोनों के बीच इसे लेकर बैठकें भी हुईं लेकिन विजय आनंद उन दिनों ‘राम बलराम’ और ‘राजपूत’ जैसी फिल्मों में बिजी थे तो मामला राज खोसला पर आकर अटका। तब तक फिल्म के हीरो अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना थे। विनोद खन्ना को सुपरस्टार बनाने में राज खोसला की फिल्मों ‘मेरा गांव मेरा देश’, ‘कच्चे धागे’ और ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’ का बड़ा हाथ रहा है। विनोद खन्ना भी राज खोसला पर आंख मूंद कर भरोसा करते थे। लेकिन, जब राज खोसला ने फिल्म ‘दोस्ताना’ की स्क्रिप्ट पढ़ी तो उन्हें लगा कि इसमें वकील का जो रोल विनोद खन्ना करने जा रहे हैं, उसमें तो जान ही नहीं है और ये रोल विनोद खन्ना के स्टारडम के हिसाब से ठीक भी नहीं है। राज खोसला ने इस बारे में यश जौहर से बात की तो यश जौहर ने उनसे ही पूछ लिया कि विनोद की जगह कौन सा दूसरा हीरो फिट बैठेगा, तो राज खोसला ने तपाक से शत्रुघ्न सिन्हा का नाम ले लिया।
फिल्म का बहुचर्चित वन टेक शॉट
अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा के बीच फिल्म ‘दोस्ताना’ में तमाम दमदार सीन्स है। राज खोसला को भले विनोद खन्ना इस रोल में फिट न लगे हों, लेकिन शत्रुघ्न सिन्हा के लिए जो सीन उन्होंने रचे, वे काबिले तारीफ हैं। शत्रुघ्न सिन्हा ने भी इस फिल्म में खूब तालियां बटोरी हैं। शत्रुघ्न सिन्हा के मेकअप मैन प्रसाद का इस फिल्म के दौरान ही निधन हुआ था और उसका अंतिम संस्कार करने के बाद से वह शूटिंग पर आ नहीं रहे थे। यश जौहर ने एक दिन उन्हें फोन करके पूछा कि महबूब स्टूडियो में लगा फिल्म का सेट हटाया जाना है और अमिताभ बच्चन की भी बस आखिरी डेट इस शेड्यूल की बची है तो अगर वह हां करें तो अगले दिन शूटिंग रखी जा सकती है। शत्रुघ्न सिन्हा को देर से आने की आदत थी औऱ अमिताभ बच्चन को हमेशा वक्त से पहुंचने की। उस दिन शूटिंग दो बजे खत्म होनी थी, उसके बाद सेट तोड़ा जाना था। शत्रुघ्न ठीक डेढ़ बजे स्टूडियो में दाखिल हुए। 10 मिनट में तैयार हुए। अपनी लाइनें वह पहले से तैयार करके आए थे और राज खोसला से बोले, ‘टेक करते हैं।’ सब लोग परेशान कि न रिहर्सल, न कोई लाइट मार्किंग, सीधे टेक। पर राज खोसला को भरोसा था। फिल्म के सबसे अहम इस सीन को शत्रुघ्न ने वन टेक में ओके किया। सबने खूब तालियां बजाईं। शत्रुघ्न ने इसका एक टेक और देना चाहा। कैमरा ऑन भी हुआ लेकिन अमिताभ ने बीच सीन में ही उन्हें रोक लिया। वह शत्रुघ्न के गले मिले और बोले, ‘लल्ला, बस करते हैं। उससे बेहतर नहीं हो पाएगा।’