{"_id":"5b77e03c42c7924657041143","slug":"gulzar-birthday-special-story-konw-about-him","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"ये 10 बातें ही बता देंगी आखिर क्या हैं गुलजार, इसलिए पहनते हैं आज भी सफेद कपड़े","category":{"title":"Bollywood","title_hn":"बॉलीवुड","slug":"bollywood"}}
ये 10 बातें ही बता देंगी आखिर क्या हैं गुलजार, इसलिए पहनते हैं आज भी सफेद कपड़े
Sat, 18 Aug 2018 02:44 PM IST
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
Updated Sat, 18 Aug 2018 02:44 PM IST
विज्ञापन
1 of 9
gulzar
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
Link Copied
शब्दों के जादूगर माने-जाने वाले गीतकार गुलजार 18 अगस्त 1934 को झेलम जिले के दीना गांव में जो अब पाकिस्तान में है में पैदा हुए। उनका असली नाम संपूर्ण सिंह कालरा है और वह बॉलीवुड में आने से पहले गैराज में एक मकेनिक के तौर पर काम किया करते थे। तो आइए इस खास मौके पर एक नजर डालते हैं गुलजार के जीवन की इन 10 बातों पर जो उन्हें समझने में काफी मदद करेंगी...
2 of 9
gulzar
गुलजार को लिखने का शौक खेलने की उम्र से ही लग गया था मतलब बचपन से ही। लेकिन उनके पिता को यह पसंद नहीं था। लेकिन पिता के लाख मना करने के बाद भी गुलजार ने अपनी कलम नहीं रोकी। एक दिन आया जब उन्हें मुंबई की फिल्मी नगरी में एंट्री मिल ही गई।
3 of 9
gulzar
फिर तो उन्होंने बिमल रॉय के साथ बतौर असिस्टेंट काम करना शुरू कर दिया और एस.डी. बर्मन की फिल्म 'बंदिनी' से बतौर गीतकार शुरुआत की। बता दें कि उनका पहला गाना था 'मोरा गोरा अंग'। बतौर डायरेक्टर उनकी पहली फिल्म 'मेरे अपने' (1971) थी। यह फिल्म बंगाली फिल्म 'अपनाजन' की रीमेक थी।
विज्ञापन
विज्ञापन
4 of 9
gulzar
शायद ही आपको पता हो कि गुलजार की फिल्मों की एक खासियत हुआ करती थी कि उनकी फिल्मों में फ्लैशबैक देखने को बहुत मिलता था। क्योंकि गुजलार का कहना है कि बिना अतीत दिखाए फिल्म समझी नहीं जा सकती। फ्लैशबैक की बात करें तो फिल्म किताब, इजाजत और आंधी इसका उदाहरण हैं।
विज्ञापन
5 of 9
gulzar
एक और बात उस समय के पाकिस्तान में पैदा होने का उनपर यह असर भी पड़ा कि उनकी उर्दू में बहुत दिलचस्पी थी इसलिए वह उर्दू में ही अपनी कविता लिखा करते थे। यहां तक कि फिल्मों के लिए गुलजार को साइन-लैंग्वेज भी सीखनी पड़ी। क्योंकि साल 1973 में आई फिल्म 'कोशिश' में एक्टर संजीव और जया भादुड़ी मूक-बधीर रोल में थे।
एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें
Next Article
Disclaimer
हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।