निर्माताः फैंटम फिल्म्स
बीड़ी ढंग से जले इसके लिए जरूरी है कि उसमें तंबाकू ठीक से भरी हो। अनुराग कश्यप की मुक्काबाज सुलगने वाली बीड़ी है। इसमें एक साथ दो फ्लेवर हैं, खेल भी और प्यार भी। फैन्स को दोनों का मजा साथ मिलेगा। अपनी फिल्मों से हमेशा जोरदार पंच जमाने की कोशिश में रहने वाले अनुराग मुक्काबाज में कामयाब हैं। एक साथ उन्होंने खेल, जाति, धर्म और मर्दानगी के ठेकेदारों को इसमें ठोक दिया। वह भी भारत माता की जय कहते हुए! कोई उनकी देशभक्ति पर संदेह नहीं कर सकता। उनकी नाराजगी सिस्टम से है। फिर वह किसी भी सरकार के झंडे तले क्यों न खड़ा हो।
Film Review: अनुराग का जोरदार पंच, जाति और खेल का समीकरण है MUKKABAAZ
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मुक्काबाज पारंपरिक स्पोर्ट्स फिल्म नहीं है और इसे रूटीन लव स्टोरी भी नहीं कह सकते। अनुराग ने बतौर राइटर-डायरेक्टर दोनों को खूबसूरती से गूंथा। जब आप सोचते हैं कि श्रवण (विनीत कुमार सिंह) और सुनैना (जोया हुसैन) की कहानी प्यार की तरफ झुक रही, तभी यूपी के बरेली में बॉक्सिंग एसोसिएशन के सर्वेसर्वा भगवानदास मिश्रा (जिमी शेरगिल) आते हैं और आप पाते हैं कि एक टैलेंटेड बॉक्सर से अन्याय हो रहा है। इस तरह शुरू से अंत तक संतुलन बना रहता है।
श्रवण सर्वश्रेष्ठ बॉक्सर है लेकिन ब्राह्मण नहीं है। उस पर वह दूसरे बॉक्सरों की तरह भगवानदास के घर के काम करने से मनाकर देता है। इससे भी बड़ी बात कि वह उनकी भतीजी से प्यार कर बैठता है। भगवानदास कसम खाते हैं कि वह इस यूपी के माइक टाइसन को क्षेत्रीय प्रतियोगिता तक में नहीं उतरने देंगे। प्रादेशिक-राष्ट्रीय का मामला तो दूर की कौड़ी है।
अनुराग की फिल्म पर पकड़ है और बीच-बीच में वह खेलों से इतर जाति-धर्म की राजनीति पर टिप्पणियां करते चलते हैं। दलित बॉक्सिंग कोच के घर में पड़ोसी मटन दे जाता है। अचानक घर पर भीड़ हमला कर देती है कि उसके यहां बीफ पकाया गया! जाति के समीकरणों से भगवानदास जनता का प्रतिनिधि बना हुआ है और पुलिस मजबूर है। सरकारी दफ्तर में जाति की ज्यामिति तय करती हैं, किसको किस काम में फिट करें। खिलाड़ी को खेलने बस नहीं मिलता। खेल की आड़ में दूसरे तमाम खेल होते हैं।
मुक्काबाज ठेठ यूपी की कहानी है। अंदाज-ए-बयां वहीं के रंग में रंगा है। फिल्म में विनीत कुमार सिंह विजेता की तरह उभरे हैं। बॉक्सर बनने के लिए उनकी मेहतन दिखती है। उनका अभिनय सहज है। गूंगी लड़की सुनैना का किरदार जोया ने बखूबी निभाया। जिमी शेरगिल खलनायकी में चमके और रवि किशन की सादगी उनकी ताकत बन जाती है।
फिल्म का गीत-संगीत रोचक है। खास तौर पर दो गीत, मुश्किल है अपना मेल प्रिये और बहुत हुआ सम्मान। तय है कि फिल्मों से समाज में कुछ नहीं बदलता। मुक्काबाज से भी यूपी में खेलों की तस्वीर नहीं बदलेगी, लेकिन फिल्म देख कर इतना तो सोचा जा सकता है कि क्या-क्या बदलने की जरूरत है।